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जी-7 कर समझौता : बचाव की चाल में कम नहीं हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां

By भाषा | Updated: June 8, 2021 17:24 IST

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रोनेन पलान (लंदन विश्वविद्यालय)

लंदन, आठ जून (द कन्वरसेशन) लंदन में जी-7 समूह के अमीर देशों के वित्त मंत्रियों के बीच एक ऐसे करार पर सहमति बनी है, जिसे ऐतिहासिक बताया रहा है। कहा जा रहा है कि इससे कंपनियों पर कर व्यवस्थाओं का वैश्विक परिदृश्य बदल जाएगा।

हालांकि, अभी इस समझौते का जो ब्योरा सामने आया है वह काफी कम है। इस करार पर अभी आगे की बातचीत चल रही है। लेकिन निश्चित रूप से यह बड़ा बदलाव लाने वाला समझौता होगा।

मैं सिर्फ जिस एक बात के लिए निश्चिंत नहीं हूं वह यह है कि यह बदलाव किस बात से किस बात का बदलाव होगा? क्या इससे कराधान प्रणाली में बदलाव आएगा जिसे 20वीं सदी की शुरुआत में बनाया गया और जो 21वीं सदी की जरूरतों को पूरा करने लायक नहीं रह गयी है? या फिर इस समझौते से कर से बचने की तकनीकों में बदलाव आएगा और कर से बचने की योजनाओं का एक पूरा नया तामझाम रचा जाएगा?

मुझे लगता कि अंतत: बाद वाली बात ही होगी।

मैं इसमें अकेला नहीं हूं। दुनिया के शेयर बाजारों ने भी इस करार को निश्चिंत भाव से लिया है।

बाजारों में ऐसा कुछ नहीं दिखा कि कॉरपोरेट जगत पर कराधान के विषय में 100 साल का एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है। बाजारों का यह रुख हमें संभवत: बता रहा है कि कुछ भी कर लिया जाए, बंड़ी कंपनियों के कर-पश्चात-लाभ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है।

कर से बचा कैसे जाता है?

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर कराधान व्यवस्था का विकास 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में हुआ। इसमें कहा गया कारोबार करने वाली कंपनी की आय पर कर उसी स्थान पर लगेगा जहां उसका कारोबार स्थापित है। लेकिन इसमें एक कमजोरी रह गयी क्योंकि वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा कंपनियों की अपनी अपनी अनुषंगियों के बीच के सादों के रूप में होता है।

कंपनियां प्राय: अपने मुनाफे वाली गतिविधियों को अपने उस देश की अनुषंगी के खाते में दिखाती हैं जहां कंपनी आयकर की दर सबसे कम होती है। ऐसे देशों/क्षेत्रों को कर से बचने वालों की पनाहगाह कहा जाता है।

नियामक भी कर बचाव की इन तकनीकों के बारे में जानते हैं। इस चाल को मूल्य-स्थानांतरण कहा जाता है। इस तरह के व्यवहार को रोकने के लिए नियमों के पूरे सेट खड़े किये गए हैं, लेकिन इसके वांछित नतीजे नहीं मिले हैं। उल्टे इससे कर से बचने की अलग अलग योजनाएं सामने आई है। इन्हें देशों/अधिकार क्षेत्रों के अंतर-पणन की योजना कहा जाता है।

इस तरह की योजनाओं में एक देश के कानूनों ढिलाई, कमजोरी या चूक का लाभ लेकर दूसरे देश के कानून को छकाया जाता है। उदाहरण के लिए एपल ने कर कहां दिया जाए, इसके लिए आयरलैंड और अमेरिका के नियमों में अंतर का फायदा उठाने के लिए आयरलैंड में दो अनुषंगी कंपनियां बनाईं। इसे कर टैक्स रेजिडेंसी या कर-निवास कहा जाता है।

एपल ने अमेरिका के बाहर से अपनी अधिकांश बिक्री आय को इन अनुषंगियों के खाते में स्थानांतरित किया। चूंकि ये अनुषंगियां कहीं भी कर रेजिडेंस (कर-निवासी) नहीं थीं, वे कहीं भी कर का भुगतान नहीं कर सकती थीं। इस समय यूरोपीय आयोग ने एपल के खिलाफ जो मामला बनाया है उसका विषय यही है।

वहीं इस रुख के उलट अमेजन ने आंतरिक स्थानांतरण का रास्ता अपनाया जिसके जरिये उसने उदार अमेरिकी कर क्रेडिट प्रणाली का फायदा लिया। अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार से घाटे को अमेरिका स्थानांतरित कर अमेजन ने काफी कम या बिल्कुल भी कर नहीं दिया।

आगे क्या

लंदन में जिस नई कर प्रणाली पर सहमति बनी है, उसकी नजर में (कंपनियों द्वारा अपनायी जाने वाली) ऐसी ही कुछ तकनीकें हैं। प्रथम, इसमें हर देश में न्यूनतम 15 प्रतिशत की दर से कराधान की व्यवस्था किए जाने का प्रस्ताव किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि शून्य कर क्षेत्र मसलन केमैन आइलैंड या बरमुडा में स्थित अकेली कॉरपोरेट इकाई का इस्तेमाल आज के समय कर बचाव के लिए नहीं किया जाएगा, क्योंकि पर्याप्त संख्या में ऐसे कर बचाव रोधक नियम बनाए गए हैं जिसके तहत कंपनी का इस्तेमाल कर से बचने के लिए नहीं किया जा सकता।

फिर भी केमन आइलैंड, बरमुडा या -वास्तव में नीदरलैंड, लक्जमबर्ग, स्विट्जरलैंड , आयरलैंड और सिंगापुर में पंजीकृत अनुषंगियों का प्राय: ही अलग-अलग कर व्यवस्थाओं के बीच अंतर-पणन का लाभ उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कर की शून्य दर इस तरह की चालों में बड़ी भूमिका निभाती है।

यह कहना अभी मुश्किल है कि क्या प्रस्तावित न्यूनतम कॉरपोरेट कर की व्यवस्था से एपल की आयरलैंड में स्थापित उन अनुषंगियों की व्यवस्था पर असर पड़ेगा जो ‘कहीं की कर-निवासी नहीं‘ हैं।

इस समय मेरे लिए यह भी काफी सोच का विषय है कि इससे अमेजन की कर की स्थिति किस तरीके से प्रभावित होगी। ऐसे में जी-7 ने नए नियमों में दूसरा तत्व जोड़ा है। कर वहीं देना होगा जहां बिक्री होगी, वहां नहीं जहां परिचालन पंजीकृत होगा।

वैकल्पिक रूप से मुझे लगता है कि इस करार से अमेजन जैसी कंपनियों द्वारा अपनाई गई तकनीकों को अधिक बढ़ावा मिलेगा जिसमें कंपनी खाता-बही की चतुराई से अपना नुकसान बढ़ाकर अपने आकार को बड़ा कर के दिखाती हैं।

दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो यह नया करार बदलाव लाने वाला जरूर होगा, लेकिन इससे बहुरार्ष्टीय कंपनियों का कर दायित्व प्रभावित होगा या नहीं यह अलग यह पूरी तरह अलग बात है।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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