अभिलाष खांडेकर
स्वच्छ भारत मिशन के तहत आयोजित ‘सबसे स्वच्छ शहर’ प्रतियोगिता का उद्देश्य नगरपालिकाओं के ठोस कचरे का पृथक्करण और निपटान करना था. लेकिन ‘भारत के सबसे स्वच्छ शहर’ का खिताब हासिल करने वाले इंदौर में जो हुआ, वह दिल दहला देने वाला है. वहां पीने के पानी की वजह से इतनी मौतें हुईं जो अक्सर अवैध शराब की वजह से होती हैं!
यह इंदौर के शहरी प्रशासन की पूर्ण विफलता को दर्शाता है. साथ ही आपराधिक लापरवाही भी. कई महीनों तक दूषित, मल-मूत्र मिला हुआ पीने का पानी बेचारे नागरिकों को पिलाया जा रहा था. उन्होंने बार-बार अधिकारियों से ‘बदबूदार, गंदे पानी’ की शिकायत की, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी.
लगातार आठ वर्षों तक सबसे स्वच्छ शहर घोषित होने के बावजूद इंदौर की अपनी कुछ सीमाएं थीं. इंदौर ने नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में अन्य शहरों के लिए एक बेहतर उदाहरण स्थापित किया, खुले में शौच को हतोत्साहित किया और व्यावहारिक बदलावों के माध्यम से कूड़े-कचरे को कम किया. क्या स्वच्छ जल आपूर्ति उनकी जिम्मेदारी नहीं थी? क्योंकि स्वच्छता अभियान में इसे शामिल नहीं किया गया था?
स्वच्छ पेयजल के लिए पर्याप्त बजट आवंटित होने के बावजूद सरकार द्वारा इस मुद्दे पर कोई ध्यान न दिए जाने के कारण मध्यप्रदेश नगर निगम अब घोर विवादों में घिर गया है. जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया की राष्ट्रीय संयोजक अमूल्य निधि का कहना है कि मध्यप्रदेश को कई साल पहले इंदौर सहित नगर निकायों के जल आपूर्ति नेटवर्क में सुधार के लिए एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से 800 करोड़ रुपए का ऋण मिला था. इसके बाद जेएनएनआरयूएम, स्मार्ट सिटी मिशन और अब अमृत 2.0 की शुरुआत हुई है. फिर भी वही ढाक के तीन पात.
स्पष्ट है कि शहर की ऊपरी सतह पर जमा कचरा तो साफ कर दिया गया, लेकिन अन्य मुद्दों, खासकर पीने के पानी की समस्या पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. इसमें बावड़ियों और ‘रामसर’ मान्यता प्राप्त सिरपुर झील जैसे जल निकायों पर अतिक्रमण भी शामिल है. 2023 में धंसे एक कुएं ने नगर निगम की तेजी से गिरती कार्यसंस्कृति को उजागर कर दिया था. इससे पता चलता है कि नगर निगम के अधिकारी भारी राजनीतिक और अन्य दबावों के तहत काम करते हैं, जिससे बुनियादी समस्याएं उपेक्षित ही रह जाती हैं.
वर्ष 2025 के अंत में और नए वर्ष की शुरुआत में दर्जनों मौतों ने सबको चौंका दिया. अपने ही सीवर का पानी पीने से 1200 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हुए. ये सभी लोग भागीरथपुरा के एक ही मोहल्ले के थे, जो भाजपा के ‘शक्तिशाली’ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का निर्वाचन क्षेत्र है. विजयवर्गीय यादव सरकार में दो साल से शहरी विकास मंत्री हैं, इसके अलावा वे पांच साल तक महापौर रहे और 2003 से मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार भी संभाल रहे हैं. उन्होंने इंदौर के लिए ठोस क्या किया है?
भागीरथपुरा त्रासदी भारतीय शहरों के प्रशासन की खामियों का एक छोटा सा उदाहरण मात्र है. घातक जीवाणुओं से दूषित पानी की सप्लाई बेहद निंदनीय है, लेकिन यह समस्या अन्य शहरी क्षेत्रों में भी देखी जा रही है, गुजरात में भी. बेहद गंदी संकरी गलियां, सीवेज लाइनों का पानी की पाइपों से जुड़ना, संदिग्ध निजी ठेकेदारों द्वारा किए गए घटिया निर्माण कार्य और इंजीनियरिंग विभागों द्वारा उचित पर्यवेक्षण का अभाव- इन सभी कारणों से अनेक निर्दोष लोगों की जान चली गई, पर किसी नेता ने इस्तीफा नहीं दिया.
उदाहरण के लिए, 2015 में स्नेह नगर इलाके में, जो बैंक अधिकारियों और व्यापारियों की एक पॉश कॉलोनी है, महीनों तक पीला पानी आता था जो पीने लायक नहीं था. नागरिकों ने अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. कई गृहिणियों को लगभग हर दिन अपनी भूमिगत और ओवरहेड टंकियों को मेहनत से साफ करना पड़ता था और मुख्य नलों से साफ पानी आने का इंतजार करना पड़ता था. ‘‘भागीरथपुरा जैसी मौतें हमारी कॉलोनी में भी हो सकती थीं’’ स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के एक पूर्व अधिकारी याद करते हैं.
भारत में शहरी प्रशासन, विशेषकर बहुचर्चित स्मार्ट सिटी मिशन के समाप्त होने के बाद, स्मार्टनेस पर संदेह पैदा होता रहा है. यदि नगर प्रबंधक (महपौर आदि) स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं करा सकते, तो इसे ‘स्मार्ट सिटी’ कैसे कहा जा सकता है? कुछ साल पहले इंदौर के बारे में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए थे. रिपोर्ट में पाया गया था कि निगम में पाइपलाइनों में रिसाव का पता लगाने वाला कोई प्रकोष्ठ मौजूद नहीं था; पानी के नमूनों में मल-मूत्र की उपस्थिति और गंदगी पाई गई थी, और शहर के जलकुंडों की कई महीनों से सफाई नहीं की गई थी.
यह कम से कम सात-आठ साल पहले की बात है. कैग ने निवासियों को असुरक्षित पानी, जिसमें ट्यूबवेल का पानी भी शामिल है, के कारण जलजनित बीमारियों के बारे में भी चेतावनी दी थी. लेकिन कैग की रिपोर्ट की परवाह कौन करता है? निगम का जल कार्यों के लिए बजट लगभग 1,500 करोड़ रुपए था, जबकि नवीनतम कुल बजटीय अनुमान 8,500 करोड़ रुपए था.
इस कहानी का दुखद पहलू यह है कि संविधान संशोधनों के माध्यम से शक्तियों का विकेंद्रीकरण सुनिश्चित हो गया और कई वर्षों से निर्वाचित सदस्य स्थानीय निकायों का संचालन कर रहे हैं, फिर भी नगर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने शिकायत की कि अधिकारी उनकी बात सुनने से इनकार करते रहे. महापौर ने बैठकें बुलाईं और आयुक्त एवं अतिरिक्त आयुक्तों सहित अधिकारियों का इंतजार किया, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए, जो हमारे तथाकथित जन-केंद्रित लोकतांत्रिक तंत्र में गहरी खामी को दर्शाता है.
दुनिया के सबसे स्वच्छ शहर में हुई यह भयावह घटना शायद टाली जा सकती थी, लेकिन भारतीय शहरों में शासन के मौजूदा स्वरूप के तहत, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऐसी भयानक मानवीय त्रुटि दोबारा नहीं होगी.