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विजय दर्डा का ब्लॉग: बिहार और अमेरिका के चुनाव एक जैसे...!

By विजय दर्डा | Updated: October 25, 2020 14:16 IST

चुनाव चाहे कहीं भी हो, हकीकत यह है कि बुनियादी मुद्दों पर कोई चर्चा होती ही नहीं है. विपक्ष तो कुछ सवाल कर भी लेता है लेकिन सरकार में बैठी पार्टी बुनियादी सवालों का सामना करना ही नहीं चाहती. बस वोटर को रिझाने की कोशिश होती है ताकि किसी तरह वोट मिल जाए

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इस वक्त दुनिया में दो महत्वपूर्ण चुनाव हो रहे हैं. अमेरिका अपने प्रेसिडेंट को चुनने जा रहा है जो दुनिया पर राज करेगा तो दूसरा चुनाव बिहार में होने जा रहा है जो देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका अदा करेगा.  अमेरिका में कोरोना को लेकर ‘हम वैक्सीन बना रहे हैं, हमें वोट दो, हम मुफ्त में वैक्सीन देंगे, हमें वोट दो’का नारा उछल रहा है तो बिहार में ‘आपको मुफ्त में वैक्सीन मिलेगी, हमें वोट दो’ कह कर मतदाताओं को भ्रमित किया जा रहा है. अमेरिका में चुनाव के पहले मतदाताओं को रुपयों की बड़ी खैरात बांट दी गई है. बिहार में अब बंटेगी!

जिस प्रकार से हमारे यहां जाति और धर्म के नाम पर या वादों के सहारे मतदाताओं को भ्रमित किया जाता है, उसी प्रकार अमेरिका में भी भाषा के नाम पर, मजहब के नाम पर, प्रांतवाद के नाम पर मतदाताओं को भ्रमित किया जा रहा है. वहां गुजराती, हिंदी, मराठी, तमिल और तेलुगू आदि भाषाओं में प्रचार पत्रक बंट रहे हैं. यहां तक कि मतपत्रिका में भी गुजराती भाषा का उपयोग पहली बार होते देखा है. जिस तरह भारत में ‘राष्ट्रवाद’ का नारा बुलंद है. उसी प्रकार अमेरिका में ‘अपना मनुष’ का नारा बुलंद है. डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि मैं दूसरे देशोंं का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करूंगा. उनके प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशी बिडेन ने भी चेतावनी दे डाली है कि यूएस की आंतरिक व्यवस्था को यदि दूसरे भेदने की कोशिश करेंगे तो उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा. हम भी इसी तरह चीन और पाकिस्तान का नाम लेकर कह रहे हैं कि इन्हें केवल हम ही सबक सिखा सकते हैं.  

'बिहारी बाबू’ बना मजाक का विषय

मैं बिहार की और अमेरिका की तुलना इसलिए कर रहा हूं क्योंकि अमेरिका दुनिया भर से आकर बसे ज्ञानवान लोगों के कारण प्रज्ञावान भूमि बनी है. बिहार भी प्रज्ञावानों की भूमि है लेकिन फर्क यह है कि बिहार इनका उपयोग नहीं कर पाया है. कुछ लोगों ने ‘बिहारी बाबू’ को मजाक का विषय बना दिया है लेकिन वैसा है नहीं! बिहार के लोगों में जो कौशल, कुशाग्रता और बुद्धि है वह उस धरती की देन है जहां भगवान महावीर, भगवान बुद्ध और चाणक्य ने जन्म लिया. आज भले ही दुनिया भर में बहुत से बेहतरीन विश्वविद्यालय हैंं लेकिन दुनिया को नालंदा के रूप में पहला विश्वविद्यालय बिहार ने ही दिया. और हां, हम यह कैसे भूल सकते हैं कि बिहार के ही लिच्छवि राजाओं ने  दुनिया को लोकतंत्र का तोहफा भी दिया. वास्तव में देश का नेतृत्व करने की क्षमता है बिहार में लेकिन ऐसे कुशाग्र लोगों को दिशा देने में हमारी राजनीति असफल रही है. गौरवशाली अतीत वाले बिहार की वर्तमान स्थिति देखकर मन द्रवित होता है. इतना वक्त बीत गया लेकिन बिहार का कुछ भी भला नहीं हुआ. कोई भी पार्टी या कोई भी नेता बिहार को सही दिशा में नहीं ले जा पाया.

