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आलोक मेहता का ब्लॉग: भारतीय चिकित्सा विज्ञान की परीक्षा का समय

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 22, 2020 06:42 IST

विडम्बना यह है कि हर वर्ष दिवाली से पहले धन्वंतरि की पूजा करने या जरूरत पड़ने पर वैद्यों अथवा प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों पर जाने वाले अधिकांश मंत्नी, अधिकारी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के प्रोत्साहन, अनुसंधान, चिकित्सा केंद्रों के अधिकाधिक खोलने, आयुर्वेद के अनुभवी डॉक्टर वैद्य तैयार करने को प्राथमिकता नहीं देते. यह देख-सुनकर आश्चर्य होता है कि अटल सरकार से लेकर मोदी सरकार तक नया आयुष मंत्नालय बना-सीमित बजट भी रखा, लेकिन वित्त मंत्नालय केवल खानापूर्ति लायक धन राशि देता है.

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कोरोना वायरस के कहर के बीच राज्यसभा में भारतीय चिकित्सा आयुर्वेद और होम्योपैथी के लिए आयोग गठन के विधेयकों पर सार्थक चर्चा देखने-सुनने को मिली. इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजकल मीडिया में गंभीर संसदीय विषयों पर हुई बहस का कवरेज नहीं के बराबर होता है. यह देखकर अच्छा लगा कि चिकित्सा और स्वास्थ्य के मुद्दे पर बहस के दौरान हंगामे, आरोप-प्रत्यारोप के बजाय नई बातें और सहमतियां दिखाई दीं. खासकर भाजपा के स्वामियों - साधु-संतों के दावों पर आपत्तियां उठाने या मजाक बनाने वाले प्रतिपक्ष के सांसदों ने एक कदम आगे बढ़कर भारतीय आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी के पक्ष में तथ्यों के साथ तर्क रखे. अपनी चिकित्सा प्रणाली पर समुचित ध्यान नहीं दिए जाने, उसकी शिक्षा-प्रशिक्षण की कमियों पर भी चिंता व्यक्त की.

आयुर्वेद और होम्योपैथी के लिए नए आयोगों के गठन पर भाजपा के सुधांशु त्रिवेदी तथा कांग्रेस के ऑस्कर फर्नाडीस के प्रामाणिक तर्क बेहद दिलचस्प थे. ऑस्कर तो एक कदम आगे दिखे. वे राजीव, सोनिया, राहुल गांधी के बहुत नजदीकी सहयोगी रहे हैं और उनके साथी नेता भाजपा की कई मान्यताओं का मजाक उड़ाते रहते हैं. ताजा हमला गौमूत्न को लेकर रहा है, लेकिन ऑस्कर साहब ने तो यह तक कहा कि उनके एक परिचित का गौमूत्न से कैंसर का इलाज सफल रहा.

अपने स्वयं के लिए उन्होंने दावा किया कि जब डॉक्टरों ने उन्हें घुटना बदलने के लिए ऑपरेशन की सलाह दे दी थी, तब उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा योग और आयुर्वेद के बल पर घुटना पूरी तरह ठीक कर लिया. इस संदर्भ में मुझे एक व्यक्तिगत अनुभव का जिक्र करना भी आवश्यक लगता है. यह घटना 1981 की है. उस समय मैं जर्मनी के कोलोन शहर में वॉइस ऑफ जर्मनी रेडियो के हिंदी विभाग में संपादक था. जर्मनी में दो वर्ष हो चुके थे. अचानक एक दिन गले से खाना निगलने में तकलीफ होने लगी और दिनोंदिन बढ़ने लगी. सामान्य फिजिशियन डॉक्टर ने कोलोन के प्रमुख चिकित्सा संस्थान में इलाज के लिए भेज दिया.

प्रारंभिक परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने मुझे भर्ती करने का फैसला किया और हर सुबह-शाम पचासों परीक्षण शुरू कर दिए.  सारी जांच-पड़ताल, परीक्षण के बावजूद डॉक्टर रोग का असली कारण समझ नहीं पा रहे थे. भर्ती के साथ ही उन्होंने मुंह से कुछ भी खाने-पीने पर प्रतिबंध लगा दिया था और चार-पांच नलियों से पानी-खून दे रहे थे. भर्ती के समय उन्हें खाने की नली में दो छेद दिख रहे थे, लेकिन एक हफ्ते में नियंत्नण के बजाय छेद की संख्या छह-सात हो गई थी.

