Why PM Narendra Modi is in 'silent mode' after the Assembly election Results | ब्लॉग: चुनाव के बाद 'साइलेंट मोड' में क्यों हैं पीएम मोदी?
चुनावी नतीजों के बाद चुप क्यों के पीएम नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल में 2 मई को भाजपा की अपमानजनक हार के बाद, पीएम मोदी ने चुप्पी बनाए रखी है. हालांकि वे कोरोना के खिलाफ चौबीसों घंटे युद्ध लड़ रहे हैं लेकिन कुछ ट्वीट्स को छोड़कर शायद ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कुछ कहा है. शायद वे इस घटनाक्रम के दीर्घकालिक राजनीतिक परिणामों के बारे में अधिक सचेत हैं. 

यह मोदी के आलोचकों को एक साथ आने का अवसर प्रदान कर सकता है और इस प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है. मोदी इस बात से भी अवगत हैं कि सोनिया गांधी एक बार फिर समझौता कर सकती हैं जैसा उन्होंने 2004 में वाजपेयी के खिलाफ यूपीए-एक बनाकर किया था और अंतत: उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था. 

हार की स्थिति में भी ममता बनर्जी या किसी और को यूपीए-3 का नेता चुनकर सोनिया तुरुप का पत्ता चल सकती हैं. लेकिन यह सब दूर की बातें हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव अभी तीन साल दूर हैं. 

पीएम मोदी को है एक और बड़ी चिंता

मोदी को एक और बड़ी चिंता है क्योंकि पंचायत चुनावों में वाराणसी के उनके गृह निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा, जिसको पूर्व पीएमओ सहयोगी और यूपी एमएलसी ए. के. शर्मा सीधे तौर पर देख रहे थे. चुनाव आयोग में दरार यह इंगित करती है कि चुने गए नौकरशाह बाद में आंखें दिखा सकते हैं. 

आखिरकार, सीएजी विनोद राय ने मनमोहन सरकार को अकेले दम पर ध्वस्त कर दिया था. भाजपा में ‘स्लीपिंग सेल्स’ ने मौका देखकर सात साल के बाद अपनी आंखें खोली हैं. बड़ी हार के बाद भाजपा की ट्विटर सेना अब बैक फुट पर है.

ममता बनर्जी भी शांत

2015 में सामने आए नीतीश कुमार की तुलना में ममता बनर्जी अब मोदी के लिए एक बड़ी चिंता हैं. भाजपा को बिहार के चुनावों में इसी तरह अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा था और नीतीश कुमार रातोंरात राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे थे. लेकिन स्वर्गीय अरुण जेटली ने नीतीश कुमार को गठबंधन से बाहर होने और लालू के साथ जाने के दो साल के भीतर ही मोदी के साथ ला खड़ा किया. 

नीतीश ने ऐसा क्यों किया, यह हमेशा रहस्य बना रहेगा क्योंकि वे 2019 में मोदी के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकते थे, खासकर जब राहुल गांधी उनके प्रति सकारात्मक थे. दोनों ने कई बैठकें कीं. लेकिन कुछ ‘अपरिहार्य  कारणों’ से नीतीश ने पाला बदल लिया. उन्होंने 2020 में इसकी कीमत भी चुकाई, जब भाजपा ने उन्हें हाशिए पर रखा और वे फिर से दुविधा में आ गए हैं. लेकिन ममता एक अलग ही मिट्टी की बनी हैं. 

उन्होंने अपना युद्ध कौशल दिखाया है. घोटालों में फंसे अपनी पार्टी के दिग्गजों के बीच वे मजबूत बनी हुई हैं, जिनमें से आधे भाजपा में चले गए हैं. मोदी की तरह ही वे अकेली हैं. आज, किसी भी विपक्षी नेता की तुलना में उनकी सर्वाधिक विश्वसनीयता है. उन्होंने एकाकी लड़ाई लड़ी, जबकि नीतीश को या तो लालू की जरूरत थी या भाजपा की. लेकिन राष्ट्रीय मुद्दों पर वे भी साइलेंट मोड में चली गई हैं.

पवार गहरे ‘चिंतन’ में

राकांपा प्रमुख शरद पवार भी हाल के चुनावों के बाद गहरे चिंतन-मनन में हैं. पश्चिम बंगाल चुनावों से पहले, पवार ने राकांपा के लिए तीन सीटें छोड़ने की खातिर ममता को राजी करने के लिए अपना दूत कोलकाता भेजा था. लेकिन ममता ने विनम्रता से यह कहते हुए मना कर दिया कि इस प्रक्रिया में टीएमसी और उनकी अपनी लड़ाई को नुकसान पहुंचेगा. 

पवार को निराशा हुई, क्योंकि उनको लगता था कि ममता कभी भी उनके अनुरोध को अस्वीकार नहीं करेंगी. आखिरकार, ममता ने हमेशा उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का समर्थन किया था. लेकिन प. बंगाल की बड़ी जीत ने उन्हें पूरे भारत में स्टार बना दिया, और बाकी सबको पृष्ठभूमि में डाल दिया. पवार शायद सबसे पहले बधाई देने वालों में थे. 

एनसीपी प्रवक्ता ने जल्द ही एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि पवार विपक्षी एकता के लिए काम करना जारी रखेंगे. लेकिन शिवसेना सहित किसी ने भी प्रतिक्रिया नहीं दी. ममता भी दूसरी ओर देख रही हैं और तब से पवार ‘गहन चिंतन’ में हैं.

सरमा ने कैसे भाजपा को राजी किया?

इसके पीछे एक रहस्य है कि कैसे हिमंत बिस्वा सरमा ने असम का मुख्यमंत्री बनने के लिए सर्बानंद सोनोवाल को बेदखल किया. इसमें कोई संदेह नहीं है कि 2015 में कांग्रेस छोड़ने के बाद से सरमा भाजपा के उभरते हुए सितारे हैं. अमित शाह भाजपा प्रमुख थे और फिर सरमा उनके खास बन गए. 

शाह अपने कार्यकाल में उत्तर-पूर्व में भाजपा का खाता खोलने के लिए बेताब थे. लेकिन सोनोवाल को पहले ही नितिन गडकरी ने इस भूमिका के लिए तैयार कर लिया था, जब वे 2011 में एजीपी से पार्टी में शामिल हुए थे. सोनोवाल को 2014 में केंद्रीय मंत्री बनाया गया था. लेकिन सरमा को उत्तर-पूर्व के लिए राजग का अध्यक्ष बनाया गया और उन्होंने भाजपा के महासचिव राम माधव को बाहर कर अपने आदमी को नियुक्त किया. 

सरमा ने 126 सदस्यीय सदन में बहुमत हासिल किया. नतीजों से पता चला कि 2016 के मुकाबले भाजपा को 1 प्रतिशत वोट का नुकसान हुआ और उसे कोई सीट अतिरिक्त नहीं मिली. लेकिन सरमा के 42 विधायकों ने दिल्ली को यह संदेश भेजा कि उनके नेता के साथ कोई अन्याय नहीं होना चाहिए. परिणाम सामने है.

Web Title: Why PM Narendra Modi is in 'silent mode' after the Assembly election Results

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