श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र
चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है. चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है. इन दो महान व्यक्तित्वों का जन्म चैत्र माह में ही सिर्फ चार तिथियों के अंतर पर हुआ.
हालांकि दोनों के जन्म में हजारों वर्षों का अंतर है. फिर भी दोनों के बीच एक मधुर, गहरा और अद्भुत संबंध है. भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर हैं. इस महान तीर्थंकर परंपरा के प्रथमेश असि, मसि, कृषि व अंक शब्दों के जनक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) से हुआ, जो कि पहले तीर्थंकर थे.
भगवान आदिनाथ अयोध्या के राजा नाभिराज के पुत्र के रूप में जन्मे. यानी अयोध्या न केवल श्रीराम की जन्मभूमि रही है, बल्कि जैन परंपरा में भी अत्यंत पवित्र स्थान है, क्योंकि यहां चार अन्य तीर्थंकरों का जन्म भी हुआ अजितनाथ (दूसरे), अभिनंदननाथ (चौथे), सुमतिनाथ (पांचवें) और अनंतनाथ (14वें). संयोग से, भगवान आदिनाथ का जन्म भी चैत्र मास में ही हुआ था.
हालांकि वह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी. उन्होंने सूर्यवंश की इक्ष्वाकु परंपरा की स्थापना की, वही वंश जिसमें कई पीढ़ियों बाद भगवान श्रीराम का जन्म हुआ. इस सदी के चौबीस तीर्थंकरों में से तीन तीर्थंकरों, वासु पूज्य स्वामी, मुनिसुव्रतनाथ व नेमिनाथ तीर्थंकर को छोड़कर बाकी इक्कीस तीर्थंकर इक्ष्वाकुवंश में जन्म.
इस प्रकार, भगवान महावीर की जैन परंपरा और भगवान श्रीराम की वंशावली दोनों की जड़ें भगवान आदिनाथ से जुड़ती हैं. चाहे तीर्थंकर हों या श्रीराम, सभी ने धर्म की भावना को जीवन का मूल बनाया. इक्ष्वाकु वंश का नाम ही ‘इक्षु’ अर्थात गन्ने से लिया गया है. सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्यावासी गन्ने की खेती करते थे और उसका रस निकालना जानते थे.
यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि भगवान ऋषभदेव ने अपने पौत्र श्रेयांस कुमार के हाथों हस्तिनापुर शहर में अपने 400 दिवसीय उपवास को अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस को स्वीकर कर उस कठिन तपस्या का पारणा संपन्न किया. विस्तृत गहराई से अगर अध्ययन किया जाए तो दोनों महापुरुषों ने सत्य, धर्म व सात्विक जीवन शैली तथा परपीड़ा नहीं पहुंचाने का प्रयास ही नहीं किया.
अपितु जनमानस को संदेश भी दिया. अनेक प्रकार से देखा और समझा जा सकता है कि मूलतः धर्म की आत्मा हमें यह सिखाती है कि मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है. चाहे वो तीर्थंकर हों या मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम. धर्म वह स्वभाव है जो हर मानव के भीतर प्राकृतिक रूप से निहित है.
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