Turkey moving forward towards conservatism | रूढ़िवादिता की दिशा में आगे बढ़ता तुर्की

लेखक-रहीस सिंह 

तुर्की में आधिकारिक तौर पर घोषित नतीजों के अनुसार राष्ट्रपति  उदरेगान ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी मुहर्रम इन्स को बड़े अंतर से पराजित करते हुए चुनाव जीत लिया है। संसदीय प्रणाली से अध्यक्षीय प्रणाली में परिवर्तित हुए तुर्की के बाद उदरेगान का यह पहला चुनाव था। इस नई प्रणाली में उदरेगान ने अपने लिए असीमित शक्तियां जनमत के जरिए सुनिश्चित करा ली हैं. यानी अब वे एक प्रकार से तुर्की के निरंकुश राष्ट्रपति होंगे।

हालांकि ऐसी उम्मीद पहले से ही थी कि उदरेगान जीतेंगे क्योंकि सर्वेक्षण और उसके बाद सत्ता व संवैधानिक प्रतिष्ठानों पर उनके नियंत्रण का लाभांश तो उन्हें प्राप्त ही होना था। यह तुर्की के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है लेकिन दुनिया के लिए नहीं क्योंकि उदरेगान अतातुर्क कमाल पाशा की तुर्की को रूढ़िवादी कट्टरपंथ की ओर ले जाते दिख रहे हैं। 16 अप्रैल 2017 को तुर्की में जनमत सर्वेक्षण से उदरेगान ने जो शक्तियां हासिल कीं या तुर्की के लोगों ने उन्हें जिन शक्तियों को प्राप्त करने की ताकत प्रदान की उससे तुर्की अतातुर्क कमाल पाशा के काल से बहुत पीछे जाकर आटोमन काल में शिफ्ट होने की दिशा सुनिश्चित कर बैठा।

रही बात भारत के लिए उदरेगान की जीत के मायने की तो वे भारत की सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का समर्थन करते हैं, साथ ही एनएसजी में प्रवेश का भी समर्थन करते हैं, लेकिन वे एनएसजी में भारत के प्रवेश का समर्थन करने के साथ पाकिस्तान के शामिल होने की वकालत भी करते हैं। तुर्की रणनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान को भारत के मुकाबले अधिक तरजीह देता है। उदाहरण के तौर पर कुछ वर्ष पूर्व अफगानिस्तान पर तुर्की में होने वाले सम्मेलन में पाकिस्तान के कहने पर भारत को नहीं बुलाया गया।

उदरेगान जब भारत आए तो उन्होंने अपनी यात्र शुरू होने से ठीक पहले कश्मीर पर भारत विरोधी नजरिया पेश किया। अब उदरेगान राज्य की तमाम शक्तियां हासिल कर उन्हें वैध बनाकर क्षेत्रीय ताकतों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहेंगे। इसके लिए उन्हें पाकिस्तान या पाकिस्तान-सऊदी अरब गठजोड़ की जरूरत पड़ेगी। उदरेगान जानते हैं कि इस्लामी अनुसमर्थन के अतिरिक्त मध्य-पूर्व में जो विन-विन गेम चल रहा है उसमें आने वाले समय में रूस और अमेरिका के साथ-साथ चीन भी महत्वपूर्ण भूमिका में होगा। चूंकि चीन-रूस-पाकिस्तान के मध्य एक त्रिकोण बनता हुआ दिख रहा है जिसके सामरिक, आर्थिक एवं भू-क्षेत्रीय निहितार्थ हैं, इसलिए तुर्की का झुकाव इस्लामाबाद या बीजिंग-इस्लामाबाद की ओर नई दिल्ली के मुकाबले अधिक है।

 


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