पटनाः बिहार विधानसभा चुनाव में मिली जबर्दस्त जीत के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बिहार मॉडल अपनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल में जीत के लिए बिहार से भाजपा नेताओं की टोली कूच कर चुकी है। पार्टी को पूरा भरोसा है कि वो इस बार ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का किला भेद देगी। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि जैसे गंगा बिहार से निकलकर बंगाल में प्रवेश करती है, वैसे ही भाजपा की विजय यात्रा भी गंगा के पीछे-पीछे चलकर ‘दीदी’ को बहा ले जाएगी।
संगठन निर्माण, बूथ प्रबंधन, सामाजिक संतुलन एवं चुनावी तालमेल
पार्टी सूत्रों की मानें तो बिहार में संगठन से जुड़े सात प्रदेश पदाधिकारियों को बंगाल भेजा गया है। राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से बंगाल के प्रभारी एवं बिहार के स्वास्थ्य एवं विधि मंत्री मंगल पांडेय के नेतृत्व में अनुभवी नेताओं को संगठनात्मक रूप से पार्टी जनाधार विस्तार के लिए लगाया गया है। इसमें मुख्य रूप से संगठन निर्माण, बूथ प्रबंधन, सामाजिक संतुलन एवं चुनावी तालमेल जैसे दायित्व भी सम्मिलित हैं।
रणनीति को धार देने के लिए बिहार संगठन से जुड़े पांच पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को पश्चिम बंगाल में प्रभारी बनाकर भेजा गया है। इस कदम को पार्टी की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत संगठनात्मक रूप से मजबूत राज्यों के अनुभवी नेताओं को उन क्षेत्रों में जिम्मेदारी दी जा रही है, जहां पार्टी विस्तार एवं सशक्तिकरण की संभावनाएं देख रही है।
मंडल से लेकर प्रदेश स्तर तक काम करने का अनुभव
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि बिहार में संगठन निर्माण, बूथ प्रबंधन, सामाजिक संतुलन एवं चुनावी तालमेल का जो मॉडल विकसित हुआ है, उसका प्रभावी उपयोग बंगाल में किया जा सकता है। बंगाल भेजे गए पांचों पदाधिकारी लंबे समय से पार्टी संगठन से जुड़े रहे हैं। मंडल से लेकर प्रदेश स्तर तक काम करने का अनुभव रखते हैं।
इन्हें लोकसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक समन्वय, कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने, चुनावी फीडबैक एकत्र करने और केंद्रीय नेतृत्व तक जमीनी रिपोर्ट पहुंचाने का दायित्व दिया गया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, बंगाल में इन प्रभारी पदाधिकारियों की भूमिका केवल चुनाव प्रबंधन तक सीमित नहीं होगी।
बिहार से गए प्रभारी अहम भूमिका निभाएंगे
वे स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ नियमित संवाद, सामाजिक संगठनों से संपर्क, मतदाता समूहों की पहचान और मुद्दा आधारित अभियान को भी मजबूती देंगे। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां भाजपा का जनाधार बढ़ा है, लेकिन संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करने की जरूरत है, वहां बिहार से गए प्रभारी अहम भूमिका निभाएंगे।
बिहार के पदाधिकारियों को भेजना इसी निरंतरता का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी के अंदरखाने में इसे संगठनात्मक परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है। बंगाल जैसी राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण और जमीनी स्तर पर संघर्षपूर्ण राज्य में काम करने से इन पदाधिकारियों के अनुभव में भी वृद्धि होगी, जो भविष्य में पार्टी के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
भाजपा को बहुमत पाने के लिए 294 में से लगभग 150 सीटें जीतनी होंगी
साथ ही इससे बिहार संगठन के कार्यकर्ताओं में भी यह संदेश जाएगा कि बेहतर काम करने वालों को राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारी दी जा रही है। बिहार के पांच संगठनात्मक पदाधिकारियों को बंगाल भेजने का निर्णय भाजपा की उस रणनीति का संकेत है, जिसमें संगठन को चुनावी सफलता की सबसे बड़ी ताकत माना गया है।
जानकारों की मानें तो गणित कहता है कि भाजपा को बहुमत पाने के लिए 294 में से लगभग 150 सीटें जीतनी होंगी। ये बहुत मुश्किल है क्योंकि 100 मुस्लिम बहुल सीटें लगभग पहले ही हाथ से जा चुकी होंगी। यानी अब लड़ाई 194 सीटों में से 150 सीटें जीतने की है। यह स्ट्राइक रेट किसी सपने जैसा है, जिसके सामने टीएमसी के बूथ दादाओं की दीवार खड़ी है।
पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीती थीं और भाजपा 77 पर सिमट गई थी
यही कारण है कि बिहार में नई सरकार के गठन के बाद चुनावी सेंटिमेंट बिहार से बंगाल में शिफ्ट हो गया है। इस साल मार्च-अप्रैल में बंगाल में विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीती थीं और भाजपा 77 पर सिमट गई थी, जबकि उसने पूरी ताकत झोंक दी थी।
सियासत के जानकारों की मानें तो बिहार में प्रचंड जीत मिली तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगाजी के बिहार से बंगाल में बहने का उदाहरण देकर अपने काडर में आत्मविश्वास पैदा करने की कोशिश की, लेकिन बंगाल में कमल खिलाना दाल-भात जितना आसान नहीं होगा। हालांकि भाजपा इस बार जरूर चाहेगी कि उसे बंगाल में किसी तरह की चुनौती या धोखा न मिले।
लेकिन मां, माटी और मानुष का नारा गढ़ने वाली ममता दीदी को शिकस्त देना शेर के मांद में घुसकर खाने का जुगाड़ करने के बराबर है। जानकारों के अनुसार बिहार एक हिंदी भाषी राज्य है, भाजपा का काफी समय से काडर बेस है, पांच पांडव जैसे सहयोगियों की टीम थी, ऐसे में क्लीन स्वीप थोड़ा आराम का मामला बन गया।
बंगाली कल्चर, हिस्ट्री और राजनीतिक बारीकियों को पूरी तरह समझ नहीं
लेकिन बंगाली लोग इतनी जल्दी आकर्षित नहीं होने वाले। बंगाली लोग बताते हैं कि भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अब भी बंगाली कल्चर, हिस्ट्री और राजनीतिक बारीकियों को पूरी तरह समझ नहीं पाई है। बंगाली अमीर हो या गरीब, वह अपनी पहचान और भाषा को लेकर संवेदनशील होता है।
भाजपा ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के लिखे 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने का जश्न तो अच्छे से मनाया, लेकिन भाजपा के कुछ लोग तो यह भी कहते रहे हैं कि रवींद्र नाथ टैगोर का लिखा 'जन गण मन' जॉर्ज पंचम के भारत आने की प्रशंसा में लिखा गया था।
इन सबके बीच बिहार से भाजपा एवं संघ से जुड़े नेताओं-कार्यकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल का रुख कर लिया है। ऐसी संभावना जताई जाने लगी है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आएगा, वैसे-वैसे बिहार से नेताओं की बडी टोली उधर कूच करने लगेगी।