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पंकज चतुर्वेदी का ब्लॉग: नए जमाने के छात्रों को नए शिक्षकों की जरूरत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: August 21, 2020 15:07 IST

नया अंदाज फिलहाल शहरी, सक्षम आर्थिक स्थिति वाले और अधिकांश निजी विद्यालय के बच्चों तक ही सीमित है, लेकिन बारीकी से गौर करें तो यह भविष्य के विद्यालय की परिकल्पना भी है.

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पंकज चतुर्वेदीकोरोना संकट के दौरान स्कूली शिक्षा को ले कर भारत में एक नई बहस खड़ी हुई- क्या डिजिटल प्लेटफार्म की कक्षाएं वास्तविक क्लासरूम का विकल्प हो सकती हैं? अब इसे मजबूरी समझो या अनिवार्यता, कोरोना से बचाव के एकमात्र उपाय -सोशल डिस्टेंसिंग- के साथ यदि बच्चों को पढ़ाई से जोड़ कर रखना है तो फिलहाल घर बैठे मोबाइल या कम्प्यूटर पर कक्षाएं ही विकल्प हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि पढ़ाने का यह नया अंदाज फिलहाल शहरी, सक्षम आर्थिक स्थिति वाले और अधिकांश निजी विद्यालय के बच्चों तक ही सीमित है, लेकिन बारीकी से गौर करें तो यह भविष्य के विद्यालय की परिकल्पना भी है. दूरस्थ अंचलों तक शालाभवन बनवाने, वहां शिक्षकों की नियमित हाजिरी सुनिश्चित करने, स्कूल भवनों में मूलभूत सुविधाएं एकत्र करने, हमारे देश के विषम मौसमी हालात में स्कूल संचालित करने जैसी कई चुनौतियों को जोड़ लें तो एक बच्चे के उसकी मनमर्जी की जगह पर बैठ कर सीखने की प्रक्रिया पूरी करने का कार्य न केवल प्रभावी लगता है, बल्कि आर्थिक रूप से भी कम खर्चीला है.

जिस देश में मोबाइल कनेक्शन की संख्या देश की कुल आबादी के लगभग करीब पहुंच रही हो, जहां किशोर ही नहीं 12 साल के बच्चे के लिए भी मोबाइल स्कूली-बस्ते की तरह अनिवार्य बनता जा रहा हो, वहां बच्चों को डिजिटल साक्षरता सृजनशीलता, पहल और सामाजिक कौशलों की जरूरत है. हालांकि यह भी सच है कि स्कूल में बच्चों द्वारा मोबाइल का इस्तेमाल शिक्षा के रास्ते में बाधक माना जाता है, परिवार भी बच्चों को कड़ी निगरानी (जहां तक संभव हो) के बीच मोबाइल थमाते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि सस्ते डाटा के साथ हाथों में बढ़ रहे मोबाइल का सही तरीके से इस्तेमाल बच्चों के लिए एक वरदान सरीखा है.

दुखद है कि जब डिजिटल गैजेट्स हमारे लेन-देन, व्यापार, परिवहन, यहां तक कि अपनी पहचान के लिए अनिवार्य होते जा रहे हैं, हम बच्चों को वही घिसे-पिटे विषय न केवल पढ़ा रहे हैं, बल्कि रटवा रहे हैं. हाथ व समाज में गहरे तक घुस गए मोबाइल का इस्तेमाल छोटेपन से ही सही तरीके से न सिखा पाने का कुपरिणाम है कि बच्चे पोर्न, अपराध देखने के लिए इस ज्ञान के भंडार का इस्तेमाल कर रहे हैं. यूट्यूब ऐसे वीडियो से पटा पड़ा है, जिनमें सुदूर गांव-देहात में किन्हीं लड़के-लड़कियों के मिलन के दृश्य होते हैं. काश अपने पाठ के एक हिस्से से संबंधित फिल्म बनाने जैसा कोई अभ्यास इन बच्चों के सामने होता तो वे काले अक्षरों में छपी अपनी पाठ्य पुस्तक को दृश्य-श्रव्य से सहजता से प्रस्तुत करते.

टॅग्स :डिजिटल इंडियाएजुकेशन
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