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स्वच्छता अभियान का अजीबोगरीब तरीका 

By लोकमत समाचार हिंदी ब्यूरो | Updated: July 15, 2018 06:35 IST

कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि क्या हमारा देश एक जैसी जुनूनी मनोवृत्ति वाला देश है? एक देश और उसके लोग, जिनके पास अनुभव और चेतना के स्तर पर दो अलग-अलग धरातलों पर सवार रहने की असीमित क्षमता है, और वे अंतर को नहीं जानते हैं?

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लेखक- पवन के. वर्मा

कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता है कि क्या हमारा देश एक जैसी जुनूनी मनोवृत्ति वाला देश है? एक देश और उसके लोग, जिनके पास अनुभव और चेतना के स्तर पर दो अलग-अलग धरातलों पर सवार रहने की असीमित क्षमता है, और वे अंतर को नहीं जानते हैं? मैं यह सवाल ‘स्वच्छ भारत’ के राष्ट्रव्यापी अभियान के संदर्भ में पूछ रहा हूं, जिसे 2014 में बड़ी धूमधाम से लांच किया गया था और जो भारत को स्वच्छ देश बनाने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रमुख कार्यक्रम था। 

जहां तक इसके पीछे के इरादे की बात है, इस विचार में कोई गलती नहीं है। हम ऐसे लोग हैं जो अपने आसपास की गंदगी के साथ रहने के अविश्वसनीय रूप से अभ्यस्त हैं। हालांकि हम इस पर ध्यान नहीं देते, लेकिन यह हमारे रोजमर्रा की बात है। एक श्रद्धालु हिंदू गंगा में डुबकी लगाते समय स्नान घाट के आसपास फैली गंदगी और नदी के प्रदूषित हो चुके जल से बिल्कुल निर्लिप्त रहेगा। उसकी दिलचस्पी धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन और उससे मिलने वाले फल में रहती है।  

यही कारण है कि सबसे अधिक गंदगी का ढेर हमारे पवित्र मंदिरों के आसपास देखा जाता है। जब महात्मा गांधी वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में गए थे तो वहां उन्होंने जो कुछ भी देखा, उससे उन्हें ‘गहरी पीड़ा’ हुई थी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने वहां की  संकरी और गंदी गलियों, भिनभिनाती मक्खियों और मंदिर के अंदर सड़ चुके फूलों के बारे में लिखा है। सफाई का ऐसा ही अभाव उदाहरण के लिए पुरी के जगन्नाथ मंदिर में देखा जा सकता है, जहां कचरा चारों ओर बिखरा रहता है। मैंने खुद देवताओं को चढ़ाई गई मालाओं में बड़ी संख्या में मंडराते तिलचट्टों को देखा है। प्रसाद पर मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। लेकिन इनमें से कोई भी चीज भक्तों का ध्यान भंग नहीं कर पाती।

आज इस स्थिति में कितना बदलाव हुआ है? इसमें कोई शक नहीं कि स्वच्छ भारत के नारे के विज्ञापन में भारी मात्र में पैसा खर्च किया गया है ताकि  जन-जागरूकता पैदा  की जा सके। लेकिन क्या वास्तव में इससे सहायता मिली है? पिछले हफ्ते ही, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने आक्रोशित होकर पूछा था कि दिल्ली में कचरे के बढ़ते पहाड़ और अपशिष्ट प्रबंधन पर नीति की कमी के लिए कौन जिम्मेदार है? दिल्ली में प्रतिदिन दस हजार टन से अधिक कचरा निकलता है। इसमें से केवल एक अंश का ही अपशिष्ट प्रबंधन किया जाता है और बाकी को लैंडफिल (कचरा भराव क्षेत्र) में डम्प कर दिया जाता है। रिपोर्टो के अनुसार राजधानी का गाजीपुर लैंडफिल 50 मीटर से भी अधिक ऊंचा हो चुका है और ऊंचाई में जल्दी ही कुतुब मीनार को भी पीछे छोड़ सकता है! भालस्वा और ओखला लैंडफिल की स्थिति भी समान रूप से खतरनाक है। सर्वोच्च अदालत ने पीड़ा के साथ पूछा कि क्यों ठोस कचरा प्रबंधन के लिए 2016 में केंद्र सरकार द्वारा तैयार किए गए नियम को लागू नहीं किया गया है? पिछले साल सितंबर में, गाजीपुर लैंडफिल ढहने से दो लोगों की मौत होने के बाद अदालत ने सरकार से कहा था कि अपशिष्ट निपटान की समस्या से निपटने के लिए वह ‘ठोस इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता’ दिखाए। जब आठ महीने तक सरकार ने इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए रणनीति नहीं बनाई तो अदालत को अधिकारियों पर दोष तय करने का आदेश देने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