प्रमुख डॉक्टर ने ऑपरेशन की आवश्यकता बताई तथा मेरी पत्नी और मित्न साथी को सूचित किया कि ऑपरेशन में भी जान बचने की गुंजाइश मात्न एक प्रतिशत है. तब मैंने दिल्ली में अपने प्रिय और वरिष्ठ संपादकों मनोहर श्याम जोशी तथा कन्हैयालाल नंदनजी को अंतिम प्रणाम जैसा पत्न लिखकर यह भी सलाह मांगी कि ऐसी स्थिति में भारत आकर क्या इलाज हो सकेगा और अभी तो यात्ना की अनुमति डॉक्टर भी नहीं दे रहे. इधर नंदनजी ने प्रसिद्ध वैद्य त्रिगुणाजी से सलाह लेकर कुछ आयुर्वेदिक दवाइयां कोलोन भिजवाईं. दवाई से एक सप्ताह बाद ही सूप और तरल खाद्यान्न निगलना शुरू हुआ. दस दिन बाद संस्थान में फिर परीक्षण के लिए जाने पर डॉक्टर भी आश्चर्यचकित हो गए जब मशीन में दिखा कि मुंह की नली से छेद गायब हैं. धीरे-धीरे जीवन सामान्य हो गया और फिर कभी ऐसी तकलीफ नहीं हुई.

बहरहाल, हम जैसे हजारों लोगों के अच्छे या यदा-कदा खराब अनुभव हो सकते हैं. लेकिन यह तो प्रामाणिक तथ्य है कि दुनिया में चिकित्सा आधारित व्यवस्था है, जबकि आयुर्वेद आयु और जीवन संरक्षण संवर्धन वाली प्रणाली है. आज भी तक्षशिला (पाकिस्तान) के एक संग्रहालय में दूसरी शताब्दी के आयुर्वेद के सर्जरी संबंधी पुरातत्वीय प्रमाण देखे जा सकते हैं. एक ब्रिटिश विशेषज्ञ ने 1794 में अपने देश की पत्रिका में भारतीय चिकित्सा, सर्जरी की सफलता का उल्लेख किया था. मजेदार बात यह कि आयुर्वेद ही नहीं सामान्य जीवन के लिए आवश्यक अपने नीम, हल्दी, तुलसी के पेटेंट के लिए भी पिछले वर्षो के दौरान हमें अंतर्राष्ट्रीय अदालतों में लड़ना पड़ा.  

विडम्बना यह है कि हर वर्ष दिवाली से पहले धन्वंतरि की पूजा करने या जरूरत पड़ने पर वैद्यों अथवा प्राकृतिक चिकित्सा केंद्रों पर जाने वाले अधिकांश मंत्नी, अधिकारी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के प्रोत्साहन, अनुसंधान, चिकित्सा केंद्रों के अधिकाधिक खोलने, आयुर्वेद के अनुभवी डॉक्टर वैद्य तैयार करने को प्राथमिकता नहीं देते. यह देख-सुनकर आश्चर्य होता है कि अटल सरकार से लेकर मोदी सरकार तक नया आयुष मंत्नालय बना-सीमित बजट भी रखा, लेकिन वित्त मंत्नालय केवल खानापूर्ति लायक धन राशि देता है. मंत्नालय के सचिव तक पुराने अधिकारी नहीं बल्कि राजस्थान के प्रतिष्ठित वैद्य हैं. फिर भी धन तो वित्त मंत्नालय देगा. 1995 में सूरत शहर में प्लेग फैलने पर केंद्र की नरसिंह राव सरकार के सहयोग से बड़े पैमाने पर आयुर्वेदिक दवाई, धूप से हवन आदि का उपयोग कर आगे बढ़ने से रोकने में सफलता मिली थी.

इसलिए आज कोरोना वायरस के कहर के वैश्विक संकट में भी आयुर्वेद के विशेषज्ञों की परीक्षा सी है. हां, उसके अनुसंधान कार्य के लिए समय और योग्य विशेषज्ञों की जरूरत होगी. यों तो आयुर्वेद के जरिए रोग से लड़ने की प्रतिरोधक दवाइयों और उपायों को तो प्रचारित-प्रसारित किया जा सकता है. असाध्य और सर्वाधिक संकट के दौर में  भारतीय ज्ञान-विज्ञान का उपयोग कुछ तो काम आ सकता है.

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