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परमाणु ऊर्जा की नई सुबह: ‘ईंधन खत्म होने’ के डर को चुनौती

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 11, 2026 07:17 IST

लेकिन यह ‘फास्ट ब्रीडर’ रिएक्टर अलग है. यह यूरेनियम और प्लूटोनियम के मिश्रण से चलता है, और साथ ही आसपास मौजूद यूरेनियम-238 को बदलकर नया प्लूटोनियम पैदा करता है.

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निशांत सक्सेना

तमिलनाडु के कलपक्कम में समुद्र किनारे खड़ा एक रिएक्टर बाहर से देखने पर किसी और पावर प्लांट जैसा लगता है. लेकिन छह अप्रैल 2026 को यहां कुछ ऐसा हुआ, जिसने भारत की ऊर्जा कहानी को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया. प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने ‘पहली क्रिटिकलिटी’ हासिल की. आसान भाषा में कहें तो इसके भीतर पहली बार नियंत्रित परमाणु श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हुई.

यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है. यह उस सोच की शुरुआत है जिसमें ऊर्जा सिर्फ खपत नहीं होती, बनाई भी जाती है.

इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा. आज भारत की ऊर्जा व्यवस्था तीन बड़े दबावों के बीच खड़ी है. एक तरफ तेजी से बढ़ती मांग, दूसरी तरफ आयातित ईंधन पर निर्भरता और तीसरी तरफ जलवायु परिवर्तन का दबाव.

कोयला अभी भी सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन उसी कोयले से सबसे ज्यादा एमिशन निकलते हैं. सोलर और विंड तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन वे हर वक्त उपलब्ध नहीं रहते. ऐसे में सवाल है कि क्या कोई ऐसा रास्ता है जो लगातार बिजली दे, एमिशन कम करे, और ईंधन की चिंता भी कम करे? यहीं से प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की कहानी शुरू होती है.

आम रिएक्टरों में यूरेनियम का इस्तेमाल होता है, और समय के साथ वह ईंधन खत्म हो जाता है. लेकिन यह ‘फास्ट ब्रीडर’ रिएक्टर अलग है. यह यूरेनियम और प्लूटोनियम के मिश्रण से चलता है, और साथ ही आसपास मौजूद यूरेनियम-238 को बदलकर नया प्लूटोनियम पैदा करता है.

यानी यह जितना ईंधन जलाता है, उससे ज्यादा बना भी सकता है. ऊर्जा की दुनिया में यह वैसा ही है जैसे कोई इंजन पेट्रोल जलाते हुए खुद पेट्रोल भी बनाना शुरू कर दे.

इस तकनीक की जड़ें उस विजन में हैं जिसे होमी जहांगीर भाभा ने दशकों पहले रखा था. भारत के पास यूरेनियम सीमित है, लेकिन थोरियम बहुत है. इसलिए तीन-चरणीय कार्यक्रम बनाया गया. पहले चरण में यूरेनियम से बिजली और प्लूटोनियम बनता है.

दूसरे चरण में, जिसमें यह रिएक्टर आता है, प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके और ज्यादा ईंधन तैयार किया जाता है. और तीसरे चरण में, उसी ईंधन की मदद से थोरियम को उपयोग में लाया जाएगा. यानी यह रिएक्टर सिर्फ बिजली नहीं बना रहा, भविष्य के लिए रास्ता तैयार कर रहा है.

हालांकि यह तकनीक आसान नहीं है. यह रिएक्टर पानी की जगह तरल सोडियम का इस्तेमाल करता है, जो बहुत उच्च तापमान पर काम करता है. इससे दक्षता बढ़ती है, लेकिन जोखिम भी बढ़ते हैं. इसलिए ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल करना सिर्फ शुरुआत है. अब अगले कुछ महीनों में इसे धीरे-धीरे पूरी क्षमता तक ले जाया जाएगा.

हर चरण में परीक्षण होगा, हर सिस्टम को परखा जाएगा. अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह 500 मेगावाट की पूरी क्षमता से बिजली देना शुरू कर सकता है. इसके बाद ही यह साफ होगा कि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सुरक्षित तरीके से फैल सकती है.

भारत की योजना यहीं रुकने की नहीं है. इस अनुभव के आधार पर 600 मेगावाट के और बड़े फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित करने की योजना है, ताकि इस तकनीक को ‘प्रोटोटाइप’ से निकालकर ‘स्टैंडर्ड मॉडल’ बनाया जा सके. अगर यह सफल होता है, तो भारत का परमाणु कार्यक्रम एक नए स्तर पर पहुंच सकता है, जहां थोरियम आधारित ऊर्जा व्यवस्था भी हकीकत बन सकती है.

टॅग्स :Tamil Naduसाइंटिस्टScientist
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