बहुत अच्छी खबर है कि असम, पुडुचेरी और केरल में मतदाताओं ने बंपर वोटिंग की है. पिछले सारे रिकॉर्ड टूटे हैं. इसका मतलब है कि लोगों ने वोटिंग की महत्ता को समझा है और ज्यादातर लोग मतदान के लिए घर से बाहर निकले हैं. इसके लिए चुनाव आयोग के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को भी बधाई दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवस्थागत दृष्टि से यदि चुनाव आयोग की भूमिका होती है तो लोगों को जागृत करने में राजनीतिक दलों की भूमिका ही सबसे महत्वपूर्ण होती है. लोग अपनी पसंद के दल को वोट देने पहुंचते हैं.
यदि सभी दलों से नाराज हैं तो वोट के माध्यम से इसका भी इजहार करते हैं जिसे हम नोटा कहते हैं, यानी मत किसी को भी नहीं! बहरहाल, ज्यादा वोटिंग की इस खुशी के बीच एक कसक यह रह गई कि असम में चुनावी हिंसा में 30 से ज्यादा लोग घायल हुए. एक पोलिंग बूथ पर ईवीएम मशीन तोड़ने वाले सात लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है. निश्चित रूप से पहले की तुलना में देश में चुनावी हिंसा कम हुई है.
इसका बड़ा कारण तो यही है कि पहले जब मतपत्र से वोटिंग होती थी तो दबंग प्रत्याशियों के समर्थक अपनी मनमर्जी चलाने की कोशिश करते थे और विरोधी पक्ष भी यदि मजबूत रहा तो फिर भीषण हिंसा होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं होता. मगर यह देखने में आया है कि सोशल मीडिया के जमाने में आरोप-प्रत्यारोप इतने निचले स्तर पर चला जाता है कि एक-दूसरे के प्रति भयंकर खुन्नस जन्म ले लेती है.
इसका असर समर्थकों के स्तर पर ज्यादा हो जाता है और फिर मारपीट की घटनाएं सामने आती हैं. असम के चुनाव में जिस तरह भाषायी गरिमा को नष्ट किया गया है, वह निश्चय ही चिंता का विषय है. एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक दलों के नेताओं ने इतने घटिया तरीके से आरोप लगाए हैं और दबंगईपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया है कि नेताओं के समर्थक भी उबाल खा रहे हैं.
यह साफ दिख रहा है कि चुनाव के परिणाम चाहे जो भी हों, आने वाले समय में सामाजिक विघटन का दंश असम को झेलना पड़ेगा. अभी जो हिंसा हुई है, वह केवल तात्कालिक नहीं है बल्कि इसका असर लंबे समय तक दिखेगा. लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है. सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठ कर सोचना चाहिए कि चुनावी हिंसा से मुक्ति कैसे पाएं?