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राम राज्य: वैश्विक शांति का कालजयी मार्ग?, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी?

By डॉ. विशाला शर्मा | Updated: March 27, 2026 17:36 IST

रावण का वध हो गया और विभीषण को लंका का राजा बनाया गया, तब राम ने अपनी नीति को इन प्रसिद्ध शब्दों में रखा- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.’

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ठळक मुद्देराम की मर्यादा मनुष्य को अभाव में धैर्य प्रदान करती है और विलास में कर्तव्य का विवेक देती है.मर्यादा पुरुषोत्तम राम अभाव और वैभव के क्षणों में अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होते. राम की यही मर्यादा उन्हें सामान्य व्यक्ति से विशिष्ट श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है.

राम की मर्यादा भावी पीढ़ी में संदेश का सूत्रपात करती है. राम जन-जन को अपने कार्यों के द्वारा यह मंत्र देते हैं कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की, एक समाज दूसरे समाज और एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की स्वतंत्रता को हानि नहीं पहुंचाए. यही मर्यादा का सही स्वरूप है. राम की मर्यादा मनुष्य को अभाव में धैर्य प्रदान करती है और विलास में कर्तव्य का विवेक देती है.

राम ने प्रत्येक जीव के अंदर ईश्वर का अंश माना, सदैव मन, वचन और कर्म से समाज के मंगल हेतु परहित को अपना धर्म मानते हुए उसी राह का अनुसरण किया. भरत की विनती पर साधु और असाधु का भेद बताते हुए समझाते हैं ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई.’ निरपेक्ष रहकर दूसरों के हितार्थ कार्य करना परहित है.

परपीड़ा हरण करना भी परहित है. पारस्परिक विरोध की भावना से रहित रहना भी परहित है. और दीन-दुखी, दुर्बल की सहायता करना भी परहित है. मर्यादा पुरुषोत्तम राम अभाव और वैभव के क्षणों में अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होते. राम की यही मर्यादा उन्हें सामान्य व्यक्ति से विशिष्ट श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है. राम की मर्यादा आत्म-संयम का श्रेष्ठ उदाहरण है.

राम धन, भय अथवा किसी लोभ से वशीभूत होकर मर्यादा का पालन नहीं करते, अपितु जीवन जीने की कला के रूप में वह मर्यादा को ग्रहण करते हैं. राम के चरित्र से भावी पीढ़ी इस बात को आत्मसात कर सकती है कि कीमत व्यक्ति की नहीं, सद्गुणों और उसके उदात्त विचारों की होती है. रामराज्य तो वहीं स्थापित होता है जहां प्रेम और सदाचार का साम्राज्य है.

श्रीराम ने एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को हानि न पहुंचाने और संप्रभुता के सम्मान की बात को लंका विजय के बाद स्पष्ट किया था. जब रावण का वध हो गया और विभीषण को लंका का राजा बनाया गया, तब राम ने अपनी नीति को इन प्रसिद्ध शब्दों में रखा- ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.’

यह उक्ति मातृभूमि के प्रेम के लिए आज भी प्रसिद्ध है, लेकिन इसके पीछे का संदर्भ अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अनाक्रमण  की नीति को दर्शाता है. संप्रभुता के सम्मान का भाव राम के चरित्र की विशेषता रही. रावण को हराने के बाद राम के पास लंका को अपने साम्राज्य में मिलाने का पूरा अवसर था.

लक्ष्मण ने भी स्वर्णमयी लंका की सुंदरता देखकर वहां रुकने का विचार व्यक्त किया था, लेकिन राम ने स्पष्ट किया कि दूसरों की संपत्ति या राष्ट्र पर अधिकार करना धर्म नहीं है. वनवास काल में राम का नदियों, पर्वतों और वन्यजीवों के प्रति जो अनुराग दिखा, वह पारिस्थितिकी संतुलन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है.

वे प्रकृति के साथ द्वंद्व नहीं, बल्कि संवाद और सह-अस्तित्व की शिक्षा देते हैं. एक शासक के रूप में श्रीराम का जीवन यह बोध कराता है कि सत्ता का वास्तविक ध्येय लोकरंजन और न्याय है. आज के भौतिकतावादी युग में, जहां मानवीय मूल्यों का ह्रास  हो रहा है, राम का जीवन एक नैतिक प्रकाश-स्तंभ की भांति है.

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