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शोभना जैन का ब्लॉग : सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए मंजिल अभी कितनी दूर?

By शोभना जैन | Updated: May 12, 2019 07:10 IST

अगर भारत पी-5 यानी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होता तो चीन मसूद अजहर को सुरक्षा परिषद में वैश्विक आतंकी घोषित करवाने  के रास्ते में बार-बार रोड़ा नहीं अटकाता.

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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वर्तमान स्वरूप को तर्कसंगत बनाने और बदलते समय की जरूरतों को ध्यान में रख पुनर्गठन कर उसका विस्तार करने के मकसद से भारत की स्थायी सदस्यता की मुहिम को गत सप्ताह बड़ा बल मिला. पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में पाक स्थित  दुर्दात आतंकवादी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने पर भारत का साथ देने के बाद  फ्रांस ने कहा कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल करना बहुत जरूरी  है. साथ ही उसने इस विश्व संस्था की महत्वपूर्ण इकाई में जर्मनी, ब्राजील और जापान की सदस्यता की भी वकालत की. भारत काफी समय से विश्व की बदलती परिस्थितियों के मद्देनजर इसके विस्तार की मांग जोर-शोर से उठाता रहा है. हाल की ही बात करें तो तय है कि अगर भारत पी-5 यानी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होता तो चीन मसूद अजहर को सुरक्षा परिषद में वैश्विक आतंकी घोषित करवाने  के रास्ते में बार-बार रोड़ा नहीं अटकाता. इसी तरह अनेक वैश्विक मामलों में पी-5 सदस्य देशों की धौंसपट्टी नहीं चलती. इस विश्वसंस्था के अधिकतर फैसले  तर्कसंगत होते. 

इस विश्वसंस्था के गठन के लगभग अस्सी वर्ष के इतिहास में बमुश्किल एक बार ही इसका पुनर्गठन हो पाया, जब कि इस के 1945 में गठन के बाद से दुनिया का नक्शा ही बदल गया, जरूरतें बदलीं. वर्ष 1992 में पुनर्गठन अंतर्राष्ट्रीय एजेंडा बना लेकिन विस्तार/ सुधार की मंजिल अब भी दूर है.  सुरक्षा परिषद में पी-5 यानी पांच स्थायी सदस्य होते हैं जिनके पास वीटो का अधिकार होता है. ये पांच स्थायी सदस्य हैं अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, चीन और फ्रांस. इसके अलावा इसमें दस अस्थायी सदस्य होते हैं, जो विश्व जनमत का सक्षम प्रतिनिधित्व करते हैं. भारत अब तक कुल मिला कर दो-दो वर्ष की अवधि के लिए सात बार इस विश्व संस्था का अस्थायी सदस्य बन चुका है, लेकिन तमाम प्रयासों और अनेक देशों के समर्थन के बावजूद परिषद की स्थायी सदस्यता अब भी उससे दूर बनी हुई है. यह स्थिति तब है जब कि विश्व की समस्याओं के बारे में आए परिषद के अनेक प्रस्तावों/मामलों में भारत की भूमिका काफी अहम मानी जाती रही है और उसकी अहमियत लगातार बढ़ रही है. वर्ष 1950 के बाद से ही संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भारत की भागीदारी अग्रणी रही है और इसमें उसके योगदान की काफी सराहना भी हुई है. इस बारे में भी विशेषज्ञ लगभग एकमत हैं कि भारत के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने से विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर इस विश्व संस्था में एक तर्कसंगत आवाज उभरेगी जिससे नीति निर्धारक फैसलों  और समानता पर आधारित विश्व व्यवस्था बनाने के लिए सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

भारत संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के लंबित पड़े सुधारों के लिए प्रयास करने वाले देशों में सबसे अग्रणी रहा है. भारत मजबूती से संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण संस्था में एक स्थायी सदस्य के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है. परिषद की  सदस्यता के विस्तार के लिए भारत 1979 से ठोस रूप से प्रयास करता रहा है. उस वक्त गुटनिरपेक्ष देशों के संगठन ने अस्थायी सदस्य देशों की संख्या 10 से 14 बढ़ाए जाने का प्रस्ताव रखा. वर्ष 2013 में भारत ने दुनिया के कई देशों के साथ मिल कर स्थायी और अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा जिसका इंग्लैंड और फ्रांस जैसे स्थायी सदस्य देशों ने समर्थन किया. एक पूर्व राजनयिक के अनुसार विश्व व्यवस्था के अलावा अगर एशिया की बात करें तो सुरक्षा परिषद में भारत के स्थायी सदस्य के रूप मे प्रवेश से एशिया में शांति और सुरक्षा को बल मिलेगा, एशिया में शक्ति संतुलन भी साधा जा सकेगा और भारत के सुरक्षा सरोकारों का भी एक हद तक समाधान हो सकेगा.

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