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कोसोवो के अमेरिकी अड्डे भेजे गए अफगान शरणार्थियों के बारे में पारदर्शिता की कमी: मानवाधिकारकर्मी

By भाषा | Updated: October 23, 2021 13:23 IST

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वाशिंगटन, 23 अक्टूबर (एपी) काबुल से हवाई मार्ग से लाए गए हजारों अफगान लोगों का तो अमेरिका स्वागत कर रहा है, लेकिन उसने कुछ लोगों के एक छोटे समूह के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम खुलासा किया है जो विदेश में हैं। दर्जनों लोग ऐसे हैं जिनकी सुरक्षा जांच के दौरान संभावित सुरक्षा मुद्दे पाए गए और उन्हें कोसोवो में एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर भेज दिया गया।

बीते छह हफ्ते में कोसोवो के कैंप बांडस्टील भेजे गए अफगानों को लेकर मानवाधिकार के पैरोकारों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन लोगों की स्थिति के बारे में पारदर्शिता की कमी है, उन्हें कोसोवो में रखने के कारण नहीं बताए गए और यदि उन्हें अमेरिका आने की अनुमति नहीं मिलेगी तो उनका क्या होगा, इस बारे में भी सवाल हैं।

एम्नेस्टी इंटरनेशनल में शोधकर्ता जेलेना सेसार ने कहा, ‘‘हां, हम चिंतित हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उन लोगों का वास्तव में क्या होगा, खासकर वे लोग जो सुरक्षा जांच में योग्य नहीं पाए गए? क्या उन्हें हिरासत में रखा जाएगा? क्या उन्हें कानूनी सहायता मिलेगी? उनके लिए क्या योजना है? क्या अंतत: उन्हें अफगानिस्तान भेज दिए जाने का जोखिम है?’’

बाइडन प्रशासन का कहना है कि इनमें से कुछ सवालों का सार्वजनिक रूप से जवाब देना अभी जल्दबाजी होगी क्योंकि वह अगस्त में अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहां से निकाले गए अफगानों को फिर से बसाने के काम में जुटा हुआ है।

‘इंटरनेशनल रिफ्यूजी असिस्टेंस प्रोजेक्ट’ के नीति निदेशक सुनील वर्गीज ने कहा, ‘‘हमें यह नहीं पता कि अतिरिक्त जांच के लिए लोगों को कोसोवो क्यों भेजा जा रहा है। यह अतिरिक्त जांच क्या है और इसमें कितना वक्त लगेगा।’’

अफगानिस्तान के लोगों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे की पहचान करने के लिए कड़ी सुरक्षा जांच के बाद, 17 अगस्त के बाद से 66,000 से अधिक अफगान अमेरिका आए हैं। इनमें अमेरिकी सेना के लिए दुभाषिए का काम कर चुके लोग और अफगानिस्तान के सैन्य बलों के लोग भी शामिल हैं। इनमें से 55,000 लोग देशभर में विभिन्न अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हैं जहां उनकी आव्रजन संबंधी प्रक्रिया, चिकित्सीय आकलन और पृथक-वास पूरा होगा और उसके बाद वे अमेरिका में बस सकेंगे।

गृह सुरक्षा विभाग के मुताबिक करीब पांच हजार लोग अब भी पश्चिम एशिया और यूरोप में विभिन्न स्थानों पर हैं।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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