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राजनीति में इतनी कटुता देश के लिए बहुत खतरनाक

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: February 7, 2026 06:00 IST

एक दल को लगता है कि दूसरे दल ने देश में मानवीयता को ताक पर रख दिया हैै तो दूसरे दल को भी बहुत सारी खामियां नजर आती हैं.

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ठळक मुद्देकटुता इतनी बढ़ चुकी है कि एक-दूसरे के लिए अपशब्दों की तो बात ही छोड़ दीजिए, बात उससे आगे बढ़ चुकी है. राजनीति की इस कटुता का असर हमारी संसद में भी साफ-साफ दिखाई दे रहा है. कई बार तो संसद के कई घंटे बर्बाद हो जाते हैं. देश के पंंद्रह करोड़ रुपए पानी में बह गए! क्या राजनीतिक दलों को यह बात समझ में नहीं आती?

हर राजनीतिक दल का लक्ष्य तो आखिरकार यही है कि मानवीय मूल्यों के साथ देश विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ता रहे. इसमें कोई संदेह नहीं कि देश आगे बढ़ भी रहा है लेकिन हाल के वर्षों में राजनीति में जितनी कटुता आई है, वह आश्चर्यजनक है. राजनीतिक दलों के लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ते. आरोपों की ऐसी बारिश होती रहती है कि कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन क्या बोल रहा है और क्यों बोल रहा है और यह भी कि जो बोला जा रहा है, उसमेंं सच्चाई का प्रतिशत कितना है? कटुता इतनी बढ़ चुकी है कि एक-दूसरे के लिए अपशब्दों की तो बात ही छोड़ दीजिए, बात उससे आगे बढ़ चुकी है. एक दल को लगता है कि दूसरे दल ने देश में मानवीयता को ताक पर रख दिया हैै तो दूसरे दल को भी बहुत सारी खामियां नजर आती हैं.

राजनीति की इस कटुता का असर हमारी संसद में भी साफ-साफ दिखाई दे रहा है. कई बार तो संसद के कई घंटे बर्बाद हो जाते हैं. संसद के संचालन में हर घंटे करीब डेढ़ करोड़ रुपए का खर्च आता है. यदि दस घंटे काम नहीं हुआ तो इसका मतलब है कि देश के पंंद्रह करोड़ रुपए पानी में बह गए! क्या राजनीतिक दलों को यह बात समझ में नहीं आती?

क्या उनकी राजनीति देश से बड़ी है? अब देखिए कि ताजा मामला कितना गंभीर है! लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का कहना हैै कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकसभा में आना था लेकिन ऐसी आशंका थी कि प्रधानमंत्री के साथ उस दिन अनहोनी हो सकती थी.

तीन महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री के आसन के समक्ष पहुंच कर प्रदर्शन किया था. बिड़ला का कहना था कि विपक्ष के कुछ सदस्यों ने उनके चेंबर में आकर जिस तरह का हंगामा किया, वैसा लोकसभा के इतिहास में कभी नहीं हुआ. वह काले धब्बे की तरह था. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा कि वे सदन में न आएं! लोकसभा अध्यक्ष यदि कुछ कह रहे हैं तो उसका वजन होगा!

मगर सवाल यह है कि यदि कुछ सांसदों ने प्रधानमंत्री के खिलाफ वाकई कुछ योजना बनाई थी तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे सच्चाई से परे बताया है. अब आम आदमी यह सोच रहा है कि पूरी सच्चाई क्या है?

यह सच सामने आना ही चाहिए. आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति इतनी गंभीर स्थिति में पहुंच जाए और संसद में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति का कारण बन जाए तो यह भारतीय राजनीति के लिए खतरे की घंटी है. ऐसी कटुता के खिलाफ जनता के बीच से आवाज उठनी चाहिए. 

टॅग्स :संसद बजट सत्रकांग्रेसBJPमल्लिकार्जुन खड़गेनरेंद्र मोदीराहुल गांधी
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