31 अक्तूबर 1984 का दिन जिन्हें याद होगा वे इसे अवश्य स्वीकार करेंगे तत्कालीन प्रधानमंत्नी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में शोक का ऐसा माहौल बना था मानो उनके परिवार का ही कोई सदस्य बिछुड़ गया हो। उसके बाद हुए चुनाव में हमने देखा कि किस तरह राजीव गांधी को देश ने भारत के संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत दिया।
वस्तुत: शासन का नेतृत्व करने वाला कोई व्यक्तित्व ऐसा नहीं होगा जिसके कार्यो में गुण के साथ दोष न तलाशे जा सकें, जिनकी आलोचनाएं न हों। इंदिराजी भी इसका अपवाद नहीं थीं। किंतु आज शांत होकर सोचिए, स्वयं कांग्रेस के अंदर जिन बड़े कद के नेताओं से उनका सामना हुआ उन सबको पीछे छोड़कर देश का जनमत प्राप्त करना सामान्य बात थी क्या? प्रधानमंत्नी बनने के बाद पार्टी के अंदर नेतृत्व को मिल रही भारी चुनौतियों से निपटीं।
बावजूद इसके जब यह साफ हो गया कि उनके नेतृत्व को अभी भी एक समूह स्वीकारने को तैयार नहीं तो उन्होंने समय पूर्व लोकसभा को भंग कर 1971 में आम चुनाव कराया और जनता ने उनको पूर्ण बहुमत दिया। उस समय की परिस्थितियों पर अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं और इसके पीछे के अनेक पहलुओं को सबमें उकेरा गया है। किंतु जनता को अपने साथ ले आने की चुनौती थी और उसमें वे सफल हुईं। =
बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक ऐसा कदम था जिसकी बात तो पहले भी हुई थी, लेकिन उसे अमल में लाने का कदम इंदिरा गांधी ने ही उठाया। यह भारत की परंपरागत बैंकिंग व्यवस्था के वर्णक्रम बदलने का कदम था। इंदिराजी के मूल्यांकन के लिए उनके कार्यकाल की दो घटनाओं का और उल्लेख करना जरूरी है। इनमें पहला है 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भारत की सेना को उतारने का निर्णय।
उस समय का भारत आज का भारत नहीं था। भारत के सामने विकट स्थिति थी। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की बर्बरता सारी सीमाओं को लांघ रही थी। लोग जान बचाकर भारत में पलायन कर रहे थे। इंदिरा गांधी ने साहसी फैसला किया और दृढ़ता से उसे परिणति तक पहुंचाया।
इस बात का भय था कि अमेरिकी सेना पाकिस्तान के समर्थन में हस्तक्षेप कर सकती है। ज्यादा आगा-पीछा सोचने वाला कोई नेता होता तो भारत को त्नाहिमाम कर रही जनता को पाकिस्तान की निरंकुशता से आजाद कराने, इतनी बड़ी विजय तथा पाकिस्तान को तोड़ने का श्रेय नहीं मिलता। ठीक उसके तीन साल से कम के अंतराल में पोखरण में नाभिकीय विस्फोट करके उन्होंने पूरी दुनिया को चौंका दिया था। चीन के घोषित नाभिकीय शक्ति बनने तथा पाकिस्तान द्वारा चोरी-चोरी नाभिकीय बम बनाने की तैयारी के बाद पैदा हुए सामरिक असंतुलन को खत्म करने का यही रास्ता था।