अगर भारत की राजधानी का यह हाल है तो कल्पना की जा सकती है कि देश के अन्य शहरों का क्या हाल होगा। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इस साल मानसून के आगमन के दौरान बीएमसी को विफल होते हमने देखा है। जलनिकासी व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो गई और सीवेज तथा कचरा शहर के मुख्य मार्गो तक फैल गया। हमारे सभी शहरों का वायु प्रदूषण स्तर खतरनाक रूप से निरंतर बढ़ रहा है, जो लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। यमुना अविश्वसनीय रूप से विषाक्त हो रही है; गंगा अभी भी स्वच्छता से कोसों दूर है और रासायनिक प्रदूषण हाईटेक राजधानी बेंगलुरु के तालाबों तथा जलनिकायों को प्रदूषित कर रहा है।

यह सच है कि शौचालयों के निर्माण में प्रगति हुई है। जनवरी 2018 में, सरकार ने दावा किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में छह करोड़ शौचालय बनाए गए हैं और तीन लाख गांवों तथा 300 जिलों को खुले में शौच से मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया है। यह उत्साहित करने वाली खबर है। लेकिन इस उपलब्धि का अवमूल्यन किए बिना, मुङो लगता है कि एक निष्पक्ष एजेंसी से इस बात की जांच कराए जाने की जरूरत है कि इनमें से कितने शौचालय वास्तव में काम कर रहे हैं। इस संदेह के कारण हैं। इस साल अप्रैल में, सीएजी की 2016-17 के लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत योजना के तहत एक भी शौचालय का निर्माण नहीं किया गया है, और इस काम के लिए जो 40 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे, वे बिना इस्तेमाल के ही पड़े हुए हैं। 

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, मैं इसे मनोरंजक और चिंता की भी बात मानता हूं कि नीति आयोग अब स्वच्छ भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए ‘एक्शन प्लान’ ला रहा है। यह उस पर बहुत देरी से व्यक्त की गई प्रतिक्रिया है, जिसमें हाल ही में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में साफतौर पर कहा गया है कि दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित 15 शहरों में 14 शहर भारत के हैं। एक्शन प्लान में वायु प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग बढ़ाने, फसल के अवशेषों को जलाने पर रोक लगाने, प्रदूषण फैलाने वाले विद्युत संयंत्रों को बंद करने, अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देने जैसे उपाय अपनाने की बात कही गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि प्रधानमंत्री द्वारा स्वच्छ भारत का आह्वान किए जाने के बाद इस तरह की कार्य योजना को अपनाना क्या पहला कदम नहीं होना चाहिए था? यदि संस्थागत उपायों - शौचालयों के निर्माण के अतिरिक्त - को पिछले चार वर्षो में नहीं अपनाया गया है और केवल अब तैयार किया जा रहा है, तो क्या यह स्वच्छ भारत के प्रशंसनीय लक्ष्य को हासिल करने का अजीबोगरीब तरीका नहीं है? एक स्लोगन कितना ही नेकनीयत  हो, वह काम का विकल्प नहीं बन सकता।

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