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2002 दंगे: राज्य को बदनाम करने के लिए सीतलवाड़ द्वारा ‘‘रची’’ गई बड़ी साजिश: गुजरात सरकार ने न्यायालय में कहा

By भाषा | Updated: December 2, 2021 19:31 IST

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नयी दिल्ली, दो दिसंबर गुजरात सरकार ने 2002 के दंगों से संबंधित जाकिया जाफरी की याचिका पर बहस के दौरान बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में दावा किया कि लगभग दो दशकों से राज्य को बदनाम करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने एक बड़ी साजिश ‘‘रची’’ है।

गुजरात की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार की पीठ से कहा कि उनके पास जाकिया जाफरी के खिलाफ कहने के लिए कुछ नहीं है क्योंकि उन्होंने अपने प्रियजन को खो दिया है।

अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में 28 फरवरी, 2002 को हिंसा के दौरान मारे गए मारे गए कांग्रेस नेता एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित 64 लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) की ‘क्लीन चिट’ को चुनौती दी है।

एसआईटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत में तर्क दिया कि सीतलवाड़ पर दंगों के दौरान एक बड़ी साजिश के आरोप सामने आ रहे है। जाकिया द्वारा उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका में सीतलवाड़ याचिकाकर्ता नंबर दो है।

मेहता ने पीठ को बताया, ‘‘मेरा तर्क यह है कि याचिकाकर्ता नंबर दो (तीस्ता सीतलवाड़) द्वारा लगभग 20 वर्षों से एक पूरे राज्य को बदनाम करने के लिए एक बड़ी साजिश रची गई है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पास याचिकाकर्ता नंबर एक (जाकिया जाफरी) के खिलाफ कुछ भी नहीं है, वह आहत है, उन्होंने अपने प्रियजन को खो दिया है। मुझे उनके खिलाफ कुछ नहीं कहना है। लेकिन, मैं अपने शब्दों का बहुत सावधानी से चयन कर रहा हूं, उनके (जाकिया) दुखों की एक सीमा होनी चाहिए।’’

मेहता ने पीठ को बताया कि एसआईटी ने समय-समय पर शीर्ष अदालत के समक्ष स्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी। उन्होंने बहस के दौरान कहा, ‘‘यह शुरू से ही मेरी शिकायत रही है कि एसआईटी ने झूठे सबूत गढ़ने के लिए उस पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया। यह झूठे सबूतों को गढ़ने के अलावा और कुछ नहीं है।’’ इस मामले में अब सात दिसंबर को आगे बहस जारी रहेगी।

मेहता ने एक अन्य मामले में गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश का भी जिक्र किया जिसमे 2002 के दंगा पीड़ितों के लिए सीतलवाड के गैर सरकारी संगठन को मिले धन के दुरुपयोग के आरोप लगाये गये हैं।

एसआईटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि अब इसे खत्म किया जाना चाहिए क्योंकि दंगों के दौरान बड़ी साजिश के आरोपों के समर्थन में कुछ भी नहीं है और विशेष जांच दल ने 2006 में जकिया जाफरी की शिकायत की गहराई से जांच भी की थी।

रोहतगी ने सारे घटनाक्रम का जिक्र किया और कहा कि दंगे 2002 में हुए थे जबकि जकिया जाफरी ने व्यापक साजिश का आरोप लगाते हुए 2006 में शिकायत दायर की थी।

इस पर पीठ ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कार्यवाही को अंतिम रूप देने का भी अधिकार है।

पीठ ने कहा, ‘‘किसी भी व्यक्ति को, जिस पर किसी अपराध का आरोप है, निष्पक्ष सुनवाई के बिना दोषमुक्त नहीं होना चाहिए। साथ ही, आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कार्यवाही को अंतिम रूप देने का भी अधिकार है।’’

इससे पहले, जकिया जाफरी के अधिवक्ता ने दलील दी थी कि 2006 में उसकी यही शिकायत थी कि यह ‘एक बड़ी साजिश’ थी जिसमे नौकरशाही की निष्क्रियता, पुलिस की मिली भगत, नफरत वाले भाषणों और हिंसा की छूट थी।

गौरतलब है कि गोधरा ट्रेन की घटना के एक दिन बाद हुई हिंसा में मारे गए 68 लोगों में पूर्व सांसद एहसान जाफरी भी शामिल थे। साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे को गोधरा में जला दिया गया था, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी जिससे 2002 में गुजरात में दंगे हुए थे।

आठ फरवरी, 2012 को, एसआईटी ने मोदी, (अब प्रधानमंत्री) और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों सहित 63 अन्य को क्लीन चिट देते हुए मामला बंद करने के लिए ‘क्लोजर रिपोर्ट’ दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि उनके खिलाफ ‘‘कोई मुकदमा चलाने योग्य सबूत नहीं’’ है।

जाकिया जाफरी ने 2018 में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर गुजरात उच्च न्यायालय के पांच अक्टूबर, 2017 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एसआईटी के फैसले के खिलाफ उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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