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हार को जीत में बदलने वाले बाजीगर हैं अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद किए ये करिश्मे!

By हरीश गुप्ता | Updated: May 25, 2019 08:24 IST

2013 तक अपने खिलाफ आपराधिक मामलों के कारण एक छोटे से कमरे के कोने में सोने वाले शाह ने भाजपा अध्यक्ष पद की कमान थामने के बाद कामयाबियों की झड़ी सी लगा दी है.

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ठळक मुद्देअमित शाह ने पिछले पांच साल में पार्टी के लिए जो कामयाबी हासिल की है, वह किसी भी भाजपा अध्यक्ष से बेहतर है.2014 में उन्होंने पहला झटका जाटों की भूमि हरियाणा में जीत के साथ दिया.

54 वर्षीय अमित शाह के राजनीतिक कैरियर ने कम अवधि में जो ऊंचाईयां हासिल की हैं, उसने तमाम राजनीतिक पंडितों को भौंचक्का कर दिया है. 2013 तक अपने खिलाफ आपराधिक मामलों के कारण एक छोटे से कमरे के कोने में सोने वाले शाह ने भाजपा अध्यक्ष पद की कमान थामने के बाद कामयाबियों की झड़ी सी लगा दी है.

2014 में उन्होंने पहला झटका जाटों की भूमि हरियाणा में जीत के साथ दिया. वह भी अकेले दम, पुराने साथी इनेलो से नाता तोड़कर. अस्तित्व में आने के बाद से कभी भी स्थिर सरकार न देखने वाले झारखंड को भाजपा की झोली में लाना शाह का अगला चमत्कार था. यह भी मास्टरस्ट्रोक दोनों ही राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए बिलकुल नये चेहरों का चयन और उन्हें पांच साल तक कायम रखना भी शाह का एक अलग ही किस्म का कदम था.

यही बात महाराष्ट्र में दोहराई गई जब भाजपा ने अरसे बाद शिवसेना को साथ लिए बगैर 2014 में अकेले दम विधानसभा चुनाव लड़ा. 288 सदस्यों के सदन में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी भाजपा स्पष्ट बहुमत से थोड़ी सी दूरी पर रह गई थी. सत्ता के सपने बुनते हुए शरद पवार ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने की तैयारी दिखा दी. ऐसे में शिवसेना को भाजपा का साथ देने पर मजबूर होना पड़ा. यह मोदी-शाह की टीम के लिए जीत का एक बड़ा पल था. उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर में भी पीडीपी की महबूबा मुफ्ती के साथ मिलाकर सबसे बड़े गठबंधन के साथ सरकार बना दी गई. हालांकि यह ऐतिहासिक प्रयोग ज्यादा दिन तक नहीं चला.

फिर आया हार का मौसम

इसके बाद दिल्ली, बिहार में क्रमश: अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार के हाथों 2015 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार को अमित शाह के कार्यकाल का सबसे बुरा वक्त माना जा सकता है. इसे भुलाकर शाह ने 2016 में असम में पहली बार भाजपा की सरकार को साकार किया.

फिर लौटा जीत का सिलसिला

अगले साल भाजपा ने कीर्तिमान बनाते हुए उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बड़े अंतर से जीत हासिल की. यहां भी नये चेहरों को मुख्यमंत्री बनाने का सिलसिला जारी रहा. यह सभी मोदी और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की तरह संघ के ही कार्यकर्ता रहे थे. पंजाब में अलग बात पंजाब में सुरक्षा और अन्य मुद्दों के चलते भाजपा-अकाली दल गठबंधन ने आम आदमी पार्टी की हार पर ज्यादा ध्यान दिया. परिणामस्वरूप कांग्रेस के अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बन गए.

2018 में अमित शाह ने माकपा से त्रिपुरा छीनकर एक और ऐतिहासिक जीत हासिल की. हारकर भी विश्वास राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी शाह का यह विश्वास कायम रहा कि अशोक गहलोत या कमलनाथ की सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है. कर्नाटक में भी जद (एस) की सरकार की स्थिति भी डांवाडोल है. उस हार का अफसोस भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अगर किसी बात का अफसोस है तो दिल्ली और बिहार में मिली हार का. लेकिन उन्होंने नीतीश कुमार को अपने साथ मिलाकर बिहार में दोबारा सत्ता में भागीदारी हासिल कर ली.

अब उनका अगला लक्ष्य 2020 में दिल्ली फिर छीनकर भाजपा और मोदी की झोली में डालने का है. वैसे 2021 में बंगाल से ममता की विदाई के साथ सत्ता हासिल करना भी एक बड़ा सपना है. हारकर भी जीतने वाले बाजीगर अमित शाह ने पिछले पांच साल में पार्टी के लिए जो कामयाबी हासिल की है, वह किसी भी भाजपा अध्यक्ष से बेहतर है.

टॅग्स :अमित शाहलोकसभा चुनाव
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