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राजनीति में विचारों का अचार डालने की कला

By विजय दर्डा | Updated: March 9, 2026 07:01 IST

अब आप कहेंगे कि होली तो बीत गई, फिर रंगों की चर्चा क्यों कर रहा हूं? तो कारण निश्चय ही राजनीति है जहां ये मुहावरा बड़ा फिट बैठ रहा है कि विचारधारा तेल लेने गई! चलो विचारों का अचार डालते हैं.

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पिछले सप्ताह होली और फिर रंगपंचमी पर रंगे-पुते चेहरों को देखते हुए मेरे मन में सवाल आया कि क्या हमारी राजनीति भी ऐसी ही रंग-बिरंगी होती जा रही है कि असली चेहरा पहचानना भी मुश्किल हो जाए! पहले गुलाल का और प्राकृतिक रंगों का चलन था तो लोग बड़ी आसानी से पहचान में आ जाते थे. अब पेंट, डामर और गटर के कीचड़ से पुते चेहरे एक जैसे बदरंग लगते हैं. अब आप कहेंगे कि होली तो बीत गई, फिर रंगों की चर्चा क्यों कर रहा हूं? तो कारण निश्चय ही राजनीति है जहां ये मुहावरा बड़ा फिट बैठ रहा है कि विचारधारा तेल लेने गई! चलो विचारों का अचार डालते हैं.

‘विचारधारा गई तेल लेने’ का मतलब है कि राजनीति में उसकी कोई अहमियत नहीं रह गई है. कई लोग कहने भी लगे हैं कि जब कोई विचारधारा सत्ता का लक्ष्य न भेद पाए तो फिर मछली की आंख से नजर चुराने में ही भलाई है! वो बात बहुत पुरानी हो गई कि सत्ता मिले न मिले, अपनी विचारधारा पर कायम रहेंगे. ये नया जमाना है, नेताओं ने भी नई राह पकड़ ली है. शिवसेना वाले एक नेताजी से हाल ही में मुलाकात हुई, मैंने पूछा कि पार्टी कैसी चल रही है? उन्होंने खीसें निपोरते हुए कहा कि अरे मैं तो इन दिनों भाजपा में हूं. एनसीपी के एक नेताजी मिले. मैंने पूछा कि क्या हाल हैं? कहने लगे कि बहुत अच्छा चल रहा है. 

भाजपा जैसी कोई दूसरी पार्टी नहीं है! वो कहने लगे कि हम सत्ता में नहीं रहेंगे तो अपने मतदाताओं की उम्मीदें कैसे पूरी कर पाएंगे? मेरे पास बैठे पत्रकार ने विचारधारा की बात छेड़ी तो नेताजी कहने लगे कि अरे, विचारों को लिए बैठेंगे तो जवानी संघर्ष में ही बीत जाएगी! विचार का क्या अचार डालेंगे? हमारी बात तो छोड़िए. राहुल जी के खासमखास ही उनका साथ  छोड़ गए! इस तरह का जवाब सुनकर अब मैं यह सोच रहा हूं कि क्या हालचाल जानने से पहले ये पूछ लूं कि वह इन दिनों किस पार्टी में हैं?

वैसे इस तरह का सवाल किसी  वामपंथी नेता से नहीं पूछ सकते.  चीन और रूस ने वामपंथी सोच को त्याग दिया लेकिन हमारे देश के वामपंथी दोस्तों ने अपनी विचारधारा की नकेल कस रखी है कि प्रलोभन में मत पड़ना! वामपंथी हैं, थे और रहेंगे! आपको याद होगा कि एक समय सभी विपक्षी दल मिलकर ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत हो गए थे लेकिन वामपंथी नेता प्रकाश करात और हरकिशन सिंह सुरजीत ने वीटो लगा दिया कि विपक्षी दलों से विचारधारा नहीं मिलती, इसलिए ज्योति बाबू पीएम नहीं बनेंगे! हालांकि विचारधारा को लेकर अडिगता के बारे में भाजपा की भी तारीफ करनी होगी कि जब संसद में संख्या केवल 2 थी तब भी भाजपा नेताओं ने विचारधारा नहीं बदली! 

