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संसद को राजनीति का अखाड़ा मत बनाइए

By राजकुमार सिंह | Updated: February 6, 2026 05:42 IST

Parliament Budget Session Live: बेशक लगातार बढ़ती राजनीतिक कटुता के लिए किसी एक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन पाक-साफ भी कोई नहीं नजर आता.

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ठळक मुद्देसंसद के अंदर और बाहर की राजनीति के तर्कों और तेवरों के बीच अंतर मिटना सकारात्मक संकेत नहीं है.विपक्ष के आठ सांसदों को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया. प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही पांच फरवरी को ध्वनि मत से धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा.

Parliament Budget Session Live: संसदीय कामकाज के जारी किए जाने वाले आंकड़ों से इतर याद नहीं पड़ता कि हाल के वर्षों में संसद का कोई सत्र बिना व्यवधान सुचारु चल पाया हो. इससे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद की साख बढ़ती तो हरगिज नहीं. वर्तमान बजट सत्र में जो कुछ हो रहा है, वह हमारे राजनीतिक दलों के संसदीय आचरण पर गंभीर सवाल खड़े करता है. संसदीय गरिमा और परंपराओं की लक्ष्मण रेखा लांघना स्वीकार्य नहीं हो सकता. संसद के अंदर और बाहर की राजनीति के तर्कों और तेवरों के बीच अंतर मिटना सकारात्मक संकेत नहीं है.

धरना-प्रदर्शन-नारेबाजी सदन से बाहर स्वीकार्य राजनीतिक औजार हैं, पर सदन में आसन पर कागज फाड़ कर उछालना तो स्वीकार्य नहीं हो सकता, जिसके चलते विपक्ष के आठ सांसदों को सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया. बेशक लगातार बढ़ती राजनीतिक कटुता के लिए किसी एक दल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन पाक-साफ भी कोई नहीं नजर आता.

संसद का बजट सत्र राष्ट्रपति के अभिभाषण से शुरू होने की परंपरा है. व्यापक चर्चा और उस पर प्रधानमंत्री के जवाब के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पारित होता है, लेकिन इस बार लोकसभा में ऐसा नहीं हुआ. 2004 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही पांच फरवरी को ध्वनि मत से धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा.

2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी विपक्ष के हंगामे के चलते जवाब नहीं दे पाए थे और उसके बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना पड़ा था. दरअसल इस बार अभिभाषण पर चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री को चार फरवरी की शाम पांच बजे देना था, लेकिन चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अपनी बात कहने का मौका न मिलने के जवाब में विपक्षी हंगामे के चलते सदन स्थगित करना पड़ा.

विपक्ष का संदेश था कि अगर उसके नेता को नहीं बोलने दिया गया तो वह भी सदन के नेता यानी प्रधानमंत्री को नहीं बोलने देगा, पर इस टकरावपूर्ण राजनीति से दांव पर संसद की साख लग रही है.संसद में राष्ट्रपति और विधानमंडलों में राज्यपाल क्रमश: केंद्र और राज्य  सरकारों द्वारा मंजूर अभिभाषण ही पढ़ते हैं. इनमें सरकारों के कामकाज की प्रशंसा करते हुए भविष्य की रूपरेखा बताई जाती है.

अभिभाषण में उल्लेखित सभी बिंदुओं पर सदन में चर्चा हो सकती है, लेकिन उसकी कुछ प्रक्रियाएं-परंपराएं हैं. जब परस्पर अविश्वास और कटुता चरम पर हो तो तकरार के लिए मुद्दों की कमी नहीं रहती, लेकिन संसद के बजट सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष में जारी तकरार के मूल में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की प्रकाशनाधीन पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के कुछ अंशों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है.

प्रधानमंत्री के जवाब बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण इसलिए भी है कि इससे बचा जा सकता था. सदन में तनातनी बढ़ाने के बजाय स्पीकर की मध्यस्थता से दोनों ही पक्षों को मध्य मार्ग निकालना चाहिए था. दरअसल दोनों ही पक्षों में समन्वय के बजाय टकराव की राजनीति पसंद करनेवाले लोग ज्यादा मुखर और प्रभावी नजर आते हैं.  

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