भारत के सांस्कृतिक इतिहास की एक प्रमुख त्रासदी यह थी कि अंग्रेजी उपनिवेश के दौरान भारत को भारत से अपरिचित ही नहीं बनाया गया बल्कि भारतीयों में उसके मूल स्वभाव के प्रति गहरी वितृष्णा भी पैदा की गई. स्वयं अपने प्रति घृणा के जो बीज बोए गए और उसे सुदृढ़ करने के लिए जो शिक्षा व्यवस्था रची गई उसके फलस्वरूप भारत की ज्ञान-परम्परा, सांस्कृतिक अभ्यास और जीवन पद्धति आदि को संदिग्ध बना दिया गया.
इसका परिणाम आत्म-निषेध के रूप में प्रतिफलित हुआ. दूसरी ओर जो पराया और प्रतिकूल था उसे बिना विचारे अंगीकार किया जाता रहा. पाश्चात्य शिक्षा और अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का असर कुछ ऐसा हुआ कि हम घोर अनुकरण के दुश्चक्र में फंस गए. फलत: स्वतंत्र होने का बाद भी मौलिक चिंतन प्रायः अनुपस्थित रहा. देश की बौद्धिक परम्परा, कलात्मक विरासत, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतन विषयक अवदान से भी हम अनभिज्ञ होते गए. हम उधारी की विचार संपदा के बोझ तले इस तरह दबते गए कि हममें से कई लोग भारत की उस अस्मिता को प्रश्नांकित करने लगे जिसके लिए स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी.
ऐसे परिप्रेक्ष्य में भारतीय चिंतन और विचार-सरणि को सामने रखना और उसे लेकर व्याप्त दुर्व्याख्याओं और भ्रमों का प्रतिकार करना तथा उनको वर्तमान भारतीय और वैश्विक संदर्भ में विवेचित करना अपने आत्म बोध के लिए आवश्यक है. पंडित विद्यानिवास मिश्र उन थोड़े से भारतविदों में थे जिन्होंने इस कार्य को गंभीरता से लिया. बड़े मनोयोग, धैर्य और असाधारण बौद्धिक साहस के साथ यह कार्य किया. उन्होंने धर्म, लोक, शास्त्र, देश, काल, परम्परा, आधुनिकता जैसे प्रत्ययों को समकालीन चिंतन के प्रसंग में व्याख्यायित किया. उनका रचा साहित्य भारत को समझने और समझाने का एक विशाल उपक्रम सरीखा है. उनके ललित निबंध जहां भारत की पार्थिव गंध से सुवासित हैं वहीं उनका शास्त्रीय चिंतन यहां की सांस्कृतिक चेतना को प्रकट करता है.
वह रस की तलाश को जीवन का अभीष्ट मानते थे और उसके लिए संवाद हेतु तत्पर रहते थे. उनके लिए परम्परा वह है जो पर के भी परे यानी श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर हो. वह निरंतर साध्य है. उन्होंने तंत्र, कला, रस, रीति, शब्द, लोक-जीवन आदि से जुड़े अनेक प्रश्नों का समाधान किया और कई नई स्थापनाएं कीं. साहित्य का आस्वादन कराते हुए उन्होंने वाल्मीकि, वेदव्यास, भवभूति और कालिदास, मध्यकालीन भक्ति काव्य तथा आधुनिक साहित्य का सांस्कृतिक विमर्श प्रस्तुत किया. वे संस्कृत के पंडित थे, आस्तिक हिंदू थे, हिंदी के लेखक थे, सैलानी थे, प्राध्यापक थे, आधुनिक साहित्य के अध्येता और भारतीय बोध के प्रखर प्रवक्ता थे.
भारत ही नहीं यूरोप, अमेरिका आदि की यात्राओं और अनुभवों ने उनकी दृष्टि और विचार पद्धति को तीक्ष्ण किया था. उनके सांस्कृतिक विवेक ने उनको समकालीन वैश्विक परिप्रेक्ष्य को समझने में मदद की. अपनी रचनाओं और वक्तृता से पंडित विद्यानिवास मिश्र जी ने सोते हुओं को जगाने, उकसाने और उन्मीलित करने के लिए अथक प्रयास किया. भारतीय संस्कृति की रसमयता और सर्जनात्मकता में उनका अगाध विश्वास था और इस प्रतीति को वह सहजता से देखते, गुनते, सहेजते और उन्मुक्त भाव से सब के साथ साझा करते रहे.
भारतीय विश्व दृष्टि की व्याख्या करते हुए मिश्र जी मानते हैं कि मनुष्य सृष्टि का उपभोक्ता नहीं, सहयात्री है. मनुष्य और प्रकृति को वे अविलग देखते हैं. उनके शब्दों में ‘बाहर जो सूर्य का प्रकाश है, वही भीतर बुद्धि का प्रकाश है; बाहर जो अंधकार है, वही भीतर का भय है; बाहर जो वृक्ष में ऊपर उठने की प्रक्रिया है, वही भीतर की उमंग है. इसीलिए मनुष्य और देवता में स्पर्धा नहीं है, सहकार भाव है.’
यह सोच कि सृष्टि मात्र हमारी उपभोग्य है, पूरी दुनिया उपभोग्य है प्रकृति विजेय है, हम विजेता हैं, गलत धारणा है. प्रकृतिविमुख विकास विकृति होगा. संस्कृति में उपभोग वृत्ति का बढ़ना परिवर्तन है पर विकृति है. दूसरी तरफ परम्परा के भीतर से उन्नयन वास्तविक विकास होगा. अब ‘विकास’ प्रायः प्रौद्योगिक उन्नति और आर्थिक वृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त होता है. आज की स्थिति को लेकर वह आगाह करते हुए कहते हैं कि ‘धन-संप्रभुता के बल पर तकनीकी का ज्ञान खरीद-फरोख्त का विषय हुआ.
इस ज्ञान से संपन्न व्यक्ति भी बिकाऊ हुआ और वह मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार तकनीकी रचना के बजाय धन-संप्रभु के द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्पाद को महत्वपूर्ण समझने में नियोजित हुआ, जिससे कि मांग बढ़ाई जाए, मांग से अधिक लालच बढ़ाया जाए, वस्तुओं के प्रति आसक्ति बढ़ाई जाए. यह एक खतरनाक मोड़ है. इसकी ओर आगाह करना विचारशील मनुष्य का कर्तव्य है.’ मिश्र जी उसे मूल्य विमर्श और मनुष्य, प्रकृति, सृष्टि के प्रसंग में स्थापित करते हैं. वे संस्कृति के स्वस्थ विकास और विकृत आधुनिकता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं