लखनऊः उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) जैसे बड़े निकाय में धांधली या भ्रष्टाचार की खबरें अक्सर चर्चा में रहती हैं. सूबे में सरकार चाहे मुलायम सिंह यादव ही रही हो या मायावती की, इस संस्था में भूखंडों के में नियमों की अनदेखी के कई मामले सामने आए हैं. मुलायम सिंह यादव के समय गाजियाबाद की ट्रोनिका सिटी में भूखंड आवंटन में करीब 400 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगा. जबकि मायावती के शासनकाल में यूपीसीडा में तैनात अफसरों ने साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए आरक्षित 175 एकड़ जमीन को अवैध रूप से निजी बिल्डरों और कारखानों को बेच दिया था. और अब योगी सरकार में इस संस्था के बड़े अफसरों ने दो बिल्डर कंपनियों को 255.75 करोड़ रुपए के ठेके फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दे दिए.
यही नहीं मथुरा के कोसी कोटवन क्षेत्र में 1.04 लाख रुपए की नेटवर्थ वाली कंपनी को 300 करोड़ रुपए की परियोजना के लिए 28,011.15 वर्ग मीटर जमीन आवंटित की गई. जौनपुर में भी आईआरसीटीसी के आवेदन को नजरअंदाज कर एक अपात्र कंपनी को जमीन आवंटित करने का कारनामा भी यूपीसीडा के अफसरों ने किया है.
योगी सरकार के शासनकाल में हुई इन अनियमितताओं को लेकर राज्य के औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी का कहना है, इस मामले में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के आधार पर जल्दी ही दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई ही जाएगी.
ठेके देने में हुई धांधली
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दो बिल्डर कंपनियों को 255.75 करोड़ रुपए के औद्योगिक विकास कार्यों के ठेके आवंटित कर दिए गए थे. इसके तहत मेसर्स बालाजी बिल्डर को अनुभव प्रमाण पत्र का सत्यापन किए बिना ही औद्योगिक क्षेत्रों के दो चयनित निर्माण खंडों के विकास के लिए 143.22 करोड़ रुपए के 13 अनुबंध प्रदान किए गए.
इसी प्रकार मेसर्स आकाश इंजीनियरिंग एंड बिल्डर्स को अनुभव प्रमाण पत्र और एफडी के सत्यापन के बिना 112.53 करोड़ रुपए के दो अनुबंध दिए गए. बाद में इन कंपियों के दस्तावेज़ फर्जी पाये गए तो इनके अनुबंध भी निरस्त किए गए, लेकिन इस मामले में किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई.
हालांकि इन दोनों ही मामलों में एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी. सीएजी ने इस मामले में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की संस्तुति सरकार से की है. इसके अलावा भी सीएजी ने यह भी पाया है कि यूपीसीडा में विकास कार्यों से जुड़े ठेकों की बोली प्रक्रिया से पहले ठेकेदारों की तकनीकी और वित्तीय क्षमता का समुचित आकलन किए बिना ही 1.01 करोड़ रुपए से लेकर 63.41 करोड़ रुपए के 27 ठेके ऐसे ठेकेदारों को दिए गए जो ठेके पाने की पात्रता के मानकों पर खरे नहीं उतरे थे.
ठेके देने के अलावा भूखंड आवंटन में भी अनियमितता हुई
भूखड़ों की आवंटन को लेकर यह पाया गया है कि मथुरा के कोसी कोटवन औद्योगिक क्षेत्र में 28,011.15 वर्गमीटर का यह भूखंड उस कंपनी को आवंटित किया गया था जिसकी नेटवर्थ 1.04 लाख रुपये थी.इस भूखंड पर 300 करोड़ रुपये की परियोजना स्थापित की जानी थी. आवेदक को इकाई स्थापित करने के लिए वर्ष 2021 से 2024 तक का समय विस्तार भी दिया गया,
लेकिन उसके तय समय बीतने के बाद भी फैक्ट्री लगाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की. इसी प्रकार कोसी कोटवन एक्सटेंशन-1 के करीब 1800-1800 वर्ग मीटर के दो भूखंडों के आवंटन उन कंपनियों को किए गए जिनकी वार्षिक आय केवल 7.24 लाख और 6.36 लाख रुपये थी। इन भूखंडों को 41.53 और 40.25 करोड़ रुपए की प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए कंपनियों को आवंटित किया गया था,
लेकिन यूपीसीडा ने कंपनियों की नेटवर्थ की जांच नहीं की थी. परिणामस्वरुप उक्त कंपनियां भूखंडों के आवंटन के एक माह के भीतर 6.95 लाख रुपये जमा नहीं कर सकी. इसके बाद इन कंपनियों के दोनों आवंटन 12 अप्रैल 2023 को निरस्त किए गए. इसी तरह झांसी और उरई में भी भूखंडों के आवंटन में अनियमितता पाई गई है. जौनपुर में 5018 वर्ग मीटर का भूखंड पाने के लिए मेसर्स जय भगवती ट्रेडर्स और रेलवे की इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन ने आवेदन किया था लेकिन भूखंड आवंटन में आईआरसीटीसी के आवेदन को नजरअंदाज मेसर्स जय भगवती ट्रेडर्स की डीपीआर पर विचार किया गया.
इस नाते आईआरसीटीसी को भूखंड नहीं मिला.इन प्रकरणों यूपीसीडा की कार्यप्रणाली पर सीएजी ने प्रश्न चिन्ह लगाया गया है. अब औद्योगिक विकास मंत्री ने इस प्रकरण को लेकर दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है.