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सोशल मीडिया बैन कर देने भर से कैसे बचेगा बचपन ?

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: December 17, 2025 07:28 IST

शायद यही कारण है कि अब दुनियाभर में ‘टॉडलर टेक्नो’ पार्टियों का चलन बढ़ रहा है, जिसमें बच्चे और उनके माता-पिता मिलकर डांस करते हैं.

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हेमधर शर्मा

आखिर ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन हो ही गया और पिछले हफ्ते वहां लाखों किशोरों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद हो गए. ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री का कहना है कि बच्चे अब अपने बचपन को जी सकेंगे.

लेकिन अपना बचपन जीने के लिए हमने बच्चों के पास साधन ही क्या छोड़ा है? दुनिया में ऐसे बच्चे अपवादस्वरूप ही होंगे जो सोशल मीडिया का इस्तेमाल न करते हों. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2022 के बीच किशोरों में सोशल मीडिया की लत और अनियंत्रित उपयोग सात से बढ़कर 11 प्रतिशत हो गया. यह आंकड़ा तीन साल पहले का है और आज की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है. शायद यही कारण है कि बच्चों के इन प्रतिबंधों से बचने के तरीके चोरी-छिपे खोजने और अत्यधिक जोखिम भरी साइटों के चंगुल में फंसने की आशंका जताई जा रही है.तो क्या इस डर से बच्चों को सोशल मीडिया का शिकार होते रहने देना चाहिए?

अमेरिका से एक खबर है कि वहां माता-पिता अपने बच्चों को ‘जंगल कैम्प’ उपहार में दे रहे हैं अर्थात उन्हें खिलौने गिफ्ट करने के बजाय जंगल कैम्पों में भेज रहे हैं. इसे ‘एक्सपीरियंस गिफ्टिंग’ का नाम दिया जा रहा है यानी बच्चों को ऐसी जगह भेजना जहां वे खुद को खोजें, मुश्किलों से निपटना सीखें और असली दुनिया को महसूस करें. इसका नतीजा भी देखने को मिल रहा है. बच्चों का तनाव घट रहा है, निर्णय क्षमता बढ़ रही है और वे टीम वर्क सीख रहे हैं. भारत में भी कुछ जगहों पर इस तरह के चलन की शुरुआत देखने को मिल रही है. सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से बच्चों की दिनचर्या में आने वाले खालीपन को भरने के लिए ऐसे तरीके मददगार साबित हो सकते हैं.

‘जंगल कैम्प’ से पुरानी पीढ़ी के लोगों को अपना बचपन याद आ गया होगा, जब उनके ऊपर बड़ोंं की अपेक्षाओं का बोझ नहीं था और वे स्कूल टाइम के अलावा बाकी समय में, प्रकृति की गोद में कहां-कहां विचरते रहते थे, इसके बारे में बड़ों को न तो पता रहता था और न फिक्र ही. बड़ों के समानांतर बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती थी, जिसके मालिक वे स्वयं होते थे.

पढ़ने के लिए चंपक, चंदामामा, पराग, नंदन, सुमन सौरभ, अमर चित्रकथा जैसी बाल पत्रिकाएं होती थीं, जो सहजता के साथ बाल मन को संस्कारित करती चलती थीं. रात में दादी-नानी से किस्से-कहानियां सुनते-सुनते कब नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता था. सोशल मीडिया के युग में आज हमने ऐसे कितने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार किए हैं जो बच्चों के समग्र विकास के लिए समर्पित हों? कितने बच्चों को बड़ों से किस्से-कहानियां सुनते हुए सोने का सौभाग्य हासिल होता है?

आज हम अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के बड़े-बड़े सपने देखते हैं, लेकिन इन सपनों में उन बच्चों की कितनी हिस्सेदारी होती है? बच्चों की भलाई के नाम पर कहीं हम उन्हें अपनी अहंकार तृप्ति का साधन तो नहीं बनाते जा रहे हैं? आखिर कितने अभिभावक अपने बच्चों की रुचियों को ध्यान में रखकर उनका भविष्य तय करते हैं? सच तो यह है कि अगर हम अपने बच्चों का विश्वास जीतने की कोशिश करते तो अपनी सारी बुराइयों के बावजूद सोशल मीडिया उनके लिए इतना घातक साबित नहीं होता कि उसे बैन करने की नौबत ही आ जाए.

हम मनुष्यों के जीवन में आज सहजता अगर कहीं बची हुई है तो वह बचपन ही है, जो बड़ों के सारे छल-कपट और बनावटीपन से अनजान होता है. उस निष्कपटता का ही असर है कि बच्चों के साथ खेलते या उनसे घुलते-मिलते ही हमारा सारा तनाव छू-मंतर हो जाता है. मौलिकता ऐसी कि छोटे-छोटे बच्चे जैसी सरलता से डांस कर लेते हैं, बड़े लोग कड़े अभ्यास से भी वैसी सहजता नहीं ला पाते. शायद यही कारण है कि अब दुनियाभर में ‘टॉडलर टेक्नो’ पार्टियों का चलन बढ़ रहा है, जिसमें बच्चे और उनके माता-पिता मिलकर डांस करते हैं. विशेषज्ञों का तो कहना है कि बच्चे डांस करते वक्त न तो अपनी शक्ल की परवाह करते हैं और न स्टेप्स की, वे तो बस मस्ती करते हैं. और यह मस्ती निश्छलता से ही आ पाती है.

क्या आज हमें इस बात का अहसास है कि सोशल मीडिया में जो कूड़ा हम डाल रहे हैं या बाहर की दुनिया को अन्य तरह से प्रदूषित कर रहे हैं, वही पलट कर हमारे बच्चों के जीवन को तबाह कर रहा है? जिस दिन हम यह कचरा फैलाना बंद कर देंगे, उस दिन सोशल मीडिया को बैन करने की भी जरूरत नहीं रह जाएगी और जो आज हमारे बच्चों के लिए अभिशाप बन चुका है, वही सोशल मीडिया उनके लिए वरदान बन जाएगा.

टॅग्स :सोशल मीडियाऑस्ट्रेलियाअमेरिकाभारत
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