Quarrel of language being pure | शरद जोशी का ब्लॉग: भाषा शुद्ध-अशुद्ध होने का झगड़ा
प्रतीकात्मक फोटो

कई बार विद्वानों के दिमागों में बड़ी प्यारी-प्यारी गलतफहमियां हो जाया करती हैं, जिस तरह कि कभी-कभी मूर्खो के दिमागों में भी नई सूझ आ जाती है. सो मेरे दिमाग में यह सूझ आई है कि विद्वानों के दिमागों में कुछ प्यारी गलतफहमियां हैं, वह भी विशेषकर हिंदी के विद्वानों के दिमागों में. हिंदी शुद्ध होनी चाहिए. व्याकरण तथा शब्द-प्रयोग के संबंध में होनेवाली भूलें भाषा का सत्यानाश कर रही हैं.

होता यह है कि बच्चा जन्मने के बाद से ही गलत हिंदी का उच्चारण करने लग जाता है. हर शब्द को या तो बोलता ही नहीं और बोलता है तो अशुद्ध. अत: यह मानिए कि जीवन में या समाज में शुद्ध हिंदी के आंदोलन सदैव असुद्ध हिंदी के बाद प्रारंभ होते हैं. भाषा के अधिकांश रूप बिगड़े हुए करार दिए जा सकते हैं क्योंकि जहां नागरी पर ग्रामीण का प्रभाव पड़ा कि भाषा बिगड़ी. और ग्रामीण संपर्क सदैव नहीं होता रहे तो भाषा कभी प्राणवान हो नहीं सकती.

पर अपने देश में आनंद यह है कि हिंदी पर ब्रज का प्रभाव पड़े तो वह अपवित्र नहीं होती, अवधी का प्रभाव पड़े तो भी नहीं होती पर जहां कहीं शब्द या रूप के क्षेत्र में मालवी, नीमाड़ी अथवा राजस्थानी प्रभाव पड़ जाए तो भाषा गंदी हो जाती है. और विद्वानों के दिमाग में प्यारी गलतफहमी के अंकुर फूटते हैं कि हिंदी अशुद्ध हो रही है.

पर बात अब हिंदी भाषा-बोली से बढ़कर प्रांतीय भाषाओं पर जा रही है. मराठी, बंगला, गुजराती की केसर क्यारियों में हिंदी भी थोड़ी छेंटी से बोई जा रही है. मराठी-हिंदी के गन्धर्व संबंधों से एक नई गलतीमयी भाषा बन रही है. ‘सम्मेलन घर के सामूं हो रिया है. इन्होंको अध्यक्षता के वास्ते बुलाया है. अपनेकूं भी निमंत्रण है. कायकूं नी जाना, तुम को?’ यह शुद्ध हिंदी नहीं है पर है तो हिंदी. अगर आप चाहते हैं कि हिंदी का प्रसार-प्रचार हो तो न सिर्फ इस भाषा-बोली को कान से सुनना स्वीकार करना होगा, पर साथ ही उसे लिखी देखकर भी मन में प्यार जगाना पड़ेगा. भाषा में ब्राह्मणवाद और गुजराती-मराठी से मिलने पर छुआछूत के भाव खत्म करने होंगे.

मराठी, बंगाली का बूढ़ा भी तो हिंदी में बच्चा ही है, सो कच्चा ही रहेगा. और भाषण में इनकी कच्ची हंडी मंजूर करके दस-बीस सालों के लिए पेट में फिद्दू स्वीकार कर लिया जाना चाहिए. हिंदी बुढ़िया की गोद आए बेटे लंबे-तड़ंगे हैं, सीखे-समझदार हैं पर जुबान के सुद्ध नहीं हैं, सो पेले पेले बुरे लगते हैं, पर बाद में अच्छे लगेंगे. पलने से तो मंत्र पाठ करता कोई आता नहीं.

स्यात मेरी बात नी जंचे क्योंकि मैं खुद इस प्रदेश का सबसे बड़ा असुद्ध हिंदी का लेखक हूं. अपनी भूल पर सैद्धांतिक ढक्कन लगा रहा हूं.
(रचनाकाल - 1950 का दशक)


Web Title: Quarrel of language being pure
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