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एलओसी के सटे गांवों से विशेष रिपोर्ट: जिन्दगी और मौत के बीच कोई अंतर नहीं है यहां!

By सुरेश डुग्गर | Updated: March 2, 2019 19:46 IST

कोई फासला भी नहीं है यहां जिन्दगी और मौत के बीच। अभी आप खड़े हैं और अभी आप कटे हुए वृक्ष की तरह ढह भी सकते हैं। आपको ढहाने के लिए सीमा के उस पार से मौत बरसाई जाती है।

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ठळक मुद्देएलओसी पर तो 1947 के पाकिस्तानी हमले के उपरांत ही जिन्दगी और मौत के बीच फासला कम होने लगा था और आज 72 सालों के उपरांत वहां के निवासी आदी हो गए हैं।अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मौत का खेल वर्ष 1995 में आरंभ हुआ था। जब भारत सरकार ने आतंकियों की घुसपैठ तथा हथियारों की तस्करी को रोकने की खातिर इस 264 किमी लंबी सीमा पर तारबंदी करने की घोषणा की तो पाकिस्तान चिल्ला उठा।

यहां जिन्दगी और मौत के बीच कोई अंतर नहीं है। अगर मौत पाक गोलीबारी देती है तो पलायन भी जिन्दगी नहीं देता। बस मौत का साम्राज्य है। ऐसा साम्राज्य जिसके प्रति अब यह कहा जाए कि वह अमर और अजय है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस साम्राज्य पर शासन करने वाले हैं तोप के गोले और उनकी रानियां हैं बंदूकों की नलियों से निकलने वाली गोलियां।

जीवन और मौत में कोई फासला नहीं 

कोई फासला भी नहीं है यहां जिन्दगी और मौत के बीच। अभी आप खड़े हैं और अभी आप कटे हुए वृक्ष की तरह ढह भी सकते हैं। आपको ढहाने के लिए सीमा के उस पार से मौत बरसाई जाती है। खेतों में जाना या फिर नित्यकर्म के लिए खेतों का इस्तेमाल तो भूल ही जाइए। घरों के भीतर भी बाथरूम का इस्तेमाल डर के कारण लोग नहीं करते। ऐसा इसलिए कि कहीं गोली दीवार को चीर कर आपके शरीर में घुस गई तो आपकी क्या स्थिति होगी।

यह सच है प्रतिदिन लोग मौत का सामना कर रहे हैं। रात को जमीन पर सोने के बजाय खड्डे में सोने पर मजबूर हैं सीमावासी। हालांकि अब वहां भी खतरा बढ़ा है। मोर्टार के इस्तेमाल के उपरांत खड्डे में ही कहीं दफन न हो जाएं इसी डर से रात कहीं तथा दिन कहीं ओर काटने का प्रयास कर रहे हैं उन गांवों के लोग यहां पाक गोलाबारी ने जिन्दगी और मौत के बीच के फासले को कम कर दिया है।

1947 से ही ऐसे हैं हालात 

एलओसी पर तो 1947 के पाकिस्तानी हमले के उपरांत ही जिन्दगी और मौत के बीच फासला कम होने लगा था और आज 72 सालों के उपरांत वहां के निवासी आदी हो गए हैं। लेकिन जम्मू फ्रंटियर की जनता के लिए भी यह नया नहीं है। वे भी अब इसके अभ्यस्त होने लगे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सीमा होने के कारण वे अभी भी इसी धोखे में हैं कि पाकिस्तान यह सब करना छोड़ देगा।

परंतु सैनिकों को विश्वास नहीं है। ‘पाकिस्तान इसे वर्किंग बाउंडरी कहने लगा है 1995 के बाद, से तो वह कैसे ऐसा करेगा,’अब्दुल्लियां सीमा चौकी पर हथियारों की सफाई में जुटे सूबेदार ने कहा था। उसकी पलाटून को सीमा सुरक्षा बल के जवानों की सहायता के लिए तैनात किया गया था। वैसे एक अन्य अधिकारी के शब्दों में:‘अब तो एलओसी और आईबी में कोई खास अंतर नहीं रह गया है सिवाय नाम के। गोली वहां भी चलती है यहां भी। मोर्टार यहां भी चलते हैं वहां भी।’

पाकिस्तान ने मौत का खेल 1995 में शुरू किया 

अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मौत का खेल वर्ष 1995 में आरंभ हुआ था। जब भारत सरकार ने आतंकियों की घुसपैठ तथा हथियारों की तस्करी को रोकने की खातिर इस 264 किमी लंबी सीमा पर तारबंदी करने की घोषणा की तो पाकिस्तान चिल्ला उठा। उसकी चिल्लाहट में सिर्फ स्वर ही नहीं था बल्कि बंदूक की गोलियों की आवाज भी थी। नतीजतन मौत बांटने का जो खेल जुलाई’95 में आरंभ हुआ वह अब जिन्दगी और मौत के बीच के फासले को और कम कर गया है।

मौत तथा जिन्दगी के बीच का फसला दिनोंदिन कम होता गया। अब तो स्थिति यह है कि दोनों के बीच मात्र कुछ इंच का फासला रह गया हैै अर्थात दोनों सेनाएं आमने सामने आ खड़ी हुई हैं। सिर्फ रणभेरी बजने की देर है कि एक दूसरे पर टूट पड़ना चाहती हैं। इसके लिए लिए मौत का सामान दोनों ओर से एकत्र किया जा चुका है।

पलायन ही एक मात्र रास्ता 

हालांकि इस मौत से बचने की खातिर नागरिक पलायन का रास्ता तो अख्तियार कर रहे हैं लेकिन वे वापस लौट कर भी आते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर सीमा पर पाक गोलीबारी उनके लिए मौत का सामान तैयार करती है तो पलायन करने पर सरकारी अनदेखी उन्हें भूखा रहने पर मजबूर करती है। अर्थात सीमावासियों के लिए सरकार और पाक गोलीबारी में कोई खास अंतर नहीं है।

टॅग्स :जम्मू कश्मीरपाकिस्तानएलओसीभारतीय सेना
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