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प्रमोद भार्गव का ब्लॉगः चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालते नक्सली     

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: November 10, 2018 05:36 IST

अब दंतेवाड़ा जिले के बचेली इलाके के खदान क्षेत्र में एक बस को उड़ा दिया। पिछले 15 दिन में हुए ये हमले इस बात की तस्दीक हैं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र मजबूत है और पुलिस व गुप्तचर एजेंसियां इनका सुराग लगाने में नाकाम हैं।

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प्रमोद भार्गव

नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ में 12 नवंबर को होने वाले मतदान के पहले चरण के 4 दिन पहले बड़ी वारदात करके लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया में दखल देने की एक बार फिर नाकाम कोशिश की है। इसके पहले 30 अक्तूबर को दंतेवाड़ा में पुलिस व मीडिया टीम पर हमला किया था। नक्सलियों ने 27 अक्तूबर को बीजापुर जिले में बुलेटप्रूफ बंकर वाहन को उड़ाया।

अब दंतेवाड़ा जिले के बचेली इलाके के खदान क्षेत्र में एक बस को उड़ा दिया। पिछले 15 दिन में हुए ये हमले इस बात की तस्दीक हैं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र मजबूत है और पुलिस व गुप्तचर एजेंसियां इनका सुराग लगाने में नाकाम हैं। क्योंकि ताजा हमला उस वक्त हुआ है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जगदलपुर में चुनावी सभा के लिए 9 नवंबर को जाने वाले थे। नक्सलियों ने जिस निजी बस को निशाना बनाया है, वह राष्ट्रीय खनन विकास निगम के बैलाडीला खनन क्षेत्र में तैनात सीआईएसएफ दल को चुनाव ड्यूटी के लिए बचेली ले जा रही थी।  

इस हमले से यह सच्चाई सामने आई है कि नक्सलियों का तंत्र और विकसित हुआ है, साथ ही उनके पास सूचनाएं हासिल करने का मुखबिर तंत्र भी है। हमला करके बच निकलने की रणनीति बनाने में भी वे सक्षम हैं। इसीलिए वे अपनी कामयाबी का झंडा फहराए हुए हैं। बस्तर के इस जंगली क्षेत्र में नक्सली नेता हिडमा का बोलबाला है। वह सरकार और सुरक्षाबलों को लगातार चुनौती दे रहा है, जबकि राज्य एवं केंद्र सरकार के पास रणनीति की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र में जब भी कोई विकास कार्य या चुनाव प्रक्रिया संपन्न होती है तो नक्सली उसमें रोड़ा अटकाते हैं। यदि छत्तीसगढ़ सरकार के विकास संबंधी विज्ञापनों में दिए जा रहे आंकड़ों पर भरोसा करें तो छत्तीसगढ़ की तस्वीर विकास के मानदंडों को छूती दिख रही है, लेकिन इस अनुपात में यह दावा बेमानी है कि समस्या पर अंकुश लग रहा है। बल्कि अब छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बन गया है।  

इस पूरे क्षेत्र में माओवादियों ने चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया हुआ है। हालांकि माओवादी ऐसा हरेक चुनाव में करते हैं, इसके बावजूद स्थानीय लोग मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। इससे जाहिर होता है कि लोगों का विश्वास लोकतंत्र में है। माओवादी आतंक का सहारा लेकर मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर डालना चाहते हैं, इसलिए वे बारूदी विस्फोट का सहारा लेकर खून की इबारतें लिखने में लगे हैं। चुनाव निर्बाध रूप से संपन्न हो इसलिए चुनाव आयोग ने 65 हजार अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कराई है। माओवादी मंशा को चकनाचूर करने की दृष्टि से केंद्रीय सुरक्षाबल हरेक नक्सलबहुल क्षेत्र में तैनात हैं। पहले चरण में 18 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है। सुरक्षाबलों की इतनी तैनाती इसलिए है, जिससे लोग घरों से आश्वस्त होकर निकलें और निर्भय होकर मतदान करें। मतदान का बड़ा प्रतिशत ही आतंक का सही जवाब है।

टॅग्स :विधानसभा चुनावछत्तीसगढ़ चुनावनक्सल
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