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कश्मीर: डल झील पर 21 साल में खर्च हुए 1600 करोड़ रुपये , स्थिति जस की तस

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: October 23, 2023 14:38 IST

विश्व प्रसिद्ध डल झील की सफाई व उसके संरक्षण पर केंद्र सरकार 21 सालों में 1600 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च कर चुकी है लेकिन उसका हाल अब भी वैसा ही है।

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ठळक मुद्देडल झील की सफाई व संरक्षण पर केंद्र सरकार ने 21 सालों में खर्च किया 1600 करोड़ रुपया पानी की तरह धनराशि खर्च करने के बाद भी डल झील पर स्थिति जस की तस हैसरकारी उदासीनता के चलते भी डल झील की उम्र सिर्फ साढ़े तीन सौ साल ही रह गई है

जम्मू: यह एक कड़वा सच है कि विश्व प्रसिद्ध डल झील की सफाई व उसके संरक्षण पर केंद्र सरकार 21 सालों में 1600 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च कर चुकी है। विकास के नाम डल झील पर पानी की तरह राशि खर्च करने के बाद भी स्थिति जस की तस है। झील की खूबसूरती पर ग्रहण अब भी लगा हुआ है।

यही नहीं डल झील की उम्र अब और कम हो गई है। ऐसे में सच में अगर आपको कश्मीर की खूबसूरती चाहिए तो आपको उस डल झील को बचाना पड़ेगा जिसके कारण ही कश्मीर की पहचान है या फिर यह कह लिजिए कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

ऐसा इसलिए है क्योंकि बढ़ते प्रदूषण और सरकारी उदासीनता के चलते भी विश्व प्रसिद्ध डल झील की उम्र सिर्फ साढ़े तीन सौ साल ही रह गई है। डल कश्मीर की पहचान है और इसे संरक्षित रखने के लिये सरकार हर संभव प्रयास कर रही है।

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना और प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत डल झील के विकास और संरक्षण के लिए एकमुश्त राशि उपलब्ध कराई है। यही नहीं शहरी विकास योजना में भी डल झील को शामिल किया गया। लेकिन डल झील की सफाई का काम पूरा नहीं हो सका।

सरकार का कहना है कि अब झील की स्वच्छता को बनाए रखने के लिए हाऊस बोटों में बायो डाइजेस्टर लगाए जाएंगें जो उसको स्वच्छ रखने में काफी कारगर साबित होगा। खबर यह है कि हाउस बोर्ड से हर रोज निकलने वाले मल-मूत्र को झील में जाने से रोकने के लिये जम्मू कश्मीर सरकार बायो डाइजेस्टर (जैविक-शौचालय) बनाने जा रही है।

पहले चरण में यह शौचालय कुछ हाउसबोट में ही बनाए जाएंगे परंतु प्रयोग सफल होने पर इसे सभी हाउसबोट में बनाया जाएगा। इस शौचालय को विशेष रखरखाव और किसी भी सीवेज सिस्टम की आवश्यकता नहीं है।

सरकार ने यह कदम उच्च न्यायालय की फटकार के बाद उठाया है। न्यायालय के आदेश पर लेक्स एंड वाटर डेवलपमेंट अथारिटी (लावडा) ने हाऊस बोटों में बायो डाइजेस्टर लगाने की प्रक्रिया शुरू की है। कुछ समय पूर्व प्रशासन ने भारत के विभिन्न राज्यों से आए निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं के साथ बैठक बुलाई थी जिसमें हाऊस बोटों में बायो-डाइजेस्टर लगाने पर चर्चा की।

प्रशिक्षण के तौर पर कुछ हाऊस बोटों में बायो डाइजेस्टर स्थापित करने के लिए कहा ताकि उसकी सफलता के बारे में हाऊस बोटों के मालिकों को पता चले और वह इस प्रणाली को अपनाएं। अधिकारियों का कहना था कि कश्मीर में ऐसी जलवायु स्थितियों मौजूद हैं जिसके तहत यह बायो डाइजेस्टर यहां सफल हो सकते हैं।

ये खास किस्म के गन्ध-रहित शौचालय होते हैं जो पर्यावरण के लिये भी सुरक्षित हैं। यह शौचालय ऐसे सूक्ष्म कीटाणुओं को सक्रिय करते हैं जो मल इत्यादि को सड़ने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया के तहत मल सड़ने के बाद केवल नाइट्रोजन गैस और पानी ही शेष बचते हैं, जिसके बाद पानी को री-साइकिल कर शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पर्यटन की संख्या बढ़ जाने पर यहां इस्तेमाल किये जाने वाले सार्वजनिक शौचालयों के चलते डल झील में मल इकट्ठा होने से पर्यावरण दूषित हो रहा है। इस प्रयास के बाद डील झील में मौजूद सभी हाऊस बोटों में बने शौचालयों को बायो-डाइजेस्टर में बदल दिया जाएगा। इसके अलावा पर्यटकों के लिए झील के आसपास सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए भी इस तरह के शौचालय बनाए जाएंगे।

टॅग्स :Jammujammu kashmir
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