जिस तरह अमेरिका में चुनावी हथकंडे चल रहे हैं, वैसे ही हथकंडे हमारे यहां भी चल रहे हैं. चाहे वो जदयू के नीतीश कुमार हों, बीजेपी के नेता नरेंद्र मोदी हों, राजद के तेजस्वी यादव हों, सब चुनावी हथकंडों का पूरा प्रयोग कर रहे हैं. ऐसे में किसी को भी दोष कैसे दें? रही बात कांग्रेस की तो उसके पास जो भी संसाधन है उसमें वो टक्कर देने की कोशिश जरूर कर रही है. नतीजे चाहे जो भी हों! चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जोरशोर से लगे हैं लेकिन मेरा मानना है कि उन पर यदि लोगों को भरोसा है तो लोग वोट देंगे. सहयोगी दल ने सत्ता पाने के बाद यदि वादा पूरा नहीं किया तो प्रधानमंत्री की साख को आंच आ सकती है. मुझे लगता है कि कम से एक आदमी तो ऐसा हो जिस पर लोगों का विश्वास बना रहे!

बिहार चुनाव में अपराध पर कोई चर्चा नहीं 

एक जमाने में जो बात अमेरिका में थी वही भारतीय लोकतंत्र में भी थी लेकिन पुरानी बातों को याद करके अब क्या फायदा? क्योंकि वो सारी चीजें बदल चुकी हैं. अब तो जो सत्ता में आता है, चाहे वो किसी भी पार्टी  का हो, वह जनता के नाम पर खुद का भला करता है. इसीलिए चाहे वो बिहार हो या अन्य राज्य हों, कम या अधिक प्रमाण में सभी जगह बेबसी ही है. यदि ऐसा नहीं होता तो करोड़ों लोग भूख की गोद में क्यों सोते या करोड़ों नवयुवक नौकरी के लिए दर दर क्यों भटकते? दुर्भाग्य देखिए कि बिहार चुनाव में आम आदमी के बुनियादी सवालों को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही है. 

महामारी के दौरान मुंबई और दिल्ली से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल कर जो मजदूर बिहार पहुंचे हैं, उनके सामने आज रोजी रोटी की विकराल समस्या खड़ी है लेकिन कोई भी पार्टी चर्चा नहीं कर रही है कि इनके लिए रोजगार के अवसर कैसे उपलब्ध होंगे. स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का कोई वादा कहीं नजर ही नहीं आ रहा है.  किसी पार्टी के पास कोई रोड मैप नहीं है कि वह बिहार पर अभी भी लगे पिछड़े प्रदेश के ठप्पे को कैसे हटाएगा? अपराध पर भी कोई चर्चा नहीं हो रही है. हर पार्टी ने बाहुबलियों को टिकट बांटा है और यह तय है कि दागदार दामन के बहुत से लोग लोकतंत्र के मंदिर में पहुुंच भी जाएंगे!

...जनाब चुनाव आएंगे और जाएंगे, लोकतंत्र मजबूत रहना चाहिए. लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब सभी दृष्टि से लोग सुखी और संपन्न रहें लेकिन बिहार में तो बेबसी का आलम है. आम आदमी के बुनियादी सवाल अंधेरे में खो गए हैं. यह अंधेरा आखिर कौन दूर करेगा? 

टॅग्स :बिहार विधान सभा चुनाव 2020बिहार
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