लाइव न्यूज़ :

सिर्फ विकल्प खोजने से नहीं होगा समाधान?

By Amitabh Shrivastava | Updated: January 31, 2026 05:55 IST

राकांपा के भविष्य पर कोई ठोस निर्णय लिया जाना था और कुछ नहीं होता देख अजित पवार ने सारे परिदृश्य से स्वयं को दूर कर लिया था.

Open in App
ठळक मुद्देविपक्षी नेताओं के अनुरोध पर 5 मई 2023 को अपना फैसला वापस ले लिया था.वर्तमान में पार्टी का संकट उनकी तत्कालीन चिंताओं को सही सिद्ध कर रहा है.पलों में तत्कालीन बागी अजित पवार बहुत याद आएंगे.

यह बात बहुत पुरानी नहीं कही जा सकती है, जब दो मई 2023 को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार ने अपने पद से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया था. मगर उससे अधिक आश्चर्य तब हुआ था, जब उन्होंने कार्यकर्ताओं के भारी विरोध और विपक्षी नेताओं के अनुरोध पर 5 मई 2023 को अपना फैसला वापस ले लिया था.

यही वह पल था जब राकांपा के भविष्य पर कोई ठोस निर्णय लिया जाना था और कुछ नहीं होता देख अजित पवार ने सारे परिदृश्य से स्वयं को दूर कर लिया था. उस समय कुछ ने उनके रवैये को निजी महत्वाकांक्षा से जोड़ा और कुछ ने पारिवारिक कलह तक कहने में संकोच नहीं किया. किंतु उनके बाद वर्तमान में पार्टी का संकट उनकी तत्कालीन चिंताओं को सही सिद्ध कर रहा है.

इसमें भी कोई दो-राय नहीं कि वर्ष 1999 में कांग्रेस से अलग होकर बनी राकांपा ने बीते 26 साल में नेतृत्व के विकल्पों पर कभी विचार नहीं किया, जबकि वर्ष 2023 में राष्ट्रीय अध्यक्ष का इस्तीफा और वर्ष 2024 में पार्टी की बगावत ने संदेश दिया था कि अब आने वाले समय के लिए तैयार होना चाहिए. शिवसेना और कांग्रेस के हालात को देख पार्टी मजबूत बनानी चाहिए.

22-23 साल की उम्र में अपने चाचा के साथ राजनीति में सक्रिय हुए अजित पवार वर्ष 1982 से शक्कर कारखाने के अध्यक्ष बन लगातार नई ऊंचाइयों को छूते गए. वर्ष 1991 में जब वे सर्वाधिक मतों से जीतकर लोकसभा पहुंचे, तब भी वह अपने परिवार की छत्रछाया में उभरे सांसद थे. मगर लोकसभा से वापसी और विधानसभा में कदम रखने पर वह स्वतंत्र रूप से चलने के लिए तैयार थे.

वे राज्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री तक पहुंचे. छह बार उपमुख्यमंत्री बने. वर्ष 1999 में कांग्रेस से अलग होकर जब राकांपा का गठन हुआ, तब वे राज्य में पार्टी को संभालने के लिए तैयार थे और आम स्वीकार्यता अपने नाम से मिली. उस दौरान राष्ट्रीय स्तर पर शरद पवार ने मोर्चा संभाला हुआ था. तब से वर्ष 2026 तक राकांपा के भविष्य को लेकर जितनी चिंता उनके मन में थी, उतनी किसी दूसरे नेता के पास नहीं थी.

उन्होंने चाचा के साथ हर चुनाव को गंभीरता से लिया और यहां तक कि जब अलग भी हुए, तब भी गंभीर बने रहे. अपनी पार्टी को मजबूत बनाने की कोशिश करते रहे. लेकिन उन्हें उनकी चिंताओं का जवाब नहीं मिला. सुप्रिया सुले के राज्यसभा से लोकसभा पहुंचने, एकनाथ खड़से, जयसिंहराव गायकवाड़, धनंजय मुंडे जैसे कुछ नेताओं के पार्टी से जुड़ने के बावजूद भविष्य की संभावित समस्याएं छिप नहीं पाईं.

मधुकरराव पिचड़, जयंत पाटिल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल जैसे अनेक नेताओं ने पार्टी की जिम्मेदारी संभाली. परंतु सभी शरद पवार के सान्निध्य में बड़े हुए. वहीं पार्टी के दूसरे कद्दावर नेता अजित पवार माने गए. जिन्होंने उम्मीद अनुसार काम किया. फिर भी उनकी चिंताओं को महत्व नहीं मिला. अब अजित पवार की असामयिक मृत्यु के बाद राकांपा के समक्ष नए नेतृत्व का संकट है.

अब भावना और आवेश में नए नाम ढूंढ़े जा रहे हैं. कुछ नए नामों को चर्चा में लाया जा रहा है. अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार का नाम इसलिए भी आगे किया जा रहा है, जिससे संवेदनशीलता के साथ परिस्थिति से बाहर आया जा सके. सांसद प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल जैसे नाम वैकल्पिक स्थितियों के लिए हैं.

