Who is entitled to gifts from government treasury? | सरकारी खजाने से उपहार पाने का हकदार कौन? 
सरकारी खजाने से उपहार पाने का हकदार कौन? 

आलोक मेहता

सरकारी खजाना वही रहता है। सरकारें बदलती रहती हैं। राज्यों के नाम घटते-बढ़ते रहते हैं। विचारधाराओं और निर्णयों पर समर्थन-विरोध, सहमति-असहमति जारी रहनी चाहिए। इसी क्रम में यह मुद्दा फिर से उछला है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना की राज्य सरकारों ने अपनी जनता-जनार्दन (मतदाता भी) को साड़ी, जूते, मोबाइल जैसे जीवनोपयोगी सामान बांटने पर लगभग तीन हजार करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं या प्रक्रिया पूरी हो रही है। 

सरकारों के अपने दावों के हवाले से भी माना जा सकता है कि औसतन हर राज्य में 800 से 1000 करोड़ रुपयों के ये ‘उपहार’ गरीब जनता को लुभाने के लिए बांटे गए। विरोधी अथवा उदार आर्थिक नीतियों के पक्षधर आलोचक इस गतिविधि को सत्ता का दुरुपयोग और खजाने को लुटाए जाने की संज्ञा दे रहे हैं। निश्चित रूप से शहरी संपन्न अथवा मध्यम वर्ग के लोग भी इस पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हैं, क्योंकि वे किसी न किसी रूप में टैक्स देकर सरकारी खजाना भरते हैं। 

यह बात अलग है कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी दान-पुण्य की महत्ता सुनते-स्वीकारते रहे हैं। यों पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था के समर्थक विशेषज्ञों, संपादकों के अलावा गैरवामपंथी कई राजनेता एक-दो रुपए किलो चावल-गेहूं या तीन सौ रुपए तक उपभोक्ताओं को बिजली-पानी मुफ्त दिए जाने को भी अनुचित ठहराते हैं।

आप हम जैसे पत्रकार या व्यक्ति से असहमत रह सकते हैं, लेकिन हमारा मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में गरीब जनता को न्यूनतम सुविधा लाभ देना बहुत जरूरी है। यह लाभ जो सरकार ईमानदारी से देगी, उसे राजनीतिक लाभ मिलना स्वाभाविक है। हां, चुनाव के दौरान प्रलोभन के रूप में कपड़ा, पैसा, शराब बांटना पूरी तरह अनुचित और अपराध माना जाना चाहिए। लेकिन चुनी हुई सरकार अपने कार्यक्रमों में बच्चों की शिक्षा, नागरिकों के स्वास्थ्य, सिर छिपाने के लिए छत और न्यूनतम लागत के शौचालय या भूमिहीनों को जमीन, सस्ती बिजली और आधुनिक संचार तंत्र में मोबाइल फोन या गरीब विद्यार्थियों को लैपटॉप उपलब्ध कराती है, तो उसकी भर्त्सना कहां तक उचित है?

कुछ आलोचक नेता तर्क देते हैं कि ‘मुफ्त खोरी’ की आदत डालने से लोग आलसी हो जाते हैं और कोई काम नहीं करते। मुफ्त या सस्ता अनाज और न्यूनतम मजदूरी मिलने पर अब दिल्ली, मुंबई, पंजाब में श्रमिकों की कमी हो रही है। वे यह भूल जाते हैं कि छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड या तमिलनाडु से गरीबों का पलायन कम होने से महानगरों में झुग्गी-झोपड़ियों की समस्या भी तो नियंत्रित होती है। यही नहीं महानगरों में अधिक गरीबी होने और बेरोजगारी बढ़ने पर अपराध बढ़ने लगते हैं।

रही बात खजाना लुटाने या सरकार की फिजूलखर्ची की, तो हर प्रदेश में गरीबों को लगभग एक हजार करोड़ रुपए का सामान बांटने पर आपत्ति करने वाले समीक्षक कृपया सांसदों, विधायकों, पार्षदों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को विभिन्न बैठकों-सम्मेलनों के दौरान दिए जाने वाले उपहार (ब्रीफकेस, सूटकेस, घड़ी, मोबाइल फोन, महंगी मूर्तियां इत्यादि) के खर्च का आंकड़ा कहीं से निकलवाने का कष्ट करें।

संसदीय समितियों की बैठकों के लिए सरकारी उपक्रमों (भेल, सेल की तरह नवरत्न पब्लिक सेक्टर) को ‘अतिथियों’ के लिए आवश्यक उपहार का इंतजाम बाकायदा सरकारी खजाने से करना होता है। राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री की विदेश यात्र के खर्च का विवरण तो फिर भी जारी हो जाता है, सांसदों, विधायकों, वरिष्ठ अफसरों के सरकारी प्रतिनिधि मंडलों की विदेश-यात्रओं के लिए सरकारी खजाने से उपलब्ध कराए जाने वाले आवश्यक सामान का खर्च कहां जारी होता है? 

ये बैठकें या यात्रएं उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उसमें सरकार उपहार पर अनावश्यक खर्च पर रोक की मांग कभी नहीं उठती। भारत सरकार की नियमावली में सरकारी आयोजनों में शराब परोसे जाने पर कुछ अंकुश है, लेकिन किसी सरकारी उपक्रम और दूतावासों पर यह नियम लागू नहीं होता। इसलिए नेताओं और अफसरों की एक-एक यात्र के दौरान ठहरने, खाने और महंगी से महंगी शराब पर दो-चार करोड़ का बिल सरकारी खजाने से भरा जाता रहा है।

सबसे बड़े लोकतंत्र में सांसदों, विधायकों, पार्षदों और आला-अफसरों को दिए उपहार के ऐसे खर्चो का बहीखाता कभी नहीं देखा जाता। हां, फटेहाल अशिक्षित कुपोषित लोगों को एक सौ से पांच सौ रुपए तक का जीवनोपयोगी उपहार दिए जाने पर हायतौबा जरूर मचती है। 


Web Title: Who is entitled to gifts from government treasury?
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