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घुमक्कड़ शास्त्री राहुल सांकृत्यायन, ‘वोल्गा से गंगा’ और हिंदी समाज

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 6, 2026 07:06 IST

पुर्तगाल से ही आए फर्नाओ नुनेज ने उनके विवरण-वर्णन में विजयनगर के राजनीतिक इतिहास, राजवंश सूची, युद्ध, सत्ता-संघर्ष को ‘तथ्यज’ में ‘कल्पज’ के मेल से लिखा.

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सुनील सोनी

मानव जाति और सभ्यता के विकास के समकालीन विरोधाभास जो अंतर्द्वंद्व रचते हैं, वह सौ साल पहले राहुल सांकृत्यायन के मन में उपजा, तो वे पुरा-पदचिह्नों को तलाशते हुए दुनिया नापने निकल पड़े. वैसे प्रवास इनसानी स्वभाव का हिस्सा रहा है, जिसके बिना धरती ‘होमो सेपियंस’ से आबाद ही न होती. लेकिन प्राचीन-मध्य कालीन भारतीय उपमहाद्वीप में वह सैकड़ों साल क्यों थमा रहा, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं, जब तक कि राहुल ने वृहत्यात्रा से उसे दर्ज नहीं कर दिया.

वे लगातार प्रवास करते हैं, अरबी, फारसी, तिब्बती, रूसी, अंग्रेजी समेत 50 से अधिक देसी-पूरबी-यूरोपीय बोलियां-भाषाएं सीखते हैं, ग्रंथागारों में सबूत खोजते हैं और लिखते हैं. हजारीबाग जेल में 21 दिनों में लिखी गई ‘वोल्गा से गंगा’, ‘दिक्‌-दिग्दर्शन’ से ‘घुमक्कड़ शास्त्र’, ‘मध्य एशिया का इतिहास’ तक 147 ग्रंथ निकलते हैं. वे हिंदी के स्रोत तक पहुंचते हैं और खड़ी बोली ‘कौरवी’ के आदिहिंदी होने का प्रमाण पेश करते हैं.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की याद में बस दार्जीलिंग में आवक्ष प्रतिमा है. पारंगत बहुभाषी होने के बावजूद हिंदी को सर्वोच्च मानने के बजाय वे अगर फ्रेंच या जर्मन में लिखते, तो उनकी ख्याति सर्वोच्च होती. कभी न भुलाने लायक. उनके जैसा कोई यायावर यानी घुमक्कड़ नहीं, जिसने उस हिंदी समाज को ‘तथ्यज पुरावृत्त इतिहास’ बख्शा, जो मूलत: अनपढ़ है.

पिछले ढाई हजार सालों में दूसरी सभ्यता, समाज, धर्म, भाषा, परंपरा, ज्ञान, भौगोलिक क्षेत्र आदि का अध्ययन करने के लिए कितने ही यात्री भारत आए और बहुविध वर्णन किया, पर आत्मश्लाघारत भारत से बौद्ध धर्म के प्रचारक और कुछ व्यापारी ही बाहर गए, जिन्होंने सभी यात्रा-वृत्तांत या वर्णन नहीं लिखा.

मेगस्थनीज (यूनान / ईसा पूर्व 300वीं सदी), फाहियान (चीन / चौथी ईस्वी), ह्वेन सांग व इत्सिंग (चीन/ सातवीं सदी), अल बरूनी (उज्बेकिस्तान-फारस /11वीं ईस्वी), मार्को पोलो (इटली/ 13वीं सदी), इब्न बतूता (मोरक्को/ 14वीं सदी) और 15वीं-16वीं सदी में निकोलो कोंटी (इटली), डोमिंगो पेस और फर्नाओ नुनेज (पुर्तगाली) ने भारत को अलग-अलग ढंग से खोजा, देखा और तथ्यात्मक लिखा.

ईसा से तीन सदी पहले यूनान से मेगस्थनीज आते हैं और चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहकर ‘इंडिका’ लिखते हैं. मूल कृति नष्ट हो जाने के बावजूद कम से कम पांच भू-इतिहासकारों ने ‘इंडिका’ से जिन उद्धरणों को लिया, उससे मौर्य शासन प्रणाली, नगरों, जाति व्यवस्था का पहला विवरण मिला.

भीषण कठिन यात्रा के बावजूद वृद्ध फाहियान भारत से दस साल बाद चीन लौटकर ‘फो कुए की’ लिखते हैं, तो गुप्तकालीन भारत में  प्रशासन, समाज, धर्म के विवरण देते हैं. सातवीं सदी में ह्वेनसांग पहली बार उत्तर के हर्षवर्धन से दक्षिण यानी पल्लव वंश के कांची (तेलंगाना-तमिलनाडु) तक यात्रा करते हैं और तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व सांस्कृतिक दशा का वर्णन करते हैं. सातवीं सदी में इत्सिंग भी कागज के इस्तेमाल को लेकर भारत को लेकर दिलचस्प संकेत देते हैं.

उज्बेकिस्तानी-फारसी भौतिकशास्त्री-गणितज्ञ-भाषाविद अल बरूनी 11वीं सदी में आए, तो भारत में व्याप्त रीति-रिवाज, जाति, धर्म, दर्शन, गणित जैसे विषयों पर लिखी ‘किताब उल हिंद’. पृथ्वी की त्रिज्या मापने का सूत्र और प्रकाश की गति ध्वनि से कई गुना अधिक होने के वैज्ञानिक सबूत भी यहीं रहते हुए लिखा. मूलत: व्यापारी मार्को पोलो 13वीं सदी में चीन से वेनिस के लिए चले, तो केरल-तमिलनाडु में पांड्‌य शासन में पड़ाव का उल्लेख दर्ज किया.

75 हजार किलोमीटर की यात्रा का तत्कालीन रिकॉर्ड कायम करनेवाले इब्न बतूता ने ‘किताब उर रहला’ में मोहम्मद बिन तुगलक की चीनी शासकों से संबंध बनाने की जिस आकांक्षा का जिक्र किया है, वह शायद रेशम की वजह से रही होगी.

14वीं सदी में इतालवी निकोलो डि कोंटी ने विजयनगर की नगर रचना, व्यापार, सामाजिक जीवन और दास प्रथा ‘वेग वास’ पर पोप के दरबार में रिकॉर्ड दर्ज करवाया. यह अब भी अनसुलझा सवाल है कि क्या कोलंबस उसके वर्णन से प्रभावित होकर भारत को खोजने निकला था?

मूलत: व्यापारी, पर पुर्तगाली राजदूत डोमिंगो पेस ने कृष्णदेव राय के विजयनगर साम्राज्य का तथ्यज वर्णन किया, जिसे अब भी खंडहरों में महसूस किया जा सकता है. पुर्तगाल से ही आए फर्नाओ नुनेज ने उनके विवरण-वर्णन में विजयनगर के राजनीतिक इतिहास, राजवंश सूची, युद्ध, सत्ता-संघर्ष को ‘तथ्यज’ में ‘कल्पज’ के मेल से लिखा.

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