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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉगः 2019 के महासमर के सामने छोटी है चौसर

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: January 22, 2019 20:58 IST

 2019 के महाभारत में सबसे परेशान वाला तीसरा चेहरा है जो जन-सरोकार या जन अधिकार की बात को ही सत्ता की दौड़ तले खत्म कर देता है. यानी सत्ता कैसे संविधान है, सत्ता ही कैसे लोकतंत्र की परिभाषा है और सत्ता ही कैसे हिंदुस्तान है. ये वाकई बेहद त्रसदी पूर्ण है कि मान्यता तभी मिलती है जब सत्ता का हाथ सर पर हो.

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महासमर या महाभारत. 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल जिस लकीर को खींच रहे हैं वह सिर्फ राजनीति भर नहीं है. सत्ता हो या विपक्ष दोनों के पांसे जिस तरह फेंके जा रहे हैं वह जनादेश के लिए समर्थन जुटाने का मंत्र भी नहीं है. महासमर या महाभारत की गाथा एक ऐसे दस्तावेज को रच रही है जिसमें संविधान और लोकतंत्र की परिभाषा आने वाले वक्त में सत्ता के चरणों में नतमस्तक रहेगी. जो रचा जा रहा है उसके तीन चेहरे हैं. पहला, चुनावी तंत्र का चेहरा. दूसरा  कॉर्पोरेट लूट की पॉलिटिकल इकोनॉमी. तीसरा जन सरोकार या जन अधिकार को भी सत्ता की मर्जी पर टिकाना. 

दरअसल इस तीसरी परिस्थिति में कई परतें हैं. पहला तो यही कि अखिलेश यादव भी सीटों की संख्या में मायावती से कम रहेंगे तो फिर पहला समझौता माया-अखिलेश में यह होगा कि कौन राज्य संभाले और कौन केंद्र. इस समझौते के तहत अखिलेश का झुकाव कांग्रेस के पक्ष में होगा. लेकिन इस गणित की दूसरी परत यह भी कहती है कि मायावती के सामानांतर अगर ममता भी बंगाल में कमाल कर देती हैं तो फिर ममता खुद को उन क्षत्रपों के साथ जोड़कर पीएम उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी जिनके संबंध ममता से करीब हैं.  राजनीतिक महासमर के इस खेल में कॉर्पोरेट लूट की पॉलिटिकल इकोनॉमी का चेहरा भी कम रोचक नहीं है.  

 2019 के महाभारत में सबसे परेशान वाला तीसरा चेहरा है जो जन-सरोकार या जन अधिकार की बात को ही सत्ता की दौड़ तले खत्म कर देता है. यानी सत्ता कैसे संविधान है, सत्ता ही कैसे लोकतंत्र की परिभाषा है और सत्ता ही कैसे हिंदुस्तान है. ये वाकई बेहद त्रसदी पूर्ण है कि मान्यता तभी मिलती है जब सत्ता का हाथ सर पर हो. यानी जो  सत्ता  के साथ खड़े हैं मान्यता उन्हीं की होगी. बाकी जीए या खत्म हो जाए कोई फर्क नहीं पड़ता. इसका नजारा कई दृष्टि से हो सकता है. पर उदाहरण के लिए लगातार किसानों के बीच काम कर रहे लोगों को ही ले लीजिए. 

दो महीने पहले दिल्ली में किसानों का जमघट मोदी सत्ता की किसान विरोधी नीतियों को लेकर हुआ. दिल्ली में किसानों के तमाम संगठन जुटे इसके लिए तमाम समाजसेवी से लेकर पत्रकार पी. साईनाथ ने खासी मेहनत की. पर दिल्ली में सजा मंच इंतजार करता रहा कि तमाम राजनीतिक दलों के चेहरे कैसे मंच पर पहुंच जाएं. जब संसद के अंदर बाहर चमकते चेहरे मंच पर पहुंचे और किसानों के हितों की बात कहकर हाथों में हाथ डाल कर अपनी एकता दिखाते रहे तो इसे ही सफल मान लिया गया. 

योगेंद्र यादव कोलकाता से दो सौ किलोमीटर दूर एक सामान्य सी सभा को बंगाल में ही संबोधित कर रहे थे. पर उनका कोई अर्थ नहीं क्योंकि सत्ता के सितारे तो कोलकाता में जुटे थे. यानी महत्ता तभी होगी जब आप सत्ता केंद्रित सियासत के साझीदार बन जाएं. वर्ना आप होकर भी कहीं नहीं हैं. तो क्या देश के सारे रास्ते सत्ता में जा सिमटे हैं. देश का मतलब राजनीति सत्ता ही है. 

टॅग्स :लोकसभा चुनावमायावतीअखिलेश यादव
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