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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: प्रचार पर टिका दुनिया का सबसे महंगा लोकतंत्न

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: March 15, 2019 06:01 IST

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने अपने सर्वे में कर्नाटक चुनाव को धन पीने वाला बताया था. सीएमएस के अनुसार कर्नाटक चुनाव में 9,500 से 10,500 करोड़ रु. के बीच धन खर्च किया गया.

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भारत में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 35547 करोड़ रुपए (500 करोड़ डॉलर) खर्च हुए तो 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस चुनावों में 46211 करोड़ रु पए (650 करोड़ डॉलर) खर्च हुए. अब 2019 में अमेरिकी चुनाव के खर्च को भी भारत का लोकतंत्न लांघ जाएगा क्योंकि कारनीज एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस थिंकटैंक  के मुताबिक खर्च 750 करोड़ डॉलर यानी 55 हजार करोड़ को भी पार कर जाएगा और इस खर्च के पीछे सबसे बड़ा आकलन राज्यों के चुनाव पर बढ़ता खर्च है जिसे राजनीतिक दल लगातार उड़ा रहे हैं.

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने अपने सर्वे में कर्नाटक चुनाव को धन पीने वाला बताया था. सीएमएस के अनुसार कर्नाटक चुनाव में 9,500 से 10,500 करोड़ रु. के बीच धन खर्च किया गया. इसी तरह एक अन्य सर्वे के मुताबिक राजस्थान, मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 15 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च हुआ और कमोबेश हर राज्य के चुनाव में खर्च औसतन दुगुना हो गया.

यानी पांच बरस में राज्य की इकोनॉमी चाहे कमजोर हो गई हो, प्रति व्यक्ति आय में चाहे बढ़ोत्तरी न हुई हो, सरकारी कर्मचारियों के वेतन भत्ते में चाहे तीन फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई हो लेकिन चुनावी खर्च सौ फीसदी बढ़ गया.

सबसे महत्वपूर्ण तो मीडिया के जरिए चुनाव प्रचार का आंकड़ा खासा डराने वाला है क्योंकि राजनीतिक दलों ने उसी मीडिया को अपने प्रचार का हिस्सा बनाया है जो लोकतंत्न का चौथा स्तंभ है और तमाम राजनीतिक दलों के प्रचार बजट को जोड़ने पर यानी अखबार, टी.वी. और सोशल मीडिया का बजट ही 30 हजार करोड़ के पार है. यूरोपीय संघ की मानें तो 3 से 5 फीसदी वोट मीडिया के जरिए अपने पक्ष में किए जा सकते हैं. अमेरिकी एजेंसी का तो मानना है कि सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए 3 फीसदी वोट को अपने पक्ष में किया जा सकता है. 

तो किस तरह 2019 का चुनाव सिर्फ प्रचार पर टिकेगा और किस तरह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश दुनिया का सबसे महंगा लोकतंत्न भी हो जाएगा ये सिर्फ उसकी एक तस्वीर भर है. इसी अक्स में चुनावी मुनादी और उसका शोर अब 23 मई तक जारी रहेगा. हां इस दौर में अब न तो पीएम कोई ऐलान कर पाएंगे, न ही मन की बात कह पाएंगे. जो भी बात होगी वह चुनावी प्रचार का हिस्सा मानी जाएगी. 

ऐसे में पुलवामा का दर्द और बालाकोट पर अटैक क्या हर मुद्दे को दफन कर देगा क्योंकि देशभक्ति यही है और राष्ट्रवाद के सामने कोई मुद्दा होता नहीं. जाहिर है ये 2019 को लेकर सिर्फ सवाल है. क्योंकि सवाल से आगे 2019 की बिछती ऐसी बिसात है जिस पर तीस हजार करोड़ से ज्यादा की पॉलिटिकल फंडिंग टिकी है.

आपराधिक और भ्रष्ट नेताओं को अपना सेवक बनाने का ख्वाब रचा गया है. कबीलों में बंटे समाज में जातीय समीकरण साधने के सियासी उपाय छुपे हैं. धर्म के नाम पर अधर्म करने होने की खुली छूट है. फिर भी लोकतंत्न का स्वाद है तो फिर कैसे याद करें कि इस बार बूथ लेबल पर भी करोड़ों के वारे न्यारे करने के इंतजाम हैं.

हर बूथ पर औसतन बीस लोगों को रोजगार मिलेगा. यानी पहली बार देश के 6 करोड़ युवा बेरोजगार सीधे राजनीतिक दलों की नौकरी करते हुए लोकतंत्न को जिएंगे. यानी सवाल ये नहीं है कि पहली बार 18 पार कर चुनाव में वोट डालने के लिए तैयार डेढ़ करोड़ लोगों से प्रधानमंत्नी ने वोट देने की गुहार क्यों की जबकि शिक्षा और रोजगार के उनके हक को देने के लिए कोई सत्ता तैयार है ही नहीं.

तो क्या पहली बार 90 करोड़ लोगों का समूह देश में लोकतंत्न को जीने के लिए सिर्फ एक वोट पर टिकेगा. यानी चुनावी ऐलान के साथ हर मुद्दा वाकई दफन हो गया क्योंकि देश को तो आदत लग चुकी है निर्णय की जिसमें चुनावी जीत-हार और उसी में मनती दिवाली होली ही चुनाव को लोकतंत्न का महापर्व करार दे देती है. यानी वह सारे सवाल बेमानी हैं जो लोकतंत्न तले संविधान की राख को भी खोज पाने में असफल साबित हो रहे हैं क्योंकि क्षत्नपों के परिवार में ही उनकी राजनीति जाति की आजादी देखती है.

दलित अपनों के चेहरे की जीत में आजादी का सुकून देखता है. खामोश मुसलमान के पास अपना तो कोई राजनीतिक चेहरा भी नहीं जो चुनावी लोकतंत्न से मेल खा जाए. हिंदुत्व के ढोल भगवा और हुड़दंग में अपने बहुसंख्यक होने की ताल ठोंकने से नहीं कतराते हैं. 

यानी जो नेता,  जो राजनीतिक दल, जिस भी मुद्दे के आसरे सामने वाले को डरा सकते हैं, इस चुनाव में चलती उसी की है और जीत के बाद लोकतंत्न उसी की हथेलियों पर नाचता है  और पांच बरस बाद चुनाव के ऐलान के साथ ही लगता है जैसे लोकतंत्न लौट आया. 

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