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एन.के. सिंह का ब्लॉगः भाजपा की नीति से क्षेत्रीय दलों पर संकट   

By एनके सिंह | Updated: December 22, 2018 17:54 IST

इन चुनाव परिणामों में किसानों को एकत्रित वोट समूह के रूप में पाते हुए कई दलों की हालत खराब है. भाजपा ने इसकी ‘काट’ सोची है.

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धर्म के आधार पर बनी सांप्रदायिक एकता या जातिवाद की राजनीति के दंश को किसान समूह ने दशकों तक भोगी हुए गरीबी और अभाव के यथार्थ के बाद अब लगभग खारिज करना शुरू कर दिया है क्योंकि भावना पर भूख अब बलवती होती जा रही है. भाजपा शायद यह भूल गई थी कि शाश्वत भूख की बुनियाद पर भावना ज्यादा दिन खड़ी नहीं रह पाती. हाल में उत्तर भारत के तीन राज्यों में हुए चुनाव इसकी तस्दीक करते हैं.  

इन चुनाव परिणामों में किसानों को एकत्रित वोट समूह के रूप में पाते हुए कई दलों की हालत खराब है. भाजपा ने इसकी ‘काट’ सोची है. उत्तर प्रदेश के संन्यासी (गेरु आधारी) मुख्यमंत्नी योगी आदित्यनाथ ने अनायास ही हनुमानजी को दलित बताना शुरू नहीं किया. ताजा योजना के अनुसार पिछड़ी जातियों में एक नया वर्ग बनाने की कवायद शुरू कर दी है जिसके तहत यादवों और कुर्मियों को कुल 27 प्रतिशत आरक्षण में मात्न सात प्रतिशत ही मिल सकेगा. जस्टिस राघवेंद्र की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय समिति ने, जिसे मुख्यमंत्नी ने विगत जून में बनाया था, सरकार को सौंपी अपनी 400 पेज की ताजा रिपोर्ट में बाकी 20 प्रतिशत कोटा अन्य 79 पिछड़ी जातियों में बांटने की सिफारिश की है. वैसे इसका नाम ‘सामाजिक न्याय समिति’ रखा गया है ताकि राजनीतिक मंचों या जन-विमर्श में यह आभास हो कि इसका कारण पार्टी की न्यायप्रियता है. 

एक तीसरा वर्ग भी बनाने की चर्चा है जो अति-पिछड़े वर्गो का होगा यानी पिछड़ी जातियां अब तीन वर्गो में बंट जाएंगी. इसी तरह दलितों में (नीतीश कुमार मॉडल) दो वर्ग बनाने की योजना है - दलित, और महादलित. हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्नी राजनाथ सिंह ने भी ऐसा प्रयास किया था लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान-सम्मत न मानते हुए खारिज कर दिया था. योगी के इस नए प्रयास का सीधा असर मुलायम-अखिलेश की सपा और मायावती की बसपा पर पड़ेगा और इन नेताओं का अपने वोट बैंक पर एकाधिकार खत्म हो जाएगा. यही मॉडल बिहार में भी लागू किया जा सकता है. 

ताजा खबरों के अनुसार जेल में जाने के बाद बिहार की पिछड़ी जातियों में लालू के प्रति सहानुभूति बढ़ी है और महागठबंधन उत्तर प्रदेश की तरह ही बिहार में भी भाजपा के लिए आसन्न 2019 का आम चुनाव एक बड़ी चुनौती बन सकता है. लिहाजा अगर पिछड़े वर्ग के आरक्षण आधार को नए वर्ग समूहों में तोड़ दिया जाए तो लालू-तेजस्वी के जनता दल को भी कमजोर किया जा सकता है. यही कारण है कि आज भाजपा का यह खेल समझते हुए बिहार में महागठबंधन न केवल मजबूत हुआ है बल्कि उपेंद्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ कर इसमें शामिल होने से कुर्मी और अन्य समकक्ष जातियां बड़े बैनर तले जुटने का संदेश देने लगी हैं. 

चूंकि किसान आमतौर पर आज इन्हीं पिछड़ी जातियों और खेत मजदूर दलित वर्ग से आते हैं लिहाजा किसानों का गुस्सा कुछ और नहीं इन्हीं बैकवर्ड-दलितों की नाराजगी है. लिहाजा बिहार का महागठबंधन का विपक्षी प्रयोग सत्ताधारी भाजपा-जद(यू) के लिए बेहद चिंता का सबब हो सकता है. मायावती -अखिलेश यादव को भी इन्हीं संदर्भो के मद्देनजर सोचना होगा.  

उधर बढ़ती किसान एकता की एक ही काट है. या तो इन्हें हिंदू-मुसलमान में बांटना और व्यापक हिंदू-एकता को भावनात्मक आधार पर तैयार करना या फिर इस एकता को आरक्षण के आधार पर कई ऐसे पहचान -समूहों में तोड़ देना जो भारत के संविधान में भी नहीं थे जैसे महादलित, अति-पिछड़ा और पसमांदा. इसे अमल में लाने के लिए सामाजिक न्याय के आवरण की जरूरत होती है जो सत्ता पर काबिज राजनीतिक दल बखूबी डाल देते हैं.   

पिछले दो वर्षो में किसानों का कर्जमाफी का एक दौर चला है. इस दौरान सात राज्यों में हुए चुनाव में जिन दलों ने बढ़ चढ़ कर कर्जमाफी का वायदा किया वे जीते. उत्तर प्रदेश, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान. 70 साल के आजाद भारत के इतिहास में पहली बार राजनीतिक दल और सरकारें डरी हैं, किसानों की सामूहिक चेतना से. हाल के चुनाव परिणाम के बाद केंद्र सरकार अभी देश के 12 करोड़ किसानों का दो लाख करोड़ का कर्ज माफ करने का सोच ही रही थी कि कांग्रेस ने एक और हमला किया - जब तक किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा केंद्र सरकार नहीं करती प्रधानमंत्नी नरेंद्र मोदी को रात में सोने नहीं दिया जाएगा. 

अब मोदी सरकार के लिए मुश्किल यह हो गई है कि वह अगर घोषणा करती भी है तो यह लगेगा कि विपक्ष के दबाव में किया गया है और अगर नहीं करती तो कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व हर रोज मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार बनाने के चंद घंटों में कुल 60000 करोड़ की कर्ज माफी का ‘मॉडल’ दिखाता रहेगा. दरअसल ‘तू डार-डार, मैं पात-पात’ का खेल जो भाजपा और मोदी-अमित शाह द्वय ने शुरू किया था उसमें भी कांग्रेस आगे निकलती दिख रही है.  

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