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Assembly Elections 2023: भाजपा के स्टार प्रचारक बने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, लोकप्रियता का बढ़ता जा रहा ग्राफ!

By हरीश गुप्ता | Updated: December 7, 2023 11:28 IST

Assembly Elections 2023: पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी सार्वजनिक सभाओं में अभूतपूर्व भीड़ जुटाई.

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ठळक मुद्देप्रधानमंत्री मोदी के बाद योगी की भारी मांग थी.निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम एक सार्वजनिक बैठक को संबोधित करें. सुनने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं क्योंकि उन्हें हिंदुओं के रक्षक के रूप में देखा जाता है.

Assembly Elections 2023: पार्टी के स्टार प्रचारक के रूप में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बढ़ते ग्राफ ने भाजपा में हलचल मचा दी  है. हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी सार्वजनिक सभाओं में अभूतपूर्व भीड़ जुटाई.

प्रधानमंत्री मोदी के बाद योगी की भारी मांग थी क्योंकि हर उम्मीदवार चाहता था कि वह निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम एक सार्वजनिक बैठक को संबोधित करें. जिन लोगों ने राजस्थान में बड़े पैमाने पर यात्रा की, वे दावा करते हैं कि लोग उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं क्योंकि उन्हें हिंदुओं के रक्षक के रूप में देखा जाता है.

राजस्थान में उन्होंने भीड़ से पूछा, ‘कन्हैया के हत्यारे अगर यूपी में होते तो उनका क्या होता?’ भीड़ ने गर्जना की, ‘बुलडोजर और गोली’. ‘बुलडोजर बाबा’ के रूप में लोकप्रिय योगी जहां भी प्रचार के लिए गए, उनकी जीत का रिकॉर्ड लगभग 85% है. योगी के बढ़ते ग्राफ ने पार्टी में हलचल मचा दी है और उनके पर कतरने की हर तरह की कोशिशें की जा रही हैं.

जबकि पीएम मोदी योगी के काम की काफी सराहना करते हैं और अक्सर अपने ट्वीट में योगी की तारीफ करते हैं. लेकिन कुछ वरिष्ठ नेता यूपी पुलिस की कार्यशैली से नाखुश हैं, विशेष रूप से गैंगस्टर और राजनेता अतीक अहमद की हत्या को लेकर. यह अलग बात है कि तीन राज्यों में जीत के बाद उनके आलोचकों के होंठ बंद हो गए हैं.

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि योगी के मंत्रिमंडल में कई मंत्री उनके आलोचक हैं. यहां तक कि सरकार के कुछ प्रमुख अधिकारी भी उनकी पसंद के नहीं हैं. लेकिन योगी ने इस स्थिति से निपटने का एक तरीका निकाला कि जब भी कोई शिकायत मिलती है तो वह मंत्री और नौकरशाह को आमने-सामने बिठा देते हैं.

वह मंत्री से कहते हैं कि रिश्वत लेना बंद करें जिससे संबंधितों को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक खबर सामने आई थी कि 2024 में मोदी के हाथ मजबूत करने के लिए योगी को गोरखपुर लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है. लेकिन अगले साल मोदी के मिशन-400 सीटों में योगी की भूमिका को देखते हुए इस विचार को कोई मानने वाला नहीं है.

नीतीश कुमार ने क्यों साधी चुप्पी!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक चुप्पी साध ली है. एक समय विपक्ष के संयुक्त प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार कहे जाने वाले नीतीश कुमार अपनी रणनीति खो चुके हैं. पटना से आ रही रिपोर्टों में कहा गया है कि पिछले महीने महिलाओं की शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण के बारे में नीतीश कुमार की टिप्पणी उनके मनमौजी व्यवहार का एकमात्र उदाहरण नहीं थी.

वह सहकर्मियों के साथ रोजमर्रा की बातचीत और यहां तक कि सार्वजनिक मंचों पर भी भुलक्कड़ हो गए हैं. गठबंधन सहयोगियों को चिंता है कि नीतीश कुमार का विवादास्पद व्यवहार न केवल बिहार में बल्कि बाहर भी पूरे गठबंधन को खतरे में डालने वाला एक बार-बार होने वाला मुद्दा न बन जाए.

