लाइव न्यूज़ :

पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: लहूलुहान जेएनयू की पगडंडियों पर

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: January 10, 2020 05:22 IST

लेकिन 2019 में जेएनयू का टकराव तो सीधे सत्ता से हो चला है. लहूलुहान जेएनयू के भीतर छात्र संगठनों के टकराव से ज्यादा बाहर से आए नकाबपोशों की मौजूदगी डराने वाली है. 80 के दशक में दिल्ली पुलिस घोड़े पर सवार होकर छात्रों को रौंदते हुए अंदर दाखिल हुई थी.  इस बार पुलिस की मौजूदगी में जेएनयू घायल हुआ.

Open in App

अठखेलियां खाती इन पगडंडियों के बीच से गुजरते हुए आपको एहसास प्रकृति का ही होगा. जो सुंदर दृश्य आपकी आंखों के सामने है वह बेहद आसानी से आपको उपलब्ध है. ये आपके भीतर की सुंदरता होगी कि आपके एहसास प्रकृति से जुड़ जाएं आपके भीतर प्रेम जागे. जॉन कीट्स की कविता ‘ओड टू ए नाइटेंगल’ को पढ़िएगा तो समझ जाएंगे, प्रकृति कैसे अनुराग को अभिव्यक्ति देती है क्योंकि ‘सुंदरता ही सत्य है, सत्य सुंदर है’.  

ये संवाद 1988 का है. जेएनयू के गंगा होस्टल ढाबे से ओपन थिएटर तक चलते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर मुनीस रजा की छात्रों के साथ बातचीत. तब जेएनयू के वाइस चांसलर मोहम्मद शफी आगवानी हुआ करते थे. लेकिन जेएनयू को गढ़ने वाले मुनीस रजा को जेएनयू से कुछ ऐसा प्रेम था कि वह अक्सर शाम के वक्त जेएनयू कैंपस पहुंच जाते थे. जेएनयू के संस्थापकों में से एक मुनीस रजा ही वह शख्स थे जिन्होंने जेएनयू को कैसे बनाया जाए इसे मूर्त रूप दिया.

नए कैंपस में नदियों के नाम पर हर होस्टल का नाम रखा गया. मसलन गंगा, कावेरी, ब्रह्मपुत्र, महानदी आदि. प्रतीकात्मक तौर पर भारत की पहचान को जोड़ने के लिए होस्टल के नाम साबरमती और पेरियार भी रखे गए. जिस जेएनयू कैंपस और होस्टल ने अब खुद को घायल देखा है उसे प्रकृति के समंदर में समेटने की सोच लिए मुनीस रजा तो जेएनयू कैंपस में छात्र-छात्रओं की गर्म होती सांसों को भी रोसेटी की कविता ‘टू ब्लासम’ के जरिए मान्यता देने से नहीं कतराते थे. लेकिन अस्सी के दशक में येलावर्ती के जेएनयू वीसी रहते हुए और साल भर के भीतर पी.एन. श्रीवास्तव को वीसी बनाते  वक्त जिस तरह जेएनयू में पहली बार जबर्दस्त हंगामा हुआ उसने सत्ता की छवि को धूमिल जरूर किया.

लेकिन 2019 में जेएनयू का टकराव तो सीधे सत्ता से हो चला है. लहूलुहान जेएनयू के भीतर छात्र संगठनों के टकराव से ज्यादा बाहर से आए नकाबपोशों की मौजूदगी डराने वाली है. 80 के दशक में दिल्ली पुलिस घोड़े पर सवार होकर छात्रों को रौंदते हुए अंदर दाखिल हुई थी.  इस बार पुलिस की मौजूदगी में जेएनयू घायल हुआ. तब जेएनयू में प्रवेश परीक्षा की प्रक्रिया में बदलाव किया गया था. तब 40 छात्रों को कैंपस से बाहर कर दिया गया था. लेकिन इस बार चालीस से ज्यादा बाहरी नकाबपोश कैंपस में घुसे और पुलिस किसी को रोकना तो दूर, लहूलुहान छात्रों की शिकायत को दर्ज करने से आगे बढ़ ही नहीं पाई.

..पहली बार जेएनयू के सपनों पर हकीकत हावी है जहां पाश घुमड़ने लगा है.. सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना..

टॅग्स :जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू)इंडियामोदी सरकारदिल्ली पुलिस
Open in App

संबंधित खबरें

विश्वभारत के झंडे वाले टैंकर पर गोलीबारी के बाद MEA ने ईरानी राजदूत डॉ. मोहम्मद फथाली को किया तलब

विश्व20 लाख बैरल तेल ले जा रहे भारतीय टैंकर पर ईरान की नौसेना ने किया हमला, बरसाई गोलीबारी

कारोबारसरकार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 2% महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को मंज़ूरी दी

पूजा पाठAkshaya Tritiya2026: सोना खरीदने का है प्लान? अक्षय तृतीया पर खरीदारी से पहले समझें सोने की शुद्धता का पूरा गणित

भारतजनगणना और परिसीमन के चक्रव्यूह में महिला आरक्षण बिल! क्या है अब मोदी सरकार की नई रणनीति?

भारत अधिक खबरें

भारतमहिलाओं के लिए पीएम का संदेश, कोटा बिल की हार पर विपक्ष को लताड़ा, माताओं और बेटियों से मांगी माफी

भारत'कोई ताकत कमल खिलने से नहीं...,' पश्चिम बंगाल में दहाड़े सीएम डॉ. मोहन, कुछ ऐसा रहा माहौल

भारतयूपी में उत्पाती बंदरों का होगा एनकाउंटर! प्रधान मुख्य वन संरक्षक सुनील चौधरी ने दिए निर्देश

भारतबिहार में सम्राट सरकार 24 अप्रैल को विधानसभा में साबित करेगी बहुमत, बुलाया गया एक दिवसीय विशेष सत्र

भारतबिहार में पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा की घटाई गई सुरक्षा, नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को पहली बार दी गई जेड सिक्योरिटी