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Muharram: शुद्ध भारतीय परंपरा है ताजियादारी, जानिए किस बादशाह के राज में शुरू हुई ये परंपरा

By नईम क़ुरैशी | Updated: July 16, 2024 14:53 IST

10 मोहर्रम 61 हिजरी यानी 10 अक्टूबर सन् 680 को हजरत हुसैन रजि. को यजद की सेना ने उस वक्त शहीद कर दिया, जब वे नमाज के दौरान सजदे में सर झुकाए हुए थे।

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ठळक मुद्देसैकड़ों वर्ष बाद भी फुरात नदी के किनारे कर्बला मैदान में हुई जंग दुनिया को अमन और शांति का पैगाम दे रही है।हजरत इमाम हुसैन के छोटे बेटे जैनुल आबेदीन 10 मोहर्रम को बीमार होने से जंग में शामिल नहीं होने से जिंदा बच गए थे।छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम हैं।

सैकड़ों वर्ष बाद भी फुरात नदी के किनारे कर्बला मैदान में हुई जंग दुनिया को अमन और शांति का पैगाम दे रही है। 72 हुसैनी और 80 हजार यजदी लश्कर के बीच हुई लड़ाई का अंजाम तो संख्या से ही पता चलता है, मगर जनाब ए मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम के वारिसों ने अधर्म के आगे झुकने के बजाए डटकर मुकाबला किया और इस्लाम धर्म के स्थापित सिद्धान्तों के लिए सजदे में सर कटाकर अमर हो गए।

10 मोहर्रम 61 हिजरी यानी 10 अक्टूबर सन् 680 को हजरत हुसैन रजि. को यजद की सेना ने उस वक्त शहीद कर दिया, जब वे नमाज के दौरान सजदे में सर झुकाए हुए थे। 

पैगाम ए इंसानियत को नकारते हुए यजद ने इस जंग में 72 लोगों को बेरहमी से कत्ल किया था, दुश्मनों ने छह महीने के बच्चे अली असगर के गले पर तीर मारा, 13 साल के हजरत कासिम को जिन्दा घोड़ों की टापों से रौंद डाला और 7 साल 8 महीने के औन मोहम्मद के सिर पर तलवार से वार कर शहीद कर दिया। यजद ने नबी के घराने की औरतों पर भी बेइंतहा जुल्म किए। 

उन्हें कैद में रखा, जहां हजरत हुसैन की मासूम बच्ची सकीना की कैदखाने में ही मौत हो गई। हजरत इमाम हुसैन के छोटे बेटे जैनुल आबेदीन 10 मोहर्रम को बीमार होने से जंग में शामिल नहीं होने से जिंदा बच गए थे।

यजद के आगे नहीं झुका नबी का घराना

छल-कपट, झूठ, मक्कारी, जुआ, शराब, जैसी चीजें इस्लाम में हराम हैं। हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं इस्लामिक सिद्घान्तों पर अमल करने की हिदायत सभी मुसलमानों और अपने खानदान को भी दी। मदीना से कुछ दूर 'शाम' में मुआविया नामक शासक का दौर था। 

मुआविया की मृत्यु के बाद यजद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें, क्योंकि वह मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर अच्छा प्रभाव है। मगर यजद जैसे अधर्मी शख्स को इस्लामी शासक मानने से नबी के घराने ने साफ इंकार कर दिया। यजद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी। 

इसके बाद हजरत हुसैन ने फैसला लिया कि अब वह अपने नाना हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व सल्लम का शहर मदीना छोड़ देंगे, ताकि वहां अमन कायम रहे। फिर भी जंग टाली ना जा सकी और इस्लाम धर्म की तारीख भी इस युद्ध के उल्लेख के बगैर अधूरी है।

दरिया पर यजदी पहरा पानी को तरस गए नबी के नवासे

इस्लामी नए साल के पहले माह मोहर्रम में पूरी दुनिया में हर फिरके के मुस्लिम विशेष इबादत करते हैं और भोजन, पानी का दान कर रोजे भी रखते हैं। 

हजरत हुसैन और उनके परिजनों, साथियों का बेरहमी से कत्ल करने के पूर्व यजद की सेना ने बहुत यातनाएं पहुंचाई थी, तपते रेगिस्तान में पानी की एक बूंद भी इस्लाम धर्म के पैगम्बर के नवासे को नसीब नहीं हुई थी। दरिया पर यजदी लश्कर का कड़ा पहरा था, जो पानी लेने गया उसे तीरों से छलनी कर दिया गया।