फिलहाल हर नेता अपने नेता के प्रेम में कुछ नाम उत्तराधिकारी के रूप में सामने ला रहा है. बावजूद इसके चिंताएं नाम की बजाय पार्टी को आगे नए रूप में ले जाने से जुड़ी हैं. वर्तमान में विकल्प एक नाम हो सकता है, लेकिन वह पार्टी के भविष्य का समाधान नहीं हो सकता है. वर्तमान समय में राकांपा में भावनात्मक रूप से एकजुटता केवल अजित पवार के नाम पर है.

आधिकारिक तौर पर वह दो भाग में है. दोनों के अध्यक्ष अपने-अपने हैं. नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सीमाएं ही नहीं खींचीं, बल्कि अलग चुनाव भी लड़ा है. अत: सबसे पहले भावनाओं से परे संगठन को सुदृढ़ बनाने की सोच से पार्टी के दोनों धड़ों को एक बनाने के लिए सर्वमान्य सहमति बनानी होगी. उसके बाद जब नेतृत्व की बात होगी, तब पवार परिवार या उससे बाहर के व्यक्ति के नेतृत्व को स्वीकृति देनी होगी.

अब तक शरद पवार ने प्रदेशाध्यक्ष परिवार से बाहर के किसी नेता को बनाया है. एकजुट होने पर अजित पवार गुट के नेताओं को माफ करना होगा, जिन्होंने बगावत कर मूल पार्टी को हाशिए पर ला दिया है. यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान में वही नेता ही पार्टी की ताकत हैं.

लिहाजा जब पार्टी की कोई प्रमुख जिम्मेदारी की बात होगी तो राकांपा शरद पवार गुट में सुप्रिया सुले और जयंत पाटिल के अलावा दूसरे नामों के लिए अजित पवार गुट के सुनील तटकरे, छगन भुजबल, प्रफुल्ल पटेल जैसे नेताओं की ओर देखना होगा. ये सभी भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) के साथ गठबंधन सरकार में हैं.

वहीं राकांपा शरद पवार गुट विपक्ष में है. इसलिए तालमेल को आसान बनाना टेढ़ी खीर है. हाल के नगर परिषद, महानगर पालिका और जिला परिषद चुनाव में राकांपा शरद पवार गुट का महाविकास आघाड़ी के दलों के खिलाफ दूसरे दलों से हाथ मिलाना शिवसेना ठाकरे गुट को रास नहीं आ रहा है. ऐसे में दो अलग-अलग पाले में बैठे गुट का साथ मिलना सहज स्वीकार्य नहीं होगा.

इसलिए अजित पवार की अनुपस्थिति राकांपा के लिए हर तरह से चिंता का कारण है. किंतु यदि ढाई साल पहले उनकी चिंताओं को निजी न मानते हुए गंभीरता से विचार किया जाता तो आज नया नेतृत्व संकटकालीन परिस्थितियों को संभालने के लिए तैयार रहता.

अब विकट समय में विकल्प को ढूंढ़ने के प्रयास किए जा रहे हैं. कुछ निर्णय जल्दबाजी और कुछ भावनाओं में बहकर लिए जाएंगे, लेकिन भविष्य के लिए कोई समाधान नहीं दे पाएंगे. इन्हीं पलों में तत्कालीन बागी अजित पवार बहुत याद आएंगे.

टॅग्स :महाराष्ट्रअजित पवारसुनेत्रा पवारशरद पवारSupriya Sule
Open in App

संबंधित खबरें

क्राइम अलर्टफोन, पेनड्राइव और टैबलेट में 121 अश्लील वीडियो?, रवींद्र गणपत एरंडे ने सरकारी नौकरी का वादा कर अलग-अलग होटल में कई महिलाओं का यौन शोषण किया

क्राइम अलर्टखुले कुएं में गिरी कार, परिवार के 9 सदस्यों की गई जान, समारोह में शामिल होने के बाद घर लौट रहे थे, वीडियो

भारतराष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टीः उत्तरार्द्ध में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष

क्राइम अलर्ट2 क्रेडिट सोसायटी, 132 खाते, ₹62.74 करोड़ लेन-देन?, 'धर्मगुरु' ने कैसे दौलत बनाई?

क्राइम अलर्ट2022 में 37 वर्षीय विकास रामदास दिवाटे ने की थी आत्महत्या, सुसाइड नोट में अशोक खरात का जिक्र, स्वयंभू धर्मगुरु को लेकर खुल रहे राज

भारत अधिक खबरें

भारतLPG Cylinder Update: सिलेंडर के लिए अब लंबी वेटिंग खत्म! दिल्ली में बस ID कार्ड दिखाओ और 5KG सिलेंडर पाओ

भारतबाबा विश्वनाथ और ‘काशी कोतवाल’ काल भैरव में दर्शन-पूजन, सीएम योगी आदित्यनाथ पहुंचे मंदिर, वीडियो

भारतपश्चिम बंगाल चुनावः 4660 अतिरिक्त मतदान केंद्र?, कुल संख्या 85379 और 23 और 29 अप्रैल को 2 चरणों में पड़ेंगे वोट

भारतTamil Nadu Election 2026: क्या CBSE का नया सिलेबस भाषा विवाद की जड़? सीएम स्टालिन ने कहा- "भाषा थोपने का सुनियोजित प्रयास"

भारतFire Accident: ONGC मुंबई हाई प्लेटफॉर्म पर भीषण आग, 10 लोग घायल; राहत और बचाव कार्य जारी