पटना: बिहार में पटना जिले के धनरुआ थाना क्षेत्र के एक गांव में 'वेलेंटाइन डे' के दिन मिलना एक प्रेमी जोड़े के लिए मुसीबत बन गया। दरअसल, एक साल से प्रेम संबंध में रहे 19 वर्षीय युवक और 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को ग्रामीणों ने छुपकर मिलते हुए पकड़ लिया। सामाजिक लोक-लाज और 'गलती' रोकने के नाम पर ग्रामीणों ने आनन-फानन में दोनों की शादी करा दी। हालांकि, कानून की नजर में नाबालिग की शादी एक गंभीर अपराध है और अब पुलिस इस गैर-कानूनी बाल विवाह की जांच में जुट गई है।
बताया जाता है कि युवक अपनी प्रेमिका से मिलने उसके गांव पहुंचा था। लेकिन ग्रामीणों और लड़की के परिजनों को यह रिश्ता खटक रहा था, जिसके चलते उन्होंने दोनों को रंगे हाथों पकड़कर विवाह के बंधन में बांध दिया। ग्रामीणों ने सोचा कि शादी कराकर वे मामला सुलझा रहे हैं, लेकिन बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत उन्होंने खुद को कानूनी मुश्किल में डाल लिया है।
देश के कानून के अनुसार शादी के लिए लड़की की उम्र 18 और लड़के की 21 वर्ष होनी अनिवार्य है। बाल विवाह एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006 के तहत इस विवाह को आयोजित करने वाले माता-पिता, पंडित, काजी और गवाहों को दो साल तक के कठोर कारावास और एक लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है। चूंकि युवक की उम्र 18 साल से अधिक है, इसलिए उसे भी जेल की सजा भुगतनी पड़ सकती है।
पुलिस अब उन सभी लोगों को चिन्हित कर रही है, जिन्होंने इस विवाह में सक्रिय भूमिका निभाई। कानून के जानकारों के अनुसार, न केवल शादी बल्कि नाबालिग की सगाई कराना भी अपराध की श्रेणी में आता है। विशेष परिस्थितियों में तय आयु से कम उम्र में शादी की शिकायत पर दंड का प्रावधान है। हालांकि बाल विवाह स्वतः रद्द नहीं होता, लेकिन विवाहित जोड़ा बालिग होने के दो साल के भीतर अपनी शादी को कानूनी रूप से रद्द कराने के लिए आवेदन कर सकता है।
फिलहाल, धनरुआ पुलिस मामले की तहकीकात कर रही है। यह घटना बिहार के ग्रामीण इलाकों में व्याप्त एक बड़ी सामाजिक समस्या को उजागर करती है। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में लगभग 41 फीसदी लड़कियों और 30.5 फीसदी युवकों की शादी कानूनी उम्र पूरी होने से पहले ही कर दी जाती है। इसके अलावा, राज्य में 'पकड़ौआ विवाह' (जबरन शादी) का चलन भी रहा है, जहां योग्य युवकों या नाबालिगों को पकड़कर उनकी बेमेल शादी करा दी जाती है।