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ब्लॉग: विपक्षी एकता का संकल्प कितना मजबूत ?

By राजेश बादल | Updated: April 2, 2024 12:23 IST

करीब-करीब आधी सदी से भारत में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ प्रतिपक्षी एकता की बात हो रही है। जब चुनाव निकट आते हैं तो एकता के सुर विपक्षी दलों के गले से फूटने लगते हैं।

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ठळक मुद्देचुनाव संपन्न हो जाने के बाद दलों की एकता के तार टूटने लगते हैं, गठबंधन नये आकार लेते हैंयदि गठबंधन नाकाम रहा तो अपने हितों को ध्यान में रखते हुए यह दल नए समझौते करने लगते हैंभारत में इन गठबंधनों को तात्कालिक लाभ तो मिला, लेकिन बाद में मतभेदों के कारण वो टूटते रहे

करीब-करीब आधी सदी से भारत में सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ प्रतिपक्षी एकता की बात हो रही है। जब चुनाव निकट आते हैं तो एकता के सुर विपक्षी दलों के गले से फूटने लगते हैं। चुनाव संपन्न हो जाने के बाद एकता के तार टूटने लगते हैं और नए ढंग से गठबंधन आकार लेने लगता है।

यदि विपक्षी गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रहा तो सत्ता की मलाई खाने के लिए यह दल साथ चलते रहते हैं। यदि गठबंधन नाकाम रहा तो अपने हितों को ध्यान में रखते हुए यह दल नए समझौते करने लगते हैं। ऐतिहासिक रामलीला मैदान में रविवार को इंडिया गठबंधन की रैली इस परंपरा में एक कड़ी मानी जा सकती है।

अनेक सवालों के बीच इतनी अधिक संख्या में विपक्षी पार्टियों के मुखियाओं का एक मंच पर आना भारतीय लोकतांत्रिक सेहत के बारे में आशा तो बंधाता है लेकिन स्थानीय स्तर पर विरोधाभासी सियासी समीकरणों के चलते गठबंधन के टिकाऊ होने पर संदेह भी उपजता है।

दिल्ली का यह रामलीला मैदान साक्षी है कि जब-जब कोई राजनीतिक संदेश देने के लिए यहां जमावड़ा हुआ तो वह बेकार नहीं गया। पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पहले और दूसरे आम चुनाव के बीच कुछ विराट सभाएं इस मैदान में कीं। जिस तरह का संदेश देने के लिए उनकी रैली अथवा सभाएं हुईं, वह कमोबेश सफल रहा। उनके बाद 1971 में बांग्लादेश निर्माण के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत के लोगों को उस दौर का हाल बयान करने के लिए इसी मैदान का इस्तेमाल किया।

बताने की आवश्यकता नहीं कि वे भी अपने मकसद में कामयाब रहीं। इसके बाद जून 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के विरोध में यहां से इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और कांग्रेस पार्टी के हाथ से सत्ता निकल गई। इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी सरकार के विरुद्ध इसी मैदान से हुंकार भरी और परिणाम उनके लिए भी अनुकूल रहे। फिर 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में बड़ी सभा इसी रामलीला मैदान में हुई। यह सभा भी जनमत की सोच बदलने में कामयाब रही।

लब्बोलुआब यह कि जम्हूरियत पसंद हर देश में कुछ ऐसे प्रतीक होते हैं, जो लोगों तक लोकतांत्रिक खुराक पहुंचाने का काम करते हैं। इन प्रतीकों की अपनी खास भूमिका होती है। हालांकि भारत में इन गठबंधनों को तात्कालिक लाभ तो मिला, लेकिन बाद में वे मतभेदों के कारण टूटते-फूटते रहे। आजादी के बाद बना सबसे महत्वपूर्ण साझा मोर्चा जनता पार्टी की शक्ल में सामने आया।

मगर वह तीन साल पूरे होते-होते मतभेदों की वजह से बिखर गया। कुछ ऐसा ही विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनमोर्चा का हश्र हुआ। अनुभव कहता है कि इन गठबंधनों में शामिल छोटे और प्रादेशिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं रह पाता। वे अपने सियासी स्वार्थों के कारण ठोस वैचारिक धुरी पर नहीं टिके रह पाते और उन गठबंधनों के साथ कभी जुड़ते हैं तो कभी अलग हो जाते हैं। इस तरह गठबंधन का सैद्धांतिक पक्ष कमजोर होता है।

प्रश्न है कि क्या इंडिया गठबंधन में शामिल दल चुनाव तक या चुनाव के बाद भी एकजुट रहेंगे? इस गठबंधन में तीन तरह की पार्टियां शामिल हैं। एक तो वे जो कांग्रेस के साथ हरदम साथ खड़ी रही हैं। लालू यादव की आरजेडी, शरद पवार की अगुआई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, डीएमके यानी द्रविड़ मुनेत्र कषगम और वामदलों जैसी पार्टियां भरोसेमंद श्रेणी में रखी जा सकती हैं। इनका साथ नहीं टूटा।

दूसरी श्रेणी में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना, उमर फारुक की सदारत वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और हेमंत सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा रखे जा सकते हैं। इंडिया गठबंधन फिलहाल इन पर भरोसा कर सकता है। मेरी दृष्टि में तीसरी श्रेणी के दलों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी रखी जा सकती है।

इन पार्टियों को तीसरी श्रेणी में रखने का कारण यह है कि वे कभी भी, किसी भी वजह से गठबंधन छोड़ सकती हैं। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस अपने प्रतिनिधि के रूप में डेरेक ओ ब्रायन को इंडिया गठबंधन की रैली में भेजती है, जो ऐलान करते हैं कि उनकी पार्टी हर हाल में इंडिया गठबंधन के साथ है, मगर उसी दिन महुआ मोइत्रा की प्रचार सभा में पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी साफ-साफ कहती हैं कि गठबंधन बंगाल के लिए नहीं है। इसलिए उन्होंने सभी सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं और प्रचार भी जोर-शोर से शुरू कर दिया।

अब तृणमूल कांग्रेस का असर बंगाल से बाहर तो है नहीं। ऐसे में ममता बनर्जी के कथन का क्या अर्थ लगाया जाए ? सीधा सा अर्थ यही है कि अपने-अपने दम पर पार्टियां लड़ें. चुनाव के बाद यदि इंडिया गठबंधन इतनी सीटें जीत जाए कि वह सरकार बनाने की स्थिति में हो तो फिर इंडिया में शामिल होने पर तृणमूल कांग्रेस विचार कर सकती है।

जहां तक आम आदमी पार्टी की बात है तो अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने काफी हद तक उसे इंडिया में शामिल होने पर मजबूर भी किया है अन्यथा इससे पहले उसका सियासी सफर भी अकेले चलने की हिमायत करता रहा है। कहा जा सकता है कि गठबंधन का भविष्य चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगा।

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