Blog: Crisis on the King of the Jungle in Gujarat 23 gir lion died in last supreme court raised concern | गुजरात में जंगल के राजा पर संकट, पिछले 22 दिनों में हुई 23 शेरों की मौत, सुप्रीम कोर्ट भी चिंतित
गुजरात के गिर सिंह अभयारण्य के शरों की फाइल फोटो।

राजेश कुमार यादव

गुजरात के गिर में शेरों की लगातार हो रही मौत ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। 12 सितंबर 2018 से अब तक कुल 23 शेरों की मौत हो चुकी है।

शेरों की मौत के बाद यह भी सामने आया कि गिर शेरों में सीडीवी की मौजूदगी के बारे में 2011 से गुजरात के वन विभाग को दो बार आगाह किया गया था।

असल खतरे की बात यह है कि यह वही वायरस है जिसने तंजानिया के सेरेंगेटी रिजर्व में 1994 के दौरान 1000 शेरों की जान ली थी और पूरी दुनिया सकते में आ गई थी। 

पूरे विश्व में शेर की दो प्रमुख प्रजातियां हैं। इनमें पहला एशियाटिक शेर और दूसरा अफ्रीक्री शेर हैं। भारत में एशियाटिक शेर सिर्फ गिर वन में ही है। इन्हें भारत का गर्व कहा जाता है।

इस समय गुजरात के गिर अभयारण्य में करीब पांच सौ एशियाई शेर हैं। लेकिन शेरों के लिए अभयारण्य का इलाका छोटा पड़ता जा रहा है।

इससे उनके व्यवहार, प्रजनन प्रक्रिया पर तो असर पड़ता ही है, संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।  इसी तरह के किसी संक्रमण से भारतीय शेरों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ, जिसमें जस्टिस एस।

भारतीय शेरों के लुप्त होने के ख़तरा

राधाकृष्णन और चंद्रमौली कुमार प्रसाद शामिल थे, ने अप्रैल 2013 में आदेश दिया कि गुजरात के कुछ एशियाई शेरों को पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के पालपुर कुनो अभयारण्य में भेज दिया जाए। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि भारतीय शेरों की यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है और उसे दूसरे घर की आवश्यकता है।

अदालत ने कहा कि शेरों का दूसरी जगह भेजने का काम इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन आॅफ नेचर (आईयूसीएन) के दिशानिर्देश के अनुसार किया जाना चाहिए। किंतु आज तक आईयूसीएन के दिशानिर्देशों के अनुसार अध्ययन  तक नहीं किया गया है। 

मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। देहरादून स्थित शीर्ष वन्यजीव संस्थान वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया के शोधकर्ताओं ने भी किसी तरह की प्राकृतिक आपदा या महामारी से बचाने के लिए गिर के 40 शेरों को गुजरात से मध्यप्रदेश के पालपुर कुनो अभयारण्य भेजे जाने का समर्थन किया है।

पालपुर कुनो अभयारण्य में इस प्रजाति के लिए अनुकूल वातावरण मुहैया कराने के लिए सभी सुविधाएं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शेरों का स्थानांतरण उनके लिए लाइफ इंश्योरेंस जैसा है।

(लेखक महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी अधिकारी हैं।)


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