हेमधर शर्मा
हाल ही में नववर्ष की पूर्व संध्या पर होने वाली पार्टियों में बड़ी संख्या में महिलाएं, खासकर जेन-जी लड़कियां शराब के नशे में धुत नजर आईं, जिससे सवाल उठ रहा है कि क्या महिलाएं इस मामले में भी पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं? यह सवाल इसलिए भी ज्यादा परेशान करने वाला है कि महिलाओं में नशा करने का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है, 2019-21 में भारतीय महिलाओं में जहां शराब पीने की दर 0.7 प्रतिशत थी, वहीं अब यह 1.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है, यानी लगभग दोगुना!
हाल ही में जर्मनी में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि महिलाओं पर शराब का बुरा असर पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा पड़ता है. शोधकर्ताओं ने पुरुषों और महिलाओं को वजन के अनुपात में समान मात्रा में शराब दी. पता चला कि महिलाओं के शरीर में शराब को शुरुआती चरण में तोड़ने वाला एंजाइम कम सक्रिय रहा, जिससे ज्यादा अल्कोहल सीधे खून में पहुंच गया और इसके चलते नशा तेजी से बढ़ा.
एक अध्ययन में तो यह भी पाया गया है कि महिलाओं के हार्मोनल चक्र न केवल उन्हें नशीली दवाओं की लत के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं बल्कि नशे की लत छुड़ाने वाली उन दवाओं का भी उन पर कम असर होता है जो पुरुषों के लिए बहुत प्रभावी होती हैं.
कपड़ा अगर साफ हो तो उसमें हल्का सा दाग भी दूर से ही नजर आता है, जबकि मैले कपड़े में कालिख लग जाने पर भी उसमें कुछ खास फर्क नहीं दिखता. कहीं ऐसा तो नहीं कि हजारों वर्षों तक महिलाओं को दोयम दर्जे का समझने वाले पुरुषों की संवेदना इतनी कुंद हो गई हो कि उन पर शराब भी (महिलाओं की तुलना में) ज्यादा असर न कर पाती हो?
इसमें कोई शक नहीं कि पाशविक बल में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं कमजोर होती हैं लेकिन सदियों की उपेक्षा, प्रताड़ना और शारीरिक बनावट ने उनके भीतर गजब की सहनशीलता पैदा की है. विवाह के बाद जिस तरह से लड़कियां एकदम अनजान घर में जाकर उसे अपनाती हैं, क्या लड़के वैसा कर सकते हैं? प्रसव पीड़ा झेलने को यूं ही नया जन्म लेना नहीं कहा जाता और नवजात शिशु को तो एक दिन के लिए भी संभालना पुरुषों के बस की बात नहीं होती.
हजारों वर्षों तक लड़ाई-झगड़े में ही मुख्य रूप से लगे रहने के कारण पथरा चुकीं अपनी संवेदनाओं को पुरुष जब भी जाग्रत करने की कोशिश करेंगे तो पहले उन्हें अतीत में नारी जाति के किए गए शोषण और दमन का परिमार्जन करना होगा.
मैला कपड़ा आखिर कब तक अपने गंदेपन से संतुष्ट रहेगा, कभी न कभी तो उसके भीतर भी उजला दिखने की इच्छा जगेगी ही, और तब क्या उसे अपने हजारों वर्षों के मैल को घिस-घिस कर साफ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी! डर लेकिन यह है कि सदियों के अभ्यास से अर्जित अपने सद्गुणों को महिलाएं कहीं पुरुषों से बराबरी करने के चक्कर में गंवा न बैठें!
आज जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा होगा जिसमें महिलाओं ने अपनी सफलता के झंडे न गाड़े हों. फिर बुराई के क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी करने की होड़ में वे क्यों शामिल हों? पुरुष जहां विनाश लीला रचने में माहिर होते हैं, वहीं महिलाओं को प्रकृति ने सृजन की क्षमता से सम्पन्न कर रखा है. पुरानी कहानी है कि एक बंदर बार-बार एक चिड़िया के घोंसले को उजाड़ देता था और चिड़िया हर बार नया घोंसला बनाती.
आखिर में जब बंदर को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसने चिड़िया को उसका घोंसला बनाकर देने की कोशिश की, लेकिन दो-चार तिनकों को भी वह सही ढंग से जोड़ नहीं पाया. तब उसे महसूस हुआ कि तोड़ना कितना सरल है और जोड़ना कितना कठिन! पुरुष भी क्या अनाड़ी बंदर की तरह ही नहीं होते जो सिर्फ तोड़ना जानते हैं! हकीकत तो यह है कि महिलाएं अगर शासन सूत्र संभाल लें तो यह दुनिया आज भी रहने के लिए एक शानदार जगह बन सकती है.
युद्धकाल में भले ही समाज में पुरुष वर्ग की प्रधानता रहे, शांतिकाल में तो महिलाओं की सृजनात्मक शक्ति ही मानव जाति को उन्नति के शिखर पर पहुंचाएगी. लेकिन इसके लिए महिलाओं को नशे की गर्त में गिरने से बचाना जरूरी है. नशेड़ी पुरुष सिर्फ अपना नुकसान करता है लेकिन महिला अगर नशा करने लगे तो पूरे एक परिवार के तबाह होने का खतरा पैदा हो जाता है. आज मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें नारी जाति पर ही टिकी हैं; अब यह उन पर निर्भर है कि मनुष्यता की इस उम्मीद को बचाए रखना है या खत्म कर देना है!