BLOG: Bahupati pratha in india | 21वीं सदी में भी यहां हर घर में द्रौपदी, लेकिन कब तक इस नाम पर लड़कियों की जिंदगी होगी बर्बाद

आपको इस ब्लॉग का शीर्षक पढ़कर थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि आखिर महाभारत के द्रौपदी के नाम पर लड़कियों की जिंदगी कैसे बर्बाद हो रही है? आप भी यही सोच रहे होंगे कि आज के वक्त में भी महाभारत वाला युग कहां से आ गया। आखिर ये कैसे हो सकता है कि एक दुल्हन के इतने सारे दूल्हे कैसे हो सकते हैं। मैं भी ऐसे ही चौंक गई थी, जब एक दिन मैंने एक टीवी शो में इस प्रथा के बारे में सुना। इस प्रथा को बहुपति प्रथा कहते हैं। इस प्रथा के मुताबिक एक महिला की शादी एक परिवार के सारे भाईयों से की जाती है। नतीजन एक लड़की के दो, तीन या कभी-कभी छह पति भी हो जाते हैं। 

यह प्रथा उत्तराखंड के जौनसार बावर, दक्षिणी कश्मीर के हिमालयी क्षेत्रों में, नीलगिरि के टोडा, त्रावणकोर के नायर और मालावार हिल्स के इजरेह जातियों और नेपाल के लामा समुदाय में बहुपति प्रथा आज भी कायम है। इसके अलावा देहरादून की खासा जनजाति, अरुणाचल प्रदेश की गाइलोंग जनजाति, केरल के माला मदेसर, माविलन, कोटा, करवाजी, पुलाया, मुथुवान और मन्नान जातियों में भी यह प्रथा है। 

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सबसे ज्यादा ये प्रथा हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में देखने को मिलती है। इस प्रथा को यहां की भाषा में घोटुल प्रथा कहते हैं। सदियों पुरानी इस प्रथा के चलते सभी भाई एक साथ एक लड़की से शादी करते हैं। इस रि‍वाज को लेकर जो मान्यता है वह पाण्डव और द्रोपदी से जुड़ी है। मान्‍यता है कि महाभारत काल के दौरान पांडवों ने द्रौपदी और मां कुंती के साथ अज्ञातवास के कुछ पल किन्नौर जिले की गुफाओं में बि‍ताए थे। 

1911 में हुई जनगणना भी व्यापाक रूप से उन जातियों का उल्लेख है, जिसमें बहुपति प्रथा का उदारहण मिलता है। लेकिन सदियों पुरानी इस प्रथा का आज भी अंत नहीं हुआ है। इस प्रथा का आज भी लोग पालन करते हैं। इस प्रथा को मानने वालों लोगों का कहना है कि ऐसी शादियों से आने वाले संपति और दौलत संबंधी झगड़े नहीं टाले जा सकते हैं और को और कुछ लोग इसे आबादी नियंत्रित करने का जरिया भी मानते हैं। 

आज 21वीं सदी में भी ऐसे लोग हैं जो अपनी बेटी, बहनों का को जीते जी ऐसी नरक भर जिंदगी में धकेल देते हैं। जिस टीवी शो की मैं बात कर रही थी, उस शो में जो मैंने देखा देखकर मेरे रौंगटे खड़े हो गए कि कैसे एक लड़की अपने घर-परिवार और प्रथा को मानकर एक ही परिवार के तीन लड़कों से शादी करती है। शादी के बाद किस तरह वह लड़की अपने भेड़िए जैसे तीनों पति की भूख शांत करने में लगी रहती है। 

शायद ये बात कोई मर्द ना समझे लेकिन एक महिला होने के नाते मैं उस लड़की के दुख को महसूस कर पा रही थी। और दिमाग में बस यही चल रहा था कि ना जाने कितनी लड़कियां इस दर्द से गुजर रही होंगी। और हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं, बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओं की बात करते हैं। अरे भई, अगर ऐसी ही प्रथा के बोझ के नीचे आपको अपनी बेटी को दबानी है तो प्लीज मेरा नम्र निवेदन है आपसे कि मत बचाओ बेटी।

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