अपुष्ट खबरों में कहा गया है कि वह हाल ही में अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी अशोक चौधरी के दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि देने उनके आवास पर गए थे. उनके पिता के शव पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बजाय, नीतीश कुमार ने चौधरी को माला पहना दी जिससे पूरे परिवार और उपस्थित अन्य लोगों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी.

इससे पहले, वह एक कप चाय के लिए पार्टी के एक अन्य सहयोगी के घर गए और 30 मिनट के भीतर यह कहकर घर से निकल गए कि वह चाय लेना भूल गए हैं. जबकि जद (यू) नेता ऐसी खबरों को पूरी तरह से खारिज करते हैं, सूत्रों का कहना है कि उम्र तेजी से नीतीश कुमार पर हावी हो रही है.

हो सकता है कि उन्हें कोई न्यूरो समस्या हो जो धीरे-धीरे बढ़ती है. नीतीश 72 साल के हैं और चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि इसका संबंध उम्र के साथ मांसपेशियों के कमजोर होने से हो सकता है. लेकिन किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं है कि उन्होंने अचानक चुप्पी क्यों साध ली है.

साइलेंट मोड में केजरीवाल

राजधानी में ऐसी खबरें आ रही हैं कि प्रवर्तन निदेशालय अगले साल जनवरी में कभी भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है. संसद के चालू शीतकालीन सत्र के दौरान उन्हें बख्शा जा सकता है. शराब घोटाला मामले के मुख्य आरोपियों में से एक अमित कत्याल के जरिए ईडी ने एक मजबूत मामला बुनना शुरू कर दिया है.

आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी एजेंसियों के साथ सहयोग करने के कगार पर हैं. हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में आप को भारी झटका लगा है, जहां केजरीवाल को एक के बाद एक राज्यों में अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा. छत्तीसगढ़ में आप ने 57 उम्मीदवार उतारे और उन्हें केवल 0.93% वोट मिले.

मध्य प्रदेश में भी, केजरीवाल ने अपने पंजाब के समकक्ष भगवंत सिंह मान के साथ बड़े पैमाने पर प्रचार किया और उन्हें केवल 0.54% वोट मिले. यहां आप ने कम से कम 10 सीटें पाने की उम्मीद में 70 उम्मीदवार खड़े किए थे. राजस्थान में आप ने 88 उम्मीदवार उतारे और 0.38% वोट पाकर अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया.

सांसदों पर लागू किया गया 2005 का नियम

तृणमूल कांग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा के कथित ‘कैश फॉर क्वेरी’ मामले ने दोनों सदनों के सांसदों के लिए भानुमती का पिटारा खोल दिया है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा सांसदों के लिए यूपीए काल की 2005 की आचार संहिता का तुरंत हवाला दिया.

राज्यसभा के सभापति ने आचार संहिता का इस्तेमाल करते हुए सांसदों को विदेश मंत्रालय और राज्यसभा सचिवालय के संज्ञान/अनुमति के बिना निजी व्यक्तियों/कंपनियों/विदेशी सरकारों से विदेश में आतिथ्य लेने पर रोक लगा दी. आचार संहिता के नियम 2005 में जारी किए गए थे लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकार की नाजुक प्रकृति के कारण इसे कभी लागू नहीं किया जा सका था.

नियमों में सांसदों को विदेशी स्रोत से किसी भी निमंत्रण को स्वीकार करने और यहां तक कि निजी तौर पर भी विदेश यात्रा करने से पहले विदेश मंत्रालय और केंद्रीय गृह मंत्रालय दोनों को सूचित करने के लिए कहा गया है. जहां राज्यसभा सांसद विदेशी दौरों के लिए नियमों और प्रक्रियाओं को सख्त करने से हैरान हैं, वहीं लोकसभा सचिवालय पर अपने 545 सांसदों के लिए इसी तरह के नियम लागू करने का दबाव है.

आश्चर्य की बात यह है कि लोकसभा में अब तक अपने सांसदों के लिए ऐसी कोई आचार संहिता नहीं है. एक तरह से, महुआ मोइत्रा सही थीं जब उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी आचार संहिता के अस्तित्व के बारे में जानकारी नहीं थी. ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसभा की आचार समिति अब शीघ्र ही ऐसी नियमावली ला सकती है.

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