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कवि मलखान सिंह का निधन, दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान थे

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: August 9, 2019 13:13 IST

30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने उन्हें नमन किया है। समाज में शोषितों की सशक्त आवाज थे। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि वह एक अपने आप में आंदोलन थे।

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ठळक मुद्दे30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे।उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं। सफेद हाथी, सुनो ब्राह्मण, एक पूरी उम्र, पूस का एक दिन, आजादी और ज्वालामुखी के मुहाने।

कवि मलखान सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। शुक्रवार सुबह 4 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। कवि मलखान सिंह हिन्दी दलित कविता के महत्वपूर्ण स्तंभ थे। सुनो ब्राह्मण कविता संग्रह से उन्होंने दलित कविता की भाषा शिल्प और कहन को नया अंदाज दिया था।

30 सितंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में जन्म हुआ था। मलखान सिंह दलित और वंचित समाज के लिए आवाज थे। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने उन्हें नमन किया है। समाज में शोषितों की सशक्त आवाज थे। सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि वह एक अपने आप में आंदोलन थे।

उनका जाना सामाजिक न्याय की एक बुलंद आवाज का चले जाना है। सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें क्रांतिकारी नमन किया है। उनकी कुछ प्रमुख कृतियां हैं। सफेद हाथी, सुनो ब्राह्मण, एक पूरी उम्र, पूस का एक दिन, आजादी और ज्वालामुखी के मुहाने। कथाकार कैलाश वानखड़े ने कहा कि कवि मलखान सिंह नहीं रहे। दलित आवाज और आक्रोश की अमिट पहचान। विनम्र आदरांजलि।

मलखान सिंह की प्रमुख कविताएं...

सुनो ब्राह्मण

हमारे पसीने से बू आती है, तुम्हें।तुम, हमारे साथ आओचमड़ा पकाएंगे दोनों मिल-बैठकर।शाम को थककर पसर जाओ धरती परसूँघो खुद कोबेटों को, बेटियों कोतभी जान पाओगे तुमजीवन की गंध कोबलवती होती है जोदेह की गंध से।

सफेद हाथी

गाँव के दक्खिन में पोखर की पार से सटा, यह डोम पाड़ा है -जो दूर से देखने में ठेठ मेंढ़क लगता हैऔर अन्दर घुसते ही सूअर की खुडारों में बदल जाता है।

यहाँ की कीच भरी गलियों में पसरीपीली अलसाई धूप देख मुझे हर बार लगा है कि-सूरज बीमार है या यहाँ का प्रत्येक बाशिन्दापीलिया से ग्रस्त है।इसलिए उनके जवान चेहरों पर मौत से पहले का पीलापन और आँखों में ऊसर धरती का बौनापनहर पल पसरा रहता है।इस बदबूदार छत के नीचे जागते हुएमुझे कई बार लगा है कि मेरी बस्ती के सभी लोगअजगर के जबड़े में फंसे जि़न्दा रहने को छटपटा रहे हैऔर मै नगर की सड़कों पर कनकौए उड़ा रहा हूँ ।कभी - कभी ऐसा भी लगा है किगाँव के चन्द चालाक लोगों ने लठैतों के बल परबस्ती के स्त्री पुरुष और बच्चों के पैरों के साथमेरे पैर भी सफेद हाथी की पूँछ से कस कर बाँध दिए है।मदान्ध हाथी लदमद भाग रहा हैहमारे बदन गाँव की कंकरीलीगलियों में घिसटते हुए लहूलूहान हो रहे हैं।हम रो रहे हैं / गिड़गिड़ा रहे है जिन्दा रहने की भीख माँग रहे हैंगाँव तमाशा देख रहा हैऔर हाथी अपने खम्भे जैसे पैरों से हमारी पसलियाँ कुचल रहा हैमवेशियों को रौद रहा है, झोपडि़याँ जला रहा हैगर्भवती स्त्रियों की नाभि पर बन्दूक दाग रहा है और हमारे दूध-मुँहे बच्चों को लाल-लपलपाती लपटों में उछाल रहा है।इससे पूर्व कि यह उत्सव कोई नया मोड़ लेशाम थक चुकी है, हाथी देवालय के अहाते में आ पहुँचा हैसाधक शंख फूंक रहा है / साधक मजीरा बजा रहा हैपुजारी मानस गा रहा है और बेदी की रजहाथी के मस्तक पर लगा रहा है।देवगण प्रसन्न हो रहे हैंकलियर भैंसे की पीठ चढ़ यमराजलाशों का निरीक्षण कर रहे हैं।शब्बीरा नमाज पढ़ रहा हैदेवताओं का प्रिय राजा मौत से बचे हम स्त्री-पुरूष और बच्चों को रियायतें बाँट रहा हैमरे हुओं को मुआवजा दे रहा हैलोकराज अमर रहे का निनाददिशाओं में गूंज रहा है...अधेरा बढ़ता जा रहा है और हम अपनी लाशें अपने कन्धों पर टांगे संकरी बदबूदार गलियों मेंभागे जा रहे हैं / हाँफे जा रहे हैं अँधेरा इतना गाढ़ा है कि अपना हाथ अपने ही हाथ को पहचानने मेंबार-बार गच्चा खा रहा है।

एक पूरी उम्र

यक़ीन मानिएइस आदमख़ोर गाँव मेंमुझे डर लगता हैबहुत डर लगता है।लगता है कि बस अभीठकुराइसी मेंढ़ चीख़ेगीमैं अधसौंच हीखेत से उठ जाऊँगाकि अभी बस अभीहवेली घुड़केगीमैं बेगार में पकड़ा जाऊँगाकि अभी बस अभीमहाजन आएगामेरी गाड़ी-सी भैंसउधारी में खोल ले जाएगाकि अभी बस अभीबुलावा आएगाखुलकर खाँसने केअपराध में प्रधानमुश्क बाँधकर मारेगालदवाएगा डकैती मेंसीखचों के भीतरउम्र भर सड़ाएगा।

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