मोहर्रम धर्म के आदर का मजबूत उदाहरण

भारत मे मोहर्रम के अनूठे रंग हैं, यहां मातम को भी हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मोहर्रम को जिस शिद्दत से मुसलमान मानते हैं, हिंदू भी उतनी ही आस्था रखते हैं। चौकी स्नान से लेकर 10 मोहर्रम को प्रतीकात्मक कर्बला स्थल तक हिन्दू भाईचारे और सद् भाव के साथ पूरी आस्था में सराबोर होकर मोहर्रम के प्रतीकों को कांधा देते हैं, जो देश मे धर्मों के आदर के साथ एकता का मजबूत संदेश और उदाहरण भी है। 

यहां अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की कर्बला में हुई शहादत के प्रतीकों पर बड़ी आस्था देखने को मिलती है। तजियों के साथ दुल-दुल बुर्राक के जुलूस में सम्मलित होकर लोग आस्था से मन्नते मांगते हैं।

भारत में तैमूर काल से ताजियादारी की परंपरा

मोहर्रम कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ इस्लामी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। रहा सवाल भारत में ताजियादारी का तो यह एक शुद्ध भारतीय परंपरा है, जिसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है। इसकी शुरुआत बादशाह तैमूर लंग ने की थी। पहली बार 801 हिजरी में तैमूर लंग के महल परिसर में ताजिया रखा गया था। 

19 फरवरी 1405 ईसवी को कजाकिस्तान में तैमूर की मृत्यु के बाद भी ताजिये निकालने की परंपरा जारी रही। तैमूर लंग शिया संप्रदाय से था और मोहर्रम माह में हर साल इराक जरूर जाता था, लेकिन बीमारी की वजह से एक साल नहीं जा सका। वह दिल का मरीज था, इसलिए हकीमों, वैद्यों ने उसे सफर के लिए मना किया था।

बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसा करना चाहा, जिससे तैमूर खुश हो जाए। उस जमाने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोजे की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया गया। 

कुछ कलाकारों ने बांस की किमचियों की मदद से रोजे का ढांचा तैयार किया। इसे तरह-तरह के फूलों से सजाया गया और इसी को ताजिया नाम दिया। इस ताजिए को पहली बार 801 हिजरी में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया था।

तैमूर के ताजिए की शोहरत पूरे देश में फैल गई। देशभर से राजे-रजवाड़े और श्रद्धालु जनता इन ताजियों की जियारत के लिए पहुंचने लगे। तैमूर लंग को खुश करने के लिए देश की अन्य रियासतों में भी इस परंपरा की सख्ती के साथ शुरुआत हो गई। खासतौर पर दिल्ली के आसपास के जो शिया संप्रदाय के नवाब थे, उन्होंने तुरंत इस परंपरा पर अमल शुरू कर दिया। 

तब से लेकर आज तक इस परंपरा को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा (म्यांमार) में मनाया जा रहा है। जबकि खुद तैमूर लंग के देश उज्बेकिस्तान या कजाकिस्तान के साथ शिया बाहुल्य देश ईरान में ताजियों की परंपरा का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

कुरआन और हदीस में मोहर्रम का महत्व

मस्जिद बैतुल हम्द के इमाम मुफ्ती जनाब मोहम्मद फारुक साहब के मुताबिक कुरआन के पारा नम्बर 10 में सूरह तोबा की आयत नम्बर 36 के मुताबिक इस्लाम के बारह माह में मोहर्रम का बड़ा महत्व है। 

इस पवित्र माह में हजरत आदम अलेहि सलाम दुनिया में आये, हजरत नूह अलेहि सलाम की कश्ती को दरिया के तूफान में किनारा मिला, हजरत मूसा अलेहि सलाम और उनकी कौम को फिरऔन के लश्कर से निजात मिली और फिरऔन दरिया ए नील में समा गया।

गुनाहों से निजात देता है आशूरा का रोजा

हदीस मिशकात शरीफ के मुताबिक, पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्ल ने पैगाम दिया कि गुनाहों से निजात के लिए 10 मोहर्रम यौमे आशूरा पर रोजा रखना चाहिए। हदीस तिरमिज शरीफ के मुताबिक रमजान के रोजों के बाद मोहर्रम की दस तारीख का रोजा बड़ी फजलत रखता है।

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