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दिल्ली मेंं लगातार चौथी बार कांग्रेस का सूपड़ा साफ, इन 6 वजहों से फिर नहीं खुला पार्टी का खाता

By निखिल वर्मा | Updated: February 11, 2020 16:42 IST

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ठळक मुद्देचुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, कांग्रेस को सिर्फ 4.29 फीसदी वोट मिले.महाराष्ट्र-झारखंड में सरकार बनने के बाद दिल्ली कांग्रेस पार्टी के लिए सदमे की तरह है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में आम आदमी पार्टी लगातार दूसरी बार बंपर सीटों के साथ सरकार बना रही हैं। वहीं 48 सीटें जीतने का दावा करने वाली बीजेपी दहाई अंक तक भी नहीं पहुंची। सबसे बुरा हाल कांग्रेस पार्टी का रहा। लोकसभा चुनाव 2014, विधानसभा चुनाव 2015, लोकसभा चुनाव 2019 के बाद लगातार चौथी बार कांग्रेस पार्टी का खाता नहीं खुला। 15 सालों तक दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का राज रहा लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस का वोटबैंक भी खत्म हो गया। कांग्रेस की इतनी करारी हार के 6 बड़े कारण-

चुनाव से पहले वॉक ओवर

सोशल मीडिया की बात हो या राजनीतिक रैलियों की, कांग्रेस पार्टी कहीं दिख नहीं रही थी। आम आदमी पार्टी की तरफ से जहां अरविंद केजरीवाल ने कमान संभाली तो बीजेपी की तरफ गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और सैकड़ों संसद जनता के बीच पहुंचे। दोनों पार्टियों के इतने आक्रामक प्रचार के बीच कांग्रेस शुरुआत में ही पिछड़ती दिखी। 

कांग्रेस नेताओं में सक्रियता की कमी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनौपचारिक रूप से दिल्ली चुनाव का शंखनाद 22 दिसंबर को ही रामलीला मैदान में बीजेपी के धन्यवाद रैली से कर दी थी। इसके अलावा भी अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच पीएम मोदी द्वारका और कड़कड़डूमा ने संबोधित किया। वहीं चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी उतरे। कांग्रेस पार्टी को अपने शीर्ष नेताओं को पहले ही चुनाव प्रचार में उतार देना चाहिए था।

पूरा वोट बैंक आप में चला गया

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में कांग्रेस को करीब 25 फीसदी वोट मिले थे और पार्टी ने 8 सीटों पर जीत हासिल की थी। पिछले विधानसभा में कांग्रेस को सिर्फ 9.75 फीसदी वोट मिले और इस बार सिर्फ 5 फीसदी वोट मिलता दिख रहा है। हालांकि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 में 22 फीसदी मत हासिल किया था। उस समय दिल्ली के वोटरों ने आप की तुलना में कांग्रेस के पक्ष में ज्यादा मतदान किया था। दिल्ली कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने कहा कि दोनों पार्टियों ने ध्रुवीकरण करने की कोशिश की और कुछ हद तक वो कामयाब भी रहे।

दिल्ली की जनता से कटे

दिल्ली में इस बार शिक्षा, बिजली और पानी का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। आम आदमी पार्टी ने पूरा चुनाव इन्हीं मुद्दों पर लड़ा। बीजेपी ने लगातार शिक्षा-पानी के मुद्दे पर केजरीवाल सरकार को घेरा। कुल मिलाकर ये मुद्दा जनता से जुड़ा हुआ था लेकिन कांग्रेस इन मुद्दों पर राजनीति करती नहीं दिखी।

शीला दीक्षित जैसा चेहरा दूसरा नहीं तैयार कर पाई कांग्रेस

1998 से 2013 तक लगातार कांग्रेस पार्टी दिल्ली की सत्ता में रही और दिवंगत नेत्री शीला दीक्षित ने नेतृत्व संभाला। पार्टी शीला दीक्षित के बाद उनके कद का नेता नहीं खड़ा कर पाई। दिल्ली कांग्रेस में अजय माकन और अरविंदर सिंह लवली हैं लेकिन वो शीला दीक्षित की लेगैसी को आगे नहीं बढ़ा पाए।

गुटबाजी भी हावी रही

बीजेपी-आप दिल्ली में लगातार चुनावी मोड में दिखे लेकिन कांग्रेस इलेक्शन से तीन महीने पहले तक अपना अध्यक्ष ही नहीं खोज पाई थी। आखिरकार सुभाष चोपड़ा को अक्टूबर 2019 में कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। 

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