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दिनकर कुमार का ब्लॉगः असम विस चुनाव से पहले भाजपा का ध्रुवीकरण का खेल

By दिनकर कुमार | Updated: October 15, 2020 14:50 IST

भाजपा अच्छी तरह जानती है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विकास के मुद्दों पर आम जनता से वोट नहीं मांग सकती. चुनाव जीतने के लिए उसके पास एक ही ब्रह्मास्त्र है- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण.

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भाजपा अच्छी तरह जानती है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे विकास के मुद्दों पर आम जनता से वोट नहीं मांग सकती. चुनाव जीतने के लिए उसके पास एक ही ब्रह्मास्त्र है- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण. असम में इसी तरह की नफरत की राजनीति करते हुए 2016 में भाजपा ने सत्ता हासिल की थी. अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिसात बिछाते हुए भाजपा ने एक बार फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल शुरू कर दिया है.

असम के शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्त मंत्री हिमंत बिस्व शर्मा ने कहा है कि भाजपा 2021 में विस चुनाव से पहले ‘लव जिहाद’ मामलों के खिलाफ एक अभियान शुरू करेगी. मंत्री ने कहा, ‘जब भाजपा वापस सत्ता में आएगी तो हम यह सुनिश्चित करेंगे कि अगर किसी असमिया लड़की को परेशान किया जाता है और सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाता है, तो हम उन्हें जेल में डाल देंगे.’ शर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि असम में इसके पीछे अजमल की संस्कृति के लोग (एआईयूडीएफ लोकसभा सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल का संदर्भ) काम कर रहे हैं. अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रे टिक फ्रंट) को लोअर असम में बंगाली मुसलमानों का व्यापक समर्थन है, जिन्हें अक्सर बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासी के रूप में देखा जाता है. उन्होंने कहा, ‘अजमल के लोगों ने अपना अतिक्र मण अभियान शुरू किया और ऊपरी असम में प्रवेश करने की भी कोशिश की. इस पृष्ठभूमि के खिलाफ हमने (मुख्यमंत्री सर्बानंद) सोनोवाल के नेतृत्व में सत्ता संभाली.’

यह दावा करते हुए कि राज्य की 65 प्रतिशत आबादी, ‘जो भारतीय मूल के हैं’, 35 प्रतिशत वाली ‘अजमल की संस्कृति को हराएगी.’ शर्मा ने यह भी कहा कि ‘सराईघाट की लड़ाई खत्म नहीं हुई है.’ सराईघाट की लड़ाई 1671 में मुगल और आहोम सेना के बीच लड़ी गई थी, जिसमें आहोम सेना की जीत हुई थी. भाजपा ने 2016 के चुनाव में भी सराईघाट युद्ध का नारा बुलंद कर मुसलमानों के खिलाफ ध्रुवीकरण का वातावरण बनाया था.

इससे पहले एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, ‘मुगलों का आक्र मण अभी भी जारी है. यह बहुत स्पष्ट है. असम की धरती के बेटे अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. असम केवल तभी सुरक्षित रहेगा जब हम सभी आने वाले दिनों में विदेशियों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ेंगे.’ जब से कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने विस चुनाव मिलकर लड़ने की घोषणा की है, भाजपा के सबसे बड़े कद्दावर नेता हिमंत बिस्व शर्मा बदरुद्दीन अजमल पर खुलकर हमला कर रहे हैं.

असम को सांप्रदायिक सौहार्द्र वाला राज्य माना जाता है और इस राज्य में सर्वधर्म समभाव की लंबी परंपरा रही है. इस राज्य में भूमि और जातीय पहचान को लेकर समय-समय पर भले ही हिंसक संघर्ष होते रहे हैं, लेकिन सांप्रदायिक आधार पर संघर्ष का कोई इतिहास नहीं रहा है. अस्सी के दशक में हुए नेल्ली नरसंहार के पीछे भी दक्षिणपंथियों का हाथ था, जब भारी संख्या में अल्पसंख्यकों की हत्या की गई थी. जिस समय बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया था उस समय भी असम में कोई हिंसक तनाव नहीं देखा गया था. असम में संघ परिवार ने देर से उग्र हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार शुरू किया और बांग्लादेशी मुसलमानों के नाम पर सभी मुसलमानों के खिलाफ स्थानीय हिंदुओं की भावना को भड़काने का खेल शुरू हो गया.

2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद असम में अचानक सांप्रदायिक झड़पों की घटनाएं शुरू हो गईं. 2015 में राज्य में इस तरह की 70 घटनाएं हुईं. इसी उग्र हिंदुत्व की राजनीति को ईंधन बनाकर असम में भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की. राज्य में गोमांस को मुद्दा बनाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल शुरू हो गया. उसके बाद एनआरसी की प्रक्रिया के जरिये मुसलमानों का दमन किया गया.

टॅग्स :असमभारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)
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