जम्मू: यह एक चिंताजनक पहलू है कि कश्मीर वादी में लंबे समय तक सूखे की स्थिति ने औषधीय जैव विविधता के लिए एक 'गंभीर खतरा' पैदा कर दिया है। जबकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस सूखे के कारण कई कीमती औषधीय पौधों की प्रजातियों में तेजी से गिरावट आ रही है और वे विलुप्त होने की कगार पर हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि लंबे समय से चले आ रहे सूखे के कारण पीर पंजाल क्षेत्र में पाए जाने वाले दुनिया के मशहूर और सबसे महंगे गुच्छी (मोरेल) मशरूम में तेजी से गिरावट देखी जा रही है। वे बताते थे कि औषधीय पौधे स्वास्थ्य सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच सीमित है।
एक अध्ययन में बताया गया है कि विश्व स्तर पर, विकासशील देशों में लगभग 80 प्रतिशत लोग पारंपरिक हर्बल दवाओं पर निर्भर हैं क्योंकि ये आसानी से उपलब्ध हैं, सस्ती हैं, और आमतौर पर इनके साइड इफेक्ट कम होते हैं। भारतीय हिमालयी क्षेत्र को औषधीय जैव विविधता का एक प्रमुख भंडार माना जाता है।
इस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इस क्षेत्र में दर्ज 8,644 पौधों की प्रजातियों में से, लगभग 1,748 में औषधीय गुण हैं। जम्मू-कश्मीर में अकेले 300 से अधिक औषधीय रूप से महत्वपूर्ण पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं।
शोधकर्ता जहूर अहमद रेशी बताते थे कि औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियां कभी पीर पंजाल क्षेत्र के साथ-साथ हिमालय श्रृंखला के मैदानी इलाकों में भी बहुतायत में पाई जाती थीं।
इनमें अर्नेबिया बेंथमी शामिल है, जिसका उपयोग हृदय रोगों के लिए किया जाता है और ट्रिलियम गोवानियानम, जो एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है और मासिक धर्म संबंधी विकारों और कैंसर के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है।
इसी तरह से सासुरिया कास्टस, जिसका उपयोग खांसी, अस्थमा और पाचन संबंधी समस्याओं के लिए किया जाता हैं। इसी तरह से कार्डिसेप्स मिलिटेरिस और मोरेल मशरूम, जिन्हें स्थानीय रूप से कंगेच के नाम से जाना जाता है और क्षेत्र के बाहर बाजारों में गुच्छी के रूप में बेचा जाता है।
उन्होंने बताया कि जहां ये प्रजातियां पहले बड़ी संख्या में पाई जाती थीं पर पिछले 25 वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने उनके प्राकृतिक आवास को काफी बदल दिया है।
बताया जाता है कि पिछले दो दशकों में लंबे समय तक सूखे के कारण औषधीय जड़ी-बूटियां अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। वर्षा और ठंड जैसी जलवायु संबंधी आवश्यकताएं बदल गई हैं। नतीजतन, ये प्रजातियां अब ऊंचे जंगल क्षेत्रों तक ही सीमित हैं और वह भी बहुत कम मात्रा में।
इस स्टडी में यह भी कहा गया है कि लुप्तप्राय पौधों की प्रजातियों को उनके प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र, जिसमें तापमान, प्रकाश और अन्य जलवायु कारक शामिल हैं, को दोहराकर नियंत्रित इनडोर खेती के माध्यम से संरक्षित किया जा सकता है, हालांकि ऐसे उपाय महंगे हैं।