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झीलों को बीमार कर रहा माइक्रोप्लास्टिक

By पंकज चतुर्वेदी | Updated: April 20, 2026 06:59 IST

एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर की झीलों और जलाशयों में प्रति वर्ग किलोमीटर लाखों की संख्या में माइक्रोप्लास्टिक कण तैर रहे हैं, जो पानी के साथ-साथ हमारी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन चुके हैं.

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शहरों की जीवनरेखा कही जाने वाली झीलें आज एक ऐसे अदृश्य और घातक संकट की गिरफ्त में हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘माइक्रोप्लास्टिक’ कहा जाता है. यह प्रदूषण केवल तैरते हुए प्लास्टिक के बैग या बोतलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सूक्ष्म कणों का जाल है जो हमारी आंखों से ओझल होकर जल, जीवन और भविष्य को निगल रहे हैं. हाल के वर्षों में हुए वैश्विक और भारतीय शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी झीलों में जमा हो रहा यह कचरा केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि एक गंभीर पारिस्थितिकीय आपातकाल है. आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो स्थिति भयावह है; एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर की झीलों और जलाशयों में प्रति वर्ग किलोमीटर लाखों की संख्या में माइक्रोप्लास्टिक कण तैर रहे हैं, जो पानी के साथ-साथ हमारी खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन चुके हैं.

यह समझना आवश्यक है कि यह सूक्ष्म प्लास्टिक झीलों तक पहुंच कैसे रहा है. शोध बताते हैं कि इसके पीछे आधुनिक शहरी जीवन के कई छिपे हुए स्रोत हैं. अतिवृष्टि या झंझा नीर (स्टॉर्म वॉटर) इसका सबसे बड़ा वाहक बनकर उभरा है. जब शहरों में भारी वर्षा होती है, तो सड़कों पर जमा टायर के घिसे हुए सूक्ष्म कण, मलबे और प्लास्टिक की धूल पानी के साथ बहकर सीधे झीलों में समा जाती है. इसके अलावा, हमारे शहरों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, जिन्हें हम पानी साफ करने का माध्यम मानते हैं, वे भी इस संकट को रोकने में विफल सिद्ध हो रहे हैं. अधिकांश मौजूदा तकनीकें पांच मिलीमीटर से छोटे कणों को छानने में अक्षम हैं. परिणामस्वरूप, वाशिंग मशीन से निकलने वाले सिंथेटिक कपड़ों के लाखों सूक्ष्म रेशे और घरेलू कचरे का बारीक हिस्सा सीधे इन जल निकायों का हिस्सा बन जाता है. उदाहरण के लिए, बेंगलुरु की बेलंदूर और वरथुर जैसी झीलों पर हुए अध्ययनों में पाया गया है कि वहां के तलछट में माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता चिंताजनक स्तर पर है.

इन झीलों में रहने वाले जलचरों और मानव शरीर पर इसके कुप्रभावों को लेकर हुए शोध रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं. झीलों में रहने वाली मछलियां और अन्य सूक्ष्म जीव इन प्लास्टिक कणों को आहार समझकर निगल लेते हैं. वैज्ञानिकों ने इसे ‘ट्रोजन हॉर्स’ प्रभाव का नाम दिया है. माइक्रोप्लास्टिक के ये कण पानी में मौजूद अन्य जहरीले रसायनों, जैसे पारा और कीटनाशकों को अपनी सतह पर सोख लेते हैं. जब कोई जीव इन्हें खाता है, तो वह न केवल प्लास्टिक बल्कि उन घातक रसायनों को भी अपने भीतर ले लेता है.  शहरी झीलों की 80 प्रतिशत मछलियों के पाचन तंत्र में किसी न किसी रूप में प्लास्टिक के अंश मिल रहे हैं. इससे मछलियों की प्रजनन क्षमता घट रही है और उनकी मृत्यु दर में भारी वृद्धि हुई है. यह प्रदूषण खाद्य श्रृंखला के माध्यम से हमारी थाली तक पहुंच चुका है.

 

टॅग्स :Environment Department
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