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लोकतंत्र में सत्ता पक्ष जितना ही विपक्ष भी जरूरी 

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: June 20, 2019 13:01 IST

सत्नहवीं लोकसभा में सत्तारूढ़ पक्ष भारी बहुमत से जीता है. विपक्ष की स्थिति ऐसी है कि मान्य परंपरा के अनुसार विपक्ष के किसी दल को सदन में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिल सकता. पिछले सदन में भी स्थिति ऐसी ही थी. तब सबसे बड़े विरोधी दल, कांग्रेस के कुल 44 सदस्य सदन में थे और इस बार यह संख्या 52 है.

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बात आजादी के शुरुआती वर्षो की है. पंडित जवाहरलाल नेहरू तब देश के प्रधानमंत्नी थे और संसद में कांग्रेस पार्टी के सदस्यों का बोलबाला था. उसी दौरान कांग्रेसी सांसदों की एक बैठक में तत्कालीन प्रधानमंत्नी ने कहा था, चूंकि संख्या की दृष्टि से विपक्ष काफी कमजोर है, इसलिए जरूरी है कि जागरूक कांग्रेसी सांसद विपक्ष की भूमिका भी निभाएं. जनतंत्न में मजबूत विपक्ष के अभाव में निर्वाचित सरकारें मनमानी कर सकती हैं. नेहरूजी ने अपने कांग्रेसी सदस्यों को सलाह दी थी कि वे सरकार के कामकाज पर नजर रखें.

उसी दौरान संसदीय प्रणाली में विपक्ष की भूमिका के महत्व को देखते हुए राजगोपालाचारी के नेतृत्व में ‘स्वतंत्न पार्टी’ का गठन हुआ था. राजाजी ने तब उद्योगपति जे.आर.डी टाटा से आग्रह किया था कि वे नई पार्टी की आर्थिक मदद करें. तब उन्होंने जे.आर.डी को लिखे पत्न में कहा था, सशक्त विपक्ष के अभाव में जनतांत्रिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर सकती. 

टाटा ने तब प्रधानमंत्नी नेहरू को पत्न लिखकर  बताना जरूरी समझा कि जनतांत्रिक पद्धति की बेहतरी के लिए वे स्वतंत्न पार्टी को भी आर्थिक सहायता देना चाहते हैं. नेहरूजी ने टाटा के इस प्रस्ताव का लिखित में समर्थन किया था और इस बात को रेखांकित किया था कि, उन्हें नहीं लगता ‘स्वतंत्न पार्टी’ का प्रयोग सफल होगा, पर नई पार्टी को आर्थिक सहयोग देने की टाटा की बात से वे पूर्णतया सहमत हैं. तब नेहरू ने लिखा था, मजबूत विपक्ष जनतंत्न की सफलता की अहम शर्त है. 

देश के पहले प्रधानमंत्नी से जुड़े ये दोनों प्रसंग जनतंत्न में विपक्ष की महत्ता को ही प्रतिपादित करते हैं. लेकिन कोई जरूरी नहीं कि मतदान के परिणाम संसद या विधानसभाओं में सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष का संतुलन बनाने वाले ही हों. आजादी के शुरुआती दौर में चुनाव-परिणामों का पलड़ा पूरी तरह, या कहना चाहिए कुछ ज्यादा ही कांग्रेस के पक्ष में झुका रहता था और अब यह पलड़ा भाजपा के पक्ष में कुछ ज्यादा ही झुका है. 

यह असंतुलन जनतंत्न की दृष्टि से ठीक नहीं है, पर चूंकि यह जनता का निर्णय है, अत: इसे स्वीकारना होगा. ऐसे में दो बातें जरूरी हैं. पहली तो यह कि विपक्ष जितना भी शक्तिशाली है, सरकार के कामकाज पर नजर रखने के अपने कर्तव्य का वहन ईमानदारी से करे, और दूसरी यह कि सत्तारूढ़ पक्ष भी जनतांत्रिक मर्यादाओं और मूल्यों के अनुरूप आचरण करे.

सत्नहवीं लोकसभा में सत्तारूढ़ पक्ष भारी बहुमत से जीता है. विपक्ष की स्थिति ऐसी है कि मान्य परंपरा के अनुसार विपक्ष के किसी दल को सदन में विपक्ष के नेता का पद भी नहीं मिल सकता. पिछले सदन में भी स्थिति ऐसी ही थी. तब सबसे बड़े विरोधी दल, कांग्रेस के कुल 44 सदस्य सदन में थे और इस बार यह संख्या 52 है. जबकि सदन में विपक्ष ने नेता-पद के लिए दल-विशेष के 54 सदस्य होने चाहिए. यह संवैधानिक व्यवस्था नहीं है, पर बरसों पहले सदन ने यह तय किया था कि मान्यता-प्राप्त विपक्षी दल के लिए जरूरी होगा कि उसके सदस्यों की संख्या सदन की कुल संख्या का दस प्रतिशत हो. 

सदन में विपक्ष के संख्या-बल की ओर इशारा करते हुए प्रधानमंत्नी मोदी ने विपक्ष को यह आश्वासन दिया है कि वह ‘अपने नंबरों की चिंता छोड़कर अपना योगदान करें- विपक्ष की आवाज और चिंताएं सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.’ ज्ञातव्य है कि पिछली लोकसभा में नेता विपक्ष के अभाव में कई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए जा सके थे. इसलिए, यदि सरकार आगे बढ़कर 52 सदस्यों वाली कांग्रेस को आधिकारिक विपक्ष का दर्जा दे देती है तो यह न केवल सदन में सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण के लिए बेहतर होगा, बल्कि जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार की निष्ठा का भी उदाहरण बनेगा. जहां विपक्ष के लिए जरूरी है कि वह सिर्फ विरोध के लिए विरोध न करे, वहीं सरकारी पक्ष के लिए भी जरूरी है कि वह विपक्ष की असहमति को सही संदर्भ में समझें.

हम यह क्यों न मानें  कि मतदाता ने एक पार्टी को या गठबंधन को सत्ता चलाने के लिए चुना है और बाकी पक्षों को सत्तारूढ़ दल पर नजर रखने के योग्य घोषित किया है. यह पारस्परिक समझ ही जनतंत्न को सार्थक बनाती है. इसी सार्थकता का तकाजा है कि विपक्ष को लोकतंत्न की अनिवार्य शर्त मानने वाली प्रधानमंत्नी की बात का आने वाले दिनों में असर भी दिखाई दे. इसके लिए जरूरी है सत्तारूढ़ पक्ष, विपक्ष की ईमानदारी पर वैसा ही विश्वास दिखाए जैसा पूर्व प्रधानमंत्नी नरसिंह राव ने विपक्ष के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी को संयुक्त राष्ट्र  में कश्मीर पर भारत का पक्ष रखने का काम सौंप कर दिखाया था.  जनतंत्न का तकाजा है कि सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष, दोनों जनतांत्रिक  मूल्यों के अनुरूप काम करें. प्रतिपक्ष की सक्रियता वाली प्रधानमंत्नी की बात के प्रति दोनों पक्ष कितनी ईमानदारी दिखाते हैं, देश का हर नागरिक जानना चाहेगा. 

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