कोई कैसे भूल सकता है कि कांग्रेस की जब तूती बोलती थी तब राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये, मधु दंडवते, मृणाल गोरे जैसे नेता अपने विचारों के लिए संघर्ष करते रहे. उन्होंने पाला नहीं बदला. एन.डी. पाटिल की तो याद आपको होगी ही, वे बड़े शेतकारी नेता थे और रिश्ते में शरद पवार के बहनोई होने के बावजूद विचारों को लेकर उनके प्रबल विरोधी थे. भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे. मगर अब जमाना बदल गया है.

अभी महाराष्ट्र नगरीय निकाय चुनाव के दौरान किसी ने मुझसे बड़ी दिलचस्प बात कही कि कौन किसके साथ है और कौन किसके खिलाफ है, यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल है. जो मुंबई में हाथ में हाथ डाले खड़ा है, वह पुणे पहुंच कर विरोधी खेमे में खड़ा हो गया. तीसरी जगह किसी तीसरे के साथ खड़ा नजर आया. चुनाव के दौरान जो हुआ वह तो दिमाग का दही बनाने वाला मामला था. बीएमसी का चुनाव तो भाजपा और शिवसेना (शिंदे) ने एक साथ लड़ा. एनसीपी (अजित पवार गुट) सरकार के साथ है लेकिन बीएमसी का चुनाव अलग लड़ा. लेकिन ये सारे समीकरण पुणे में बदल गए. वहां भाजपा ने अलग चुनाव लड़ा और शिवसेना शिंदे ने अलग लड़ा. 

एनसीपी का अजित पवार गुट पुणे में शरद पवार के साथ हो गया! मगर नागपुर में दोनों ने अलग चुनाव लड़ा. मुंबई में कांग्रेस ने ठाकरे बंधुओं से रिश्ता तोड़ लिया था लेकिन पुणे में हाथ मिला लिया. मुंबई में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने वाली वंचित बहुजन आघाड़ी पुणे में कांग्रेस के खिलाफ लड़ी. राज्य की सत्ता में भागीदार भाजपा, शिवसेना (शिंदे) और एनसीपी (अजित) ने छत्रपति संभाजी नगर में अलग-अलग किस्मत आजमाई. नासिक में भाजपा अलग थी तो शिंदे और पवार साथ थे. महापौर के लिए भी अजब-गजब गठबंधन हुए. 

भिवंडी-निजामपुर शहर नगर निगम के महापौर चुनाव में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत था. उसने स्नेहा पाटिल को उम्मीदवार बनाया लेकिन भाजपा के नारायण चौधरी बिफर गए. उन्हें शरद पवार वाली एनसीपी के नेतृत्व वाले भिवंडी सेक्युलर फ्रंट ने समर्थन दे दिया और वे मेयर बन गए. एक भाजपाई का दर्द छलका कि बाहर से आए लोग पार्टी में मजे ले रहे हैं तो हम क्या बस जाजम बिछाने में जिंदगी गुजार दें? चंद्रपुर में कांग्रेस बहुमत के करीब थी लेकिन शिवसेना उद्धव गुट के समर्थन से भाजपा का महापौर चुना गया.

वैसे मौजूदा दौर में कुछ लोग रामदास आठवले की तारीफ करते हैं कि वो सबसे सच्चे नेता हैं. अपने विचारों को लेकर स्पष्ट हैं. वे साफ कहते हैं कि जो सत्ता में है, हम उसके साथ हैं. जिसके साथ हम हैं, वह सत्ता में है! यानी जो दिल में है, वही बोलते हैं. कोई लाग-लपेट नहीं! मगर दूसरे लोगों की हालत ऐसी है कि जो रंग चेहरे पर लगा है, उसे पलक झपकते ही साफ कर लेते हैं और दूसरा लगा लेते हैं. दूसरा हटाते हैं, तीसरा लगा लेते हैं! मतदाताओं को समझा भी देते हैं कि उनकी भलाई के लिए ही उन्होंने खुद को रंग-बिरंगा बना लिया है. जनता जानती है कि उसका काम ताली बजाना है...वह ताली बजाए जा रही है!

टॅग्स :महाराष्ट्रबृहन्मुंबई महानगरपालिकाकांग्रेसBJPशिव सेनामहाराष्ट्र नवनिर्माण सेना
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