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शोभना जैन का ब्लॉग: ‘राष्ट्र प्रथम’ के साथ वैश्विक सहयोग जरूरी

By शोभना जैन | Updated: April 11, 2020 13:42 IST

 भारत अधिकतर टेस्ट समग्री तथा अनेक तरह के उपकरण बाहर से लेता है, ऐसे में स्थितियों के अनुरूप जरूरत उसकी भी हो सकती है. लेकिन जिस तरह से यह महामारी दुनियाभर में अपने पंजे फैला चुकी है।

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एक तरफ जहां भयावह कोरोना की महामारी सरहदों को रौंदती हुई दुनिया भर के लगभग सभी देशों को अपनी चपेट में ले रही है, ऐसे हालात में महामारी से निपट रहे देश जहां अपने देश की प्राथमिकताओं को सर्वोपरि समझते हुए जरूरी कदम उठा रहे हैं. ऐसे में राष्ट्र प्रथम को वरीयता देते हुए इससे निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और एकजुटता की फौरी जरूरत और इसके  पैमाने को लेकर भी एक बड़ी चर्चा छिड़ी हुई है.

सवाल है कि एक तरफ जहां दुनिया अपने को एक बिरादरी मानते हुए एकजुटता से इस बीमारी से निपटने के बारे में मंत्रणा कर रही है, विश्व नेता इस बारे में आपस में विचार-विमर्श कर रहे हैं, वहीं यह भी हकीकत है कि सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं जहां राष्ट्र प्रथम है. ऐसी स्थिति में निश्चय ही सभी देशों को समान रूप से अपनी प्राथमिकताओं को सर्वोपरि मानते हुए इस महामारी तथा ऐसी ही अन्य आपदाओं से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग किए जाने के साथ तालमेल बिठाना होगा.

इस महामारी के मद्देनजर देश की जरूरतों को सर्वोपरि मानते हुए अपने देश से मास्क तथा अन्य कुछ सुरक्षा उपकरणों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इसी सप्ताह इस बीमारी के इलाज में दुनियाभर में बेहद कारगर मलेरियारोधी दवाई ‘हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वाइन’ दिए जाने की मांग बेहद ‘असम्मानजनक भाषा’ या सीधे तौर पर कहें तो ‘धमकी भरी’ भाषा में किए जाने को दरकिनार करते हुए भारत ने  ‘मानवता’ की मदद की खातिर उसे यह मदद भेजी. 

हालांकि यह दवा मिलने के बाद ट्रम्प के तेवर और भाषा बदल गई और उन्होंने असाधारण समय में दोस्तों के बीच घनिष्ठ सहयोग का मंत्र जपते हुए इस मानवीय मदद के लिए भारत की जनता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व के लिए उनका आभार व्यक्त किया.

ऐसे समय में जबकि इस महामारी के अब तक लाइलाज  होने की स्थिति में कुछ वर्गो में इस दवा को कुछ हद तक कारगर मान कर मरीजों को उसे दिया जा रहा है. भारत ने इस महामारी से निपटने के लिये अपने देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कुछ दिन पूर्व ही इस दवा का निर्यात बंद कर दिया था लेकिन अमेरिका की मांग के बाद भारत ने यह प्रतिबंध हटा दिया और उसे इस दवा की खेप भेज दी. 

उसके बाद भारत ने इजराइल, ब्राजील, पड़ोसी देशों सहित अनेक देशों को यह मानवीय मदद दी. बहरहाल निश्चित तौर पर  देश की जरूरत सबसे ऊपर है लेकिन अगर हम अपनी जरूरतों के बाद इस दवा को और भी देशों को दे सकते हैं तो यह बात भी साफ है कि इस तरह के कदमों के दूरगामी परिणाम होते हैं. अमेरिका भारत का सामरिक साझीदार है, आज की स्थिति में इस तरह का सहयोग वक्त की जरूरत भी है.

 भारत अधिकतर टेस्ट समग्री तथा अनेक तरह के उपकरण बाहर से लेता है, ऐसे में स्थितियों के अनुरूप जरूरत उसकी भी हो सकती है. लेकिन जिस तरह से यह महामारी दुनियाभर में अपने पंजे फैला चुकी है, निश्चय ही घरेलू स्तर पर इससे युद्ध स्तर पर जहां सभी देश टक्कर ले रहे हैं, वहीं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बिना भी कोई विकल्प नहीं है.

इसी क्रम में भारत ने शुरुआत में ही दुनियाभर में  तेजी से फैलती कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि  में अपने पड़ोसी दक्षेस देशों के साथ इस बीमारी से साझा तौर पर एकजुटता से निपटने के बारे में पहल करने के साथ ही इस बारे में जी-20 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के जरिए शिखर बैठक में हिस्सा लिया. बैठक में सभी ने एकजुटता से इस संकट का सामना करने की बात कही भी थी.

 इस महामारी के मद्देनजर दुनिया जिस असाधारण मंदी की तरफ बढ़ रही है, दुनिया भर में चिंता के बादल हैं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष प्रमुख क्रि स्टालिना जॉर्जीवा ने कहा, ‘‘हमें ग्रेट डिप्रेशन के बाद सबसे खराब आर्थिक गिरावट की आशंका है. यह चेतावनी है कि सभी चुनिंदा देश आय में गिरावट को देखते हुए व्यवसायों को समान रूप से ‘जीवनरेखा’ देने की कोशिश करें.’’ इस विषमता का लाभ उठाकर चीन की निरंतर बढ़ते आर्थिक वर्चस्वता के मंसूबे से सतर्क होकर खासतौर पर यूरोप और जापान जैसे विकसित अर्थव्यवस्था अनेक अहम कदम उठा रही हैं.

यूरोपीय यूनियन के देश मिलकर विशेष तौर पर आर्थिक संकट से निपटने के बारे में साझा रणनीति बनाने पर मंथन कर रहे हैं. विश्व के बदलते समीकरणों के बीच गुरुवार रात ही अमेरिका, चीन और रूस की रस्साकसी के बीच आखिरकार  इस महामारी के तीन माह बाद सुरक्षा परिषद ने इस मसले पर बैठक बुलाई.

निश्चित तौर पर इस अभूतपूर्व स्थित से उत्पन्न दौर से विश्व व्यवस्था के समीकरण बदलेंगे, नए समीकरण बनेंगे. उम्मीद की जानी चाहिए कि सभी देश समान रूप से राष्ट्र प्रथम की प्राथमिकता के बीच इस बीमारी से साझा तौर पर आपसी सहयोग के तालमेल से ही निपटेंगे और तालमेल की जरूरत सभी देश समान रूप से समझेंगे.

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