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राजेश बादल का ब्लॉग: ईरान के मसले पर भारत की मुश्किलें कम नहीं

By राजेश बादल | Updated: July 9, 2019 07:42 IST

जी-20 समूह की जापान में बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रुख में नरमी के संकेत दिए थे. ट्रम्प ने भारत और ईरान के कारोबार पर अपनी ओर से कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई  थी.

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ईरान और अमेरिका के बीच तनाव भारत के गले की हड्डी बनता जा रहा है. उसकी विदेश नीति ऐसे बिंदु पर आकर खड़ी हो गई है, जहां से न आगे जाया जा सकता है और न पीछे लौटने का रास्ता है. अमेरिकी झुकाव से हिंदुस्तान को फायदा कम नुकसान अधिक हुआ है. कारोबारी झटके तो अमेरिका ने दिए ही हैं, रक्षा और कूटनीतिक मामलों में भी भारत को कम क्षति नहीं पहुंचाई है. उन मोर्चो पर जद्दोजहद जारी है. लेकिन ईरान के मसले पर धर्म-संकट बढ़ता ही जा रहा है. 

दरअसल, जी-20 समूह की जापान में बैठक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रुख में नरमी के संकेत दिए थे. ट्रम्प ने भारत और ईरान के कारोबार पर अपनी ओर से कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई  थी.

उन्होंने कहा था कि ईरान से कच्चे तेल के आयात पर भारत अभी समय ले सकता है. लेकिन इसी बीच ईरान की परमाणु समझौते में शामिल देशों को दी गई 60 दिनों की मियाद भी समाप्त हो गई और उसने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्र म तेज करने का ऐलान कर दिया. अब वह यूरेनियम उत्पादन की सीमा तोड़ चुका है. इसका अर्थ यह है कि ऊर्जा उत्पादन के अलावा वह परमाणु हथियार भी बनाएगा. 

मुश्किल यह है कि हिंदुस्तान के लिए ईरान से तेल आयात सिर्फ कारोबार नहीं है. समूचे क्षेत्न में शक्ति संतुलन के नजरिये से भी आवश्यक है कि भारत और ईरान गहरे कूटनीतिक रिश्ते रखें. लेकिन इन बेहतर रिश्तों का भारत लाभ नहीं ले पा रहा और न ईरान को लाभ मिल  रहा है.

आज दुनिया की धुरी कारोबार पर आकर टिक गई है. कारोबार की इस मशीन में विचार और सद्भावना के ग्रीस की फिलहाल कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. द्विपक्षीय कारोबार बढ़ाना ही बेहतर संबंधों का पैमाना नहीं रहा है. अब प्रतिद्वंद्वी को कारोबारी झटका देने के लिए भी रिश्तों का बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है.

अमेरिका ऐसा ही करना चाहता है. लेकिन इसमें वह भारत को होने वाले नुकसान से आंखें मूंदे बैठा है. रिश्तों के ऐसे वन वे ट्रैफिक को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? भारत को लेकर भी अमेरिका ने कुछ समय से रंग बदला है. व्यापार में छूट समाप्त करने के अलावा उसने ऐसे अनेक फैसले लिए हैं, जिनके साथ कदमताल भारत के लिए जोखिम भरा है. मगर अमेरिका भारतीय चिंताओं का सम्मान करता नहीं दिखाई देता.

ईरान के साथ परमाणु करार अचानक समाप्त करने का समर्थन तो उसके अनेक यूरोपीय मित्न देशों - ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस तक ने नहीं किया था. पड़ोसी कनाडा और प्रतिद्वंद्वी चीन व रूस ने भी इस फैसले से अपने को अलग कर लिया था. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भी इससे हैरत में थी. उसका कहना था कि ईरान ईमानदारी से समझौते की शर्तो का पालन कर रहा है. इसीलिए पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत अमेरिकी विपक्ष भी इसके खिलाफ था.

वास्तव में इस संधि से सभी खुश थे. पर अपनी कंपनी की तरह देश चला रहे ट्रम्प पर कोई असर नहीं पड़ा. दूसरी ओर भारत ने कच्चे तेल का आयात न्यूनतम कर दिया. चाबहार बंदरगाह से मिलने वाले आर्थिक फायदे नियंत्रित हो गए. अफगानिस्तान, पुराने सोवियत संघ में शामिल देशों तथा मध्य-पूर्व से हमारा व्यापार आधा रह गया.

इसके अलावा शिया बहुल ईरान के साथ खड़े होने से सुन्नी मुल्क सऊदी अरब व पाकिस्तान पर जो कूटनीतिक  शिकंजा कसा था, वह थोड़ा ढीला पड़ गया. भारतीय कंपनियों ने ईरान में करीब एक लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है. उनको भी झटका लगा है. भारत ने अफगानिस्तान में 600 करोड़ रुपए की लागत से ईरान सीमा तक सड़क बनाई है और चाबहार से अफगान सीमा तक ईरान ने सड़क बना दी है.

इससे माल लाना ले जाना आसान हो गया. सड़क निर्माण के दौरान तालिबान और पाक समर्थित आतंकवादियों ने 130 भारतीय मजदूरों की हत्या कर दी थी. इतनी कुर्बानियों के बाद भारत अमेरिका से क्यों डरे? पाकिस्तान नहीं चाहता कि अफगानिस्तान के बाद ईरान में भारत का प्रभाव बढ़े.

भारत ईरान में अंदरूनी रेल नेटवर्क बिछाने का काम भी कर रहा है. इसका लाभ भारत और ईरान दोनों को लंबे समय तक मिलने वाला है. इसलिए भारत और ईरान के सामने मधुर संबंध बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है. मौजूदा तनाव की स्थिति में अमेरिका को भारत के हित क्यों नहीं समझने चाहिए.

इसके अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान और अफगानिस्तान से चाबहार बंदरगाह बहुत पास है. पाकिस्तान ने चीन को 43 साल के लिए ग्वादर बंदरगाह लीज पर दिया है. भारत के लिए यह बड़ी चिंता थी. चाबहार ने ग्वादर से बने दबाव को संतुलित कर दिया है. मुंबई से चाबहार सिर्फ 850 नॉटिकल मील है और चाबहार से ग्वादर केवल 72 किमी.

यानी चीन और पाक के लिए ग्वादर अब चुनौती है. यह स्थिति अमेरिका क्यों नहीं समझना चाहता? भारत और ईरान को हर हाल में एक दूसरे का साथ चाहिए. अविभाजित हिंदुस्तान के सदियों से ईरान के साथ अच्छे रिश्ते रहे हैं. ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों के अलावा मजबूत कारोबारी इतिहास है. अमेरिका को एक सीमा के बाद भारत के हितों से कोई लेना-देना नहीं है. यह बